मंगलवार, 30 जून 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 24 ‘फूल‘ (बाल कविता संग्रह) लेखन से जुड़ी यादें


      वर्ष 2010-11 की बात है। मैंने 27 बाल कविताएंॅ लिखी थीं जो बच्चों के आस-पास के अवलोकन पर आधारित थी । अब बारी थी इन कविताओं के संकलन को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने की ।  मेरे मन में विचार आया कि क्यों न प्रकाशित करने से पहले बच्चों से इन पर प्रतिक्रियायें प्राप्त कर ली जाए । इसके लिए मैंने देहरादून से राजकीय प्राथमिक विद्यालय अजबपुर कलां  और जिला नैनीताल के दूरस्थ विकासखण्ड ओखलकांडा में स्थित कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय खनस्यूं का चयन किया । कविताओं को टाइप करने के बाद  इनका प्रिन्ट आउट लेकर मैं सबसे पहले राजकीय प्राथमिक विद्यालय अजबपुर कलां के बच्चों से मिला । इसके बाद मैं कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय खनस्यूं  के  बच्चों से मिला । मैंने बच्चों से कहा कि वे इन कविताओं को पढ़ें। इनको पढ़कर उनके मन में इन कविताओं के बारे में जो बातें आती हैं, उनको निसंकोच लिखें । बच्चों ने इन कविताओं को पढ़ा । इनके बारे में अपने विचार लिखे ।
 
 बाल साहित्य बच्चों के लिए लिखा जाता है। यह सामान्यतः बड़ी उम्र के लोगों द्वारा लिखा जाता है। इन्हीं लोगों के द्वारा बच्चों के लिए लिखे साहित्य की समीक्षा भी की जाती है। बच्चों के लिए लिखा गया साहित्य बच्चों तक कितना पहुंॅच पाया है ? इस बारे में हम प्रायः उदासीन ही रहते हैं । बच्चों के लिए लिखे गए साहित्य की समीक्षा प्रकाशन से पूर्व बच्चों से अवश्य कराई जानी चाहिए ।  इससे बच्चों की पसंद और रुचि का पता चलता है। कवि को भी साहित्य सृजन के लिए नई दिशा मिलती है।
      बच्चों को ये कविताएं पढ़ने को दी गई तो बच्चों ने इन पर विविध प्रतिक्रियाएंॅ दी । एक कविता ‘विद्यालय‘ पर लिखी गई थी । इसमें फूलों का वर्णन आया था । एक बच्चे ने लिखा था,‘‘ स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे भी फूल के समान होते हैं। एक कविता में वर्णन आया था कि एक बालिका पिंजरे में बंद तोते को आजाद करती है। इसमें पंक्तियां आई थीं- ‘बतलाऊंगी मैं सबको आजादी का मोल, मिट्ठू तोते के पिंजरे के दरवाजे को खोल।‘   इस कविता के बारे में एक बालिका ने लिखा था,‘‘लड़की की जिन्दगी भी पिंजरे में बंद पक्षी की तरह होती है। वह पक्षी के साथ पूरी दुनियां को स्वतंत्र कराना चाहती है।‘‘ एक बालिका ने ‘सपना‘ कविता के बारे में लिखा,‘‘सपना कविता से सीखने को मिलता है एक गरीब बच्चा भी पढ़-लिख कर समाज में अपना नाम रोशन कर सकता है।‘‘ कुछ बच्चों ने लिखा कि वे भी कवि बनना चाहते हैं।

    इस प्रयोग का सुखद पहलू यह रहा कि कुछ कविताएंॅ बच्चों को याद हो गई । बच्चों की रुचि भी कविता लेखन की ओर हो गई । इन कविताओं को पढ़ने के बाद बच्चे भी विभिन्न विषयों पर कविताएंॅ लिखने लग गए । लगभग एक माह के बाद राजकीय प्राथमिक विद्यालय अजबपुर कलां की प्रधानाध्यापक श्रीमती आभा गौड़ ने मुझे बच्चों द्वारा तैयार हस्तलिखित कविताओं का संग्रह दिखाया ।  उन्होंने बताया कि अब बच्चों ने भी कविताएंॅ लिखना शुरू कर दिया है। इसी का परिणाम यह हस्तलिखित कविता संग्रह है।
    ‘फूल‘ बाल कविता संग्रह डाॅ.पीतांबर दत्त बड़थ्वाल  हिन्दी साहित्य अकादमी उत्तराखण्ड  की उत्कृष्ट पुस्तक प्रकाशन योजना के अंतर्गत वर्ष 2014 में अखिल ग्राफिक्स बिजनौर से प्रकाशित हुआ। 

रविवार, 28 जून 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 23 - नानतिनो कि सजोळि (उत्तराखण्ड का प्रथम गढ़वाली एवं कुमाउनी संयुक्त बाल कविता संग्रह) से जुड़ी बातें




वर्ष 2009 की बात है। डायट भीमताल में उत्तराखण्ड के कक्षा 1 से 8 तक विद्यार्थियों के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 में दिए दिशा निर्देशों के क्रम में पाठ्य पुस्तक लेखन कार्यक्रम चल रहा था । इस कार्यक्रम में बाल साहित्य लेखन से जुड़े शि़क्षकों को बुलाया गया था । सभी शिक्षकों को विषय के हिसाब से समूहों में बांटा गया था ।
  इसी दौरान विनीता जोशी मैडम से मुलाकात हुई । विनीता जोशी अल्मोड़ा के प्राथमिक विद्यालय में कार्यरत थी।  उन्होंने बताया कि उन्होंने कुमाउंनी भाषा में बच्चों के लिए कुछ कविताएंॅ लिखी हैं। मैंने उन्हें बताया कि मैंने भी उत्तराखण्ड के ग्रामीण परिवेश को ध्यान में रखते हुए कुछ बाल कविताएंॅ लिखी हैं। वार्ता में इस बात पर भी चिन्ता व्यक्त की गई कि आजकल जो बाल साहित्य लिखा जा रहा है वह सामान्यतः शहर में रहने वाले बच्चों पर केन्द्रित है। ग्रामीण परिवेश के बच्चों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर कम लिखा जा रहा है।  तय हुआ कि गढ़वाली और कुमाउंनी बाल कविताओं के संयुक्त संकलन पर कार्य किया जाएगा ।  पुस्तक लेखन कार्यक्रम महीनो तक चलता रहा । यह कायक्रम रात को भी विषय समूहों में चलता रहा । इसमें इतनी व्यस्तता रही कि गढ़वाली-कुमाउंनी संयुक्त संकलन के बारे में सोचने का समय नहीं मिल पाया ।
  कार्यक्रम समाप्त होने के बाद हम अपने कार्यस्थल को चले गए । अब धीरे-धीरे गढ़वाली-कुमाउंनी संयुक्त  संकलन की दिशा में हम कार्य करने लगे । विनीता जोशी मैडम ने कुमाउंनी बाल कविताएंॅ मुझे डाक से भेजी । मैंने इनको टाइप करके पांडुलिपि तैयार कर दी  । गढ़वाली और कुमाउंनी में लिखी ये  कवितायें  पहाड़ की प्रकृति, स्थानीय भोज्य पदार्थ, बरसात का दृश्य, पहाड़ की होली, दीपावली, घुघुती और फुलदेई त्योहार, पहाड़ की पक्षियां जैसे घुघुती (फाख्ता), गौरेया, फूल जैसे बुरांस, प्यंूली, यहांॅ के जंतु , ऋतुएं, लोरी आदि विषयों पर केन्द्रित थी । 25 बाल कविताएं कुमाउंनी में विनीता जोशी मैडम ने और 25 बाल कविताएंॅ गढ़वाली में मैंने लिखी थी । इन कविताओं से संबंधित पुस्तक का नाम नानतिनो कि सजोळिरखा गया । इसमें यह सोचा गया कि पुस्तक के नाम में कम से कम एक शब्द गढ़वाली और एक कुमाउंनी शब्द का प्रयोग किया जाएगा। इसलिए नानतिनोकुमाउंनी और सजोळिगढ़वाली शब्द का प्रयोग किया गया । सजोळि रिंगाल से बनी छोटी-छोटी टोकरियों को कहते हैं जिनमें बच्चे फुलदेई त्योहार में फूल एकत्र कर हर घर की देहरी में डालते हैं।  डाॅ. नंद किशोर ढोंडियाल अरुणऔर श्री भीष्म कुकरेती जी ने इस संकलन  की समीक्षा करते हुए इसे  गढ़वाली और कुमाउंनी बाल कविताओं का प्रथम संयुक्त संकलन लिखा । पुस्तक का आवरण श्री प्रदीप बिष्ट जी द्वारा फेसबुक में लोड की गई फोटो के आधार पर तैयार किया गया ।  पुस्तक का लोकार्पण तत्कालीन अध्यक्ष विधानसभा उत्तराखण्ड श्री गोविन्द सिंह कुंजवाल जी द्वारा किया गया था ।




शनिवार, 27 जून 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 22 जब मैं जेल जाते-जाते बचा


      वर्ष 1990 की बात है। मैं बी.एस-सी प्रथम वर्ष का छात्र था । जूलोजी का पीरियड था । एक दिन प्रोफेसर एम.सी.शर्मा सर ने अपनी फाइल से एक कागज निकाल कर पढ़ा । इसमें लिखा था- ‘‘बी.एस-सी प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों में से एक का चयन माॅडल पार्लियामेन्ट के लिए सांसद के रूप में किया जाना है। मेरे एक मित्र ने मुझसे पूछे बिना मेरा नाम प्रस्तावित कर दिया । दूसरे मित्र ने प्रस्तावित नाम का समर्थन कर दिया । मैं चक्कर में पड़ गया । सोचने लगा,‘‘ उठकर मना कर दूंॅ कि मैं इसके लिए तैयार नहीं हूंॅ। फिर सोचा,‘‘ यह भी एक रचनात्मक कार्य होगा । यह लगभग डिबेट जैसा कार्य होगा जिसका कि मुझे पुराना अनुभव है।‘‘ यह सोचकर मैं चुप रहा । मेरे विरोध में मेरा एक मित्र उठ गया । मैंने उससे कहा, ‘‘मैं तेरे समर्थन में बैठ जाता हूंॅ।‘‘ उसने कहा,‘‘नहीं ! दोनो उठते हैं । देखते हैं कौन जीतता है। ‘‘ हम दोनो के अलावा एक और मित्र ने भी अपना नाम दे दिया । चुनाव हुआ । मेरा चयन माॅडल संसद के लिए सांसद के रूप में हो गया ।
    जब छात्र संघ चुनाव की चहल -पहल होनी शुरू हुई तो हमारी कक्षा के साथियों ने मुझसे संयुक्त सचिव या विज्ञान संकाय प्रतिनिधि के रूप में चुनाव लड़ने का अनुरोध किया । मैंने सोचा, ‘‘ छात्र राजनीति का हिस्सा बनने से पढ़ाई का भारी नुकसान हो जाएगा ।‘‘ मैंने मित्रों को चुनाव न लड़ने की अपनी मंशा बता दी ।
  एम.एस-सी, बी.एड और पत्रकारिता स्नातक की पढ़ाई के दौरान कभी मुझे चुनाव लड़ने के बारे में सोचने का समय नहीं मिला । जब मैंने एम.एड में प्रवेश लिया तो एक दिन श्रीनगर बाजार में घूमते-घूमते मित्र रघुनन्दन पुरी ने मुझसे कहा,‘‘ चमोला जी! शिक्षा संकाय प्रतिनिधि पद पर कोई दावेदार नहीं है। तुम नामांकन करा लो । निर्विरोध चुन लिए जाओगे ।‘‘
 मैंने सोचा,‘‘ एम.एस-सी की तुलना में यहांॅ इतना लोड नहीं है। इसलिए निर्विरोध शिक्षा संकाय प्रतिनिधि बनने में बुराई भी नहीं है।‘‘
  उस समय बी.एड में 150 से 200 तक की सीटें रहती थी और एम.एड में मात्र 15 सीटें थी । ये ही शिक्षा संकाय प्रतिनिधि के पद के लिए वोटर थे । मैंने अपना नामांकन करा लिया । इसके बाद जब मैंेने एम.एड में पढ़ने वालों से संपर्क करना चाहा तो पता चला कि एडमिशन कराने के बाद अधिकांश लोग अपने घर जा चुके हैं। जब बी.एड वालों से मैं संपर्क कर रहा था तो मैंने देखा एक व्यक्ति छह सात लड़कों से घिरा हुआ था । मुझे देखकर वह बोला,‘‘भाई साहब! शिक्षा संकाय प्रतिनिधि पद के लिए लड़ रहा हूंॅ । मुझे आपका आशीर्वाद चाहिए ।‘‘ मेरे बगल में खड़े मेरे एक समर्थक ने मेरी ओर संकेत करते हुए कहा,‘‘ आप भी इसी पद के लिए लड़ रहे हैं।‘‘ वह बोला,‘‘ मैं बी.एड का हूंॅ । मेरे पास 170-180 बी.एड में पढ़ने वाले वोटर हैं। आपके पास एम.एड के मात्र 15 लोग । उनमें से भी 4-5 तो मेरे पक्के समर्थक हैं। इसलिए आपका हारना तय है।‘‘ मैंने उस व्यक्ति को अपनी चुनाव लड़ने की मंशा बता दी।  बाद में पता चला कि एक और ने भी अपना नामांकन कराया है।  इस प्रकार शिक्षा संकाय प्रतिनिधि पद के लिए कुल तीन दावेदार मैदान में रह गए थे । एक मैं एम.एड से था और दो बी.एड से । अगर कक्षावार  वोटों का ध्रुवीकरण होता तो मुझे मात्र 15 वोट मिलती । अंत में एक उम्मीदवार ने दूसरे के समर्थन में अपना नाम वापस ले लिया । अब मैदान में केवल हम दो ही रह गए थे ।
   यद्यपि यह बड़े पद का चुनाव नहीं था लेकिन मेरे सामने बड़े पद पर चुनाव लड़ने से भी विकट परिस्थितियां थी ।  चुनाव का परिणाम आया और मुझे विजयी घोषित किया गया । मेरी जीत ऐतिहासिक थी क्योंकि इससे पहले हमेशा बी.एड में पढ़ने वालों में से ही शिक्षा संकाय प्रतिनिधि चुना जाता रहा था ।
   एक बार छात्र संघ ने कुछ मांगों को लेकर विश्वविद्यालय में रोज धरने पर बैठने का निर्णय लिया । नियमित धरना चलता रहा ।  मैं भी रोज धरने में शामिल रहा । एक दिन मुझे पर्वतीय अंचल में जड़ी बूटियांविषय पर वार्ता के लिए आकाशवाणी पौड़ी बुलाया गया था। मैं रिकार्डिंग के लिए नियमित समय पर आकाशवाणी केन्द्र पौड़ी पहुंॅच गया । रिकार्डिग करने के बाद जब मैं शाम को श्रीनगर पहुंॅचा तो गोला बाजार में कुछ साथी मिल गए ।  मुझे देखकर वह बोले,‘‘ अरे ! तुम यह यहांॅ ? ‘‘ मैंने कहा, ‘‘क्यों ? वे बोले, ‘‘ आज तो छात्र संघ के सभी पदाधिकारियों को पौड़ी जेल भेज दिया गया है। तुम कैसे रह गए ? ‘‘
    कुछ दिन पौड़ी जेल में रहते हुए जब छात्र संघ पदाधिकारी वापस आए तो उनका अभिनन्दन किया गया । अभिनन्दन समारोह में मैंने कहा,‘‘ जन हितों के लिए जेल जाना नेता के बायोडाटा को मजबूती देता है। मैं तो नेता बनते- बनते बाल बाल बच गया ।


कुछ बातें, कुछ यादें 21, ‘निरबिजु‘ ( गढ़वाली ) उपन्यास सृजन से जुड़ी यादें




    मेरा बचपन गांवों में बीता । गांव में हरे-भरे खेत और  जंगल मुझे बहुत अच्छे लगते । इन स्थानो में जाकर मन को असीम शांति का अहसास होता । इनके अलावा मेरा मन उन स्थानो में भी जाने को करता जो उजाड़ हैं   हरे-भरे जंगल के बीच ऐसे कई स्थान होते। मैं वहां बैठकर सोचता    मन में कई प्रश्न उठते ।  बाल मन उन प्रश्नो के उत्तर कल्पनाओं के माध्यम से खोजने का प्रयास करता । कभी कहीं कोई खंडहर दिखाई देता तो वहां बैठने का मन करता । मन में कई प्रश्न उठते। पहले यहां क्या रहा होगा ? जब यहां आबाद रहा होगा तो यहां क्या-क्या होता होगा ?  इसके खंडहर होने के क्या कारण रहे होंगे ?
     इन उजाड़ स्थानो की मन में बैठी स्मृतियां उथल-पुथल मचाने लगती । बहुत समय के बाद मन में विचार आया कि क्यों न ऐसी स्थिति पर एक उपन्यास लिखा जाए । वर्ष 2004 में  नरेन्द्र नगर आने के बाद इस पर मंथन करता रहा । वर्ष 2004 -5 में निरबिजु  नाम से इस उपन्यास की पांडुलिपि तैयार हो गई । नरेन्द्र नगर में डा. नागेन्द्र ध्यानीअरुणऔर मैं शाम को घूमने जाते थे । मैंने उन्हें उपन्यास की कहानी सुना दी । सुनकर वह बोले, ‘‘ बंधु ! मुझे यह उपन्यास बहुत अच्छा लग रहा है। यह एक ऐतिहासिक लोक उपन्यास की झलक दे रहा है। यह वर्तमान समय में व्याप्त अनैतिकता , अनाचार और पर्यावरण संरक्षण के प्रति उदासीन मनुष्य की आंखें खोलने वाला है।‘‘ डा. ध्यानी जी की बातों से उत्साह बड़ गया । बाद में मैंने इस उपन्यास की चर्चा डा शेष नारायण त्रिपाठी जी से भी की । उन्होंने भी मेरा उत्साह बढ़ाया ।
  इस उपन्यास में कल्पना की गई कि कोई ऐसा उजाड़ स्थान है जहां वर्तमान समय में कुछ नहीं उगता है। वहां कभी खूबसूरत जगह थी । धरती के इस टुकड़े पर कभी एक राजा का शासन चलता था । उस राजा ने कुछ भारी भूलें की थी । उसके द्वारा धरती पर किए अत्याचारों को धरती माता भी सहन न कर सकी । धरती ने वहां कुछ भी उपजाना बंद कर दिया । इस उपन्यास का सार उपन्यास के पात्र धर्मदत्त पुरोहित की इन बातों में झलकता है-
  कू भलू कू छ नखरू, जब पच्छाणे नि जांदू,
  धर्म कि मुखिड़ि पैरी, अधर्म  अग्वाड़ि आंदू,
  मनख्यात नी कखि दिखेन्दि, धर्म जख रोइ जांद,
  तै राज या घौर कू निरबिजू होई जांद ।

 

गुरुवार, 25 जून 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 20, सी.सी.आर.टी. प्रशिक्षण और ‘कविता चोर‘ कविता की चोरी




वर्ष 2002 की बात है। मैं राजकीय इंटर कालेज लमगौण्डी जिला रुद्रप्रयाग में   कार्यरत था । जिला रुद्रप्रयाग से मेरा नाम सी.सी.आर.टी. प्रशिक्षण के लिए भेजा गया था । जून के महीने के अवकाश के बाद जुलाई में मैं जब विद्यालय पहुंचा तो मेरे नाम से एक डाक आई थी । मैंने लिफाफा खोला तो पता चला कि वह डाक सी.सी.ई.आर.टी. नई दिल्ली से आई थी ।  इसमें लिखा था कि कि प्रशिक्षण में आने के लिए 15 जून तक अपनी सहमति भेजनी अनिवार्य है। तभी 15 जुलाई से होने वाले प्रशिक्षण मे भाग लिया जाना संभव होगा । यह पत्र सी.सी.आर.टी. नई दिल्ली के तत्कालीन उप निदेशक श्री गिरीश च्ंाद्र जोशी जी के हस्ताक्षर से आया था । मैंने श्री जोशी जी को एक पत्र भेजा ।  इसमें मैंने उन्हें अवगत कराया थ कि जून में अवकाश होने के कारण मैं सहमति पत्र नहीं भेज पाया था । अतः भविष्य में मुझे प्रशिक्षण के लिए आमंत्रित किया जा सकता है।
    कुछ समय के बाद श्री गिरीश चन्द्र जोशी जी द्वारा भेजा गया एक पत्र मुझे मिला । इसमें लिखा हुआ था कि माह दिसंबर में पप्पनकलां द्वारिका नई दिल्ली में चलने वाले प्रशिक्षण में मैं चाहूं  तो जिला विद्यालय निरीक्षक की अनुमति लेकर जा सकता हूं ।  जिला विद्यालय निरीक्षक रुद्रप्रयाग से अनुमति मिलने के बाद मैं सी.सी.आर.टी. प्रशिक्षण के लिए नई दिल्ली जाने के लिए रवाना हो गया । प्रशिक्षण में देश के अलग-अलग राज्यों के लोगों से परिचित होने का अवसर मिला । ऐसा लगता था जैसे भारत माता अपनी सांस्कृतिक विवधताओं के साथ हमें अपना दर्शन दे रही है 25 दिन की लंबी अवधि के बाद वहां कई मित्र बन गए । वहां से वापस आने के बाद भी कई वर्षों तक उन मित्रों से पत्र व्यवहार चलता रहा ।  प्रशिक्षण के दौरान मध्य प्रदेश और गुजरात के साथियों के साथ ही मुझे कमरा मिला । इस प्रशिक्षण में देश भर से 120 से अधिक शिक्षकों ने भाग लिया था ।
    हम हास्टल की जिस मंजिल में रह रहे थे, वहां के कुछ शिक्षकों ने तय किया कि रात को भोजन के बाद एक हालनुमा कमरे में साहित्यिक - सांस्कृतिक कार्यक्रम किया जाएगा ।  हमारे कमरे के साथी भी समय पर कार्यक्रम का मजा लेने उस कमरे में पहुंच गए ।  वहां एक साथी ने चार कविताएं सुनाईं। सभी ने ताली बजाकर उनका उत्साह बड़ाया । वे कविताएं किसी और के द्वारा लिखी गई थी । वे उन्हें स्वरचित कविता कहकर सुना रहे थे । कई लोग ऐसे होते हैं जिन्हें बहुत सारी कवितायें याद रहती हैं किन्तु उन्हें उनके रचनाकारों का नाम पता नहीं होता । ऐसे लोगों की इतनी सारी कविताओं को याद रखने की विलक्षण प्रतिभा की सराहना तो की जानी ही चाहिए ।  ये व्यक्ति भी दो प्रकार के होते हैं- एक वे जो रचनाकार का नाम न जानने के कारण उनके नाम को उद्धृत नहीं कर पाते हैं लेकिन वे किसी कवि की रचना सुना रहा हूं जैसा कथन बोलते हैं जबकि कुछ लोग दूसरे की लिखी कविता को धड़ल्ले से अपनी कविता कह कर सुनाते हैं
  कार्यक्रम के बीच में मेरे रूम पार्टनर मध्य प्रदेश के साथी श्री जगदीश सोमेडिया ने मेरा परिचय कराया और मुझे भी कविता पढ़ने के लिए आमंत्रित किया । मैंने  तीन -चार कवितायें  सुनाई । कविता सुनाते-सुनाते मेरे मन में कुछ पंक्तियां ‘  कविता चोरकवियों के बारे में आई-
बड़ा वही कवि आजकल जो कविता का चोर,
कविता की बखिया उधेड़े, करे सभी को बोर,
करे सभी को बोर, जोरों से चिल्लाए,
जिसे देखकर जनता कानो पर हाथ लगाए।‘‘
 यद्यपि यह कविता साहित्यिक दृष्टि से कमजोर रही होंगी किन्तु इसमें तात्कालिकता का भाव था । इस कविता को सुनाकर मैं सोच रहा था कि दूसरों की लिखी कविता को अपने नाम से सुनाने वाले साथी इस कविता को सुनकर सचेत हो जाएंगे और उनके मन में अपराध बोध की भावना जाग्रत होगी । दूसरे दिन हमारी मंजिल के नीचे विश्राम करने वाले शिक्षकों ने भी एक कवि सम्मेलन करने का निर्णय लिया । आयोजक ने मुझसे भी उस कार्यक्रम में सम्मिलित होने का विशेष आग्रह किया था । उस कार्यक्रम में भी वही साथी आज फिर दूसरों की लिखी कविताओं  को अपनी कह कर सुना रहे थे । उन्होंने कल मेरी सुनाई हुई कविता चोरकविता को भी अपनी कविता बताकर  मेरे ही सामने सुना दिया । 





रविवार, 21 जून 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 19 ‘पड़्वा बल्द‘(व्यंग्य कविता संग्रह) सृजन से जुड़ी बातें/यादें




बचपन की बात है। हमारे पास बैलों की एक जोड़ी थी । इनमें एक काले रंग का था और दूसरा भूरा और लाल रंग का था । काले रंग के बैल को कळ्या और दूसरे को कफ्ळू नाम से हम पुकारते थे । कळ्या बल्द चुस्त था । वह लड़ाकू भी था । किसी दूसरे बैल के साथ लड़ता था तो उसे भगाकर ही मानता था । कफळू बैल कुछ सुस्त सा था । वह दूसरे बैलों से लड़ता नहीं था किन्तु खड़े होकर पैर आगे करके अपनी भौंहें टेड़ी करता था । उसे इस मुद्रा में देखकर कुछ बैल उससे डर कर भाग जाते थे । यदि कोई बैल उसकी इस मुद्रा से डरता नहीं था तो कफळू बैल डर कर स्वयं भाग जाता था । वैसे तो कफळू बैल सुस्त था लेकिन उसे यदि हरा-भरा खेत दिखाई दे जाए तो वह बहुत तेजी से दौड़कर उजाड़ खाने चला जाता था । कुछ समय बाद हमने बैलों की एक नईं जोड़ी खरीद ली । इनमें से एक का रंग काला और दूसरे का लाल और भूरा रंग था । जब पहली बार बैलों की इस नईं जोड़ी को खेत में हल लगाने के लिए ले जाया गया तो काले रंग वाला बैल खेत की एक पट्टी (स्यूं) हल लगाने के बाद अचानक बैठ गया । हल लगाने वाले व्यक्ति ने कहा, ‘‘आपका यह बल्द पड़्वा है।
    वर्षों तक बचपन की ये स्मृतियां  मन में तैरती रहीं । एक दिन मन में विचार आया कि क्यों न बैलों के विभिन्न प्रकारों को कविता में प्रतीकात्मक रूप से अभिव्यक्त किया जाए । इसी विचार ने दो कविताओं ने जन्म दिया । एक कविता पड़्वा बल्दपर आधारित थी और दूसरी कविता में एक पड़्वा बल्द और एक हळ्या बल्द (हल लगाने वाला बैल) की आपस में वार्ता को दिखाया गया था । इसमें पड़्वा बल्द , हल लगाने वाले बल्द से कहता है , ‘‘मेरी जब मर्जी आती है तब मैं हल लगाता हूंॅ ।  तेरी तरह  काम के बोझ में दबा नहीं रहता हूंॅ। अंत में वह कहता है, ‘‘ मी जना उजाड़्या बल्द, संगति छन देश मा, मी छौ बल्द जोनि मा, सि छन मनखि भेष मा (मेरी तरह उजाड़ खाने वाले बैल देश में सारी जगह हैं किन्तु अंतर इतना ही है कि  मैंने बैल की योनि में जन्म लिया है और वे मनुष्य के भेष में हैं।) 
   बैलों पर आधारित इन कविताओं को पड़्वा बल्दगढ़वाली व्यंग्य कविता संग्रह में स्थान दिया गया जो वर्ष 2015 में प्रकाशित हुआ । इन कविताओं में पड़्वा बल्दसमाज में कामचोरी की प्रवृत्ति में माहिर लोगों  और उजाड्या बल्द भ्रष्टाचारी व्यक्तियों के  प्रतीक के रूप में वर्णित किए गए ।  इस पोस्ट के साथ पड़वा बल्द और उजाड़्या बल्द से संबंधित दो कविताएं  भी आपके पठनार्थ प्रस्तुत हैं।



शनिवार, 20 जून 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 18 - उपन्यास ‘कचाकि‘ से जुड़ी बातें


     गढ़वाल में बहुत पहले से तंत्र -मंत्र के प्रयोग के किस्से  सुनने को मिलते रहे हैं । हम बचपन में सुनते थे कि अमुक स्त्री का पति उसके वश में नहीं था । उसने कुछ कराया-खिलाया तो वह उसके वश में हो गया या फलां आदमी पर तंत्र-मंत्र का प्रयोग किया गया तो वह पागलों जैसा व्यवहार करने लगा है।  यह बातें तो सुनी सुनाई थी  परंतु वर्ष 2001 से 2003 के आस-पास मुझे तंत्र-मंत्र संबंधी विचित्र घटनाओं का सामना करना पड़ा । एक व्यक्ति मेरे साथ रहता था । उससे मेरा आत्मीय रिश्ता था । वह  बीच-बीच में अपने घर चला जाता था । उसके जाने के बाद मेरे कुछ कपड़े जैसे कमीज या कुर्ता मुझे ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलता था । जब वह  अपने घर से लौटकर मेरे पास आ जाता तो वह कपड़े उसके थैले में मिलते। उन कपड़ों पर पिठांई के निशान मिलते ।  कभी-कभी वह अपने घर से टूटे फूटे बरतन भी वहांॅ ले आता ।
   एक रात की बात है। मैं सो रखा था । आधी रात का समय था । उस व्यक्ति ने अपने थैले से एक काली डोरी निकाली । आधी रात को वह उस काली डोरी से मेरी लंबाई मापने लगा । मेरी नींद खुल गई । मैंने उससे कहा,‘‘यह क्या कर रहे हो ? ‘‘ वह बोला, ‘‘ मैं यह देखना चाहता था कि आप कितने लंबे हैं ?‘‘
 इस  घटना के कुछ दिनो के बाद उस व्यक्ति ने मुझसे कहा, ‘‘ चलो, आप और मैं कुछ दिनो के लिए मेरे घर चलते हैं ‘‘  मैं राजी हो गया । मैं उसके साथ उसके घर चला गया । मेरी आदत है कि मैं रात को कम से कम एक बार तो बाहर आता ही हूं । उस रात को भी मैं बाहर आया । मुझे अजीब सी आवाजें सुनाई दी । मैं आवाज की दिशा में आगे बढ़ा । मुझे यह आवाज एक कमरे से आती हुई लगी। मैं उस कमरे की खिड़की के पास खड़ा हो गया । खिड़की से अन्दर का दृश्य देखकर मैं अचंभित हो गया । वहां हवन चल रहा था । हवन कुण्ड के पास आटे से बनाई एक लंबी आकृति रखी हुई थी । हवन करवाने वाला व्यक्ति बोला,  ‘‘क्या यह पुतला उस आदमी की लंबाई के बराबर बनाया गया है ?‘‘
‘‘हां , मैंने डोरी से उसकी लंबाई अच्छी तरह नाप ली थी ।‘‘- मेरे साथ रहने वाला वह आदमी बोला ।
‘‘अब इस पुतले की प्राण प्रतिष्ठा करनी होगी । जिस पर टोणा मोणा कर रहे हो अब उसका, उसके माता-पिता और गोत्र का नाम बताओ।‘‘ - हवन करवाने वाला आदमी बोला ।
उसकी बात को सुनकर हवन कुण्ड के पास बैठा मेरे साथ रहने वाला वह आदमी मेरा, मेरे माता- पिता , गांॅव ,गोत्र आदि का नाम बोलने लगा । इसके बाद हवन कराने वाला जोर-जोर से कहने लगा, ‘‘ तुझे सब देवताओं का शाप लगेगा जो तूने (मेरा नाम लेकर) इसका और इसके घरवालों का विनाश नहीं किया । तू इनकी छासी नासी, पताळ बासी करा देना । तू नरक में रहेगा जो तूने कहीं अपना और हमारा नाम बताया ।‘‘
 एक बार फिर वह आदमी बोला, ‘‘ मैं गाय की पूंछ के बाल, खलड़ा, नाखून का चूरा और मुर्दा घाट की राख को मिक्स करके भी साथ लाया हूं । यह तुम्हें उसके खाने में मिलाकर 21 दिनो तक उसे खिलाना है। हां! श्मशान घाट की राख का टीका भी उस आदमी के कपाल पर 21 दिनो तक लगाना होगा। तुम्हारा काम हो जाएगा । अब देर मत करो । इस पुतले को चैराहे में दबाना है अभी ।‘‘
 जैसे ही वे आटे से बनाए मेरे पुतले को बाहर लाने लगे, मैं खिड़की की तरफ से दौड़कर अपने सोने के कमरे में चला गया । उन्हें पता नहीं चला कि मैंने उनका तंत्र प्रयोग देख लिया है। दूसरे दिन हम दोनो उनके घर से वापस आ गए । अपने घर में जब मैं सुबह नहाया । वह आदमी श्मशान घाट की उस राख को मेरे कपाल पर लगाते हुए बोला,‘‘ कल कोई केदारनाथ से आया था । वह इस बभूत को लाया था । तुम्हें 21 दिनो तक इसका टीका रोज लगाना होगा । ‘‘
  इस घटना ने मुझे तंत्र-मंत्र के बारे में सोचने पर विवश कर लिया था।  भले आधुनिक वैज्ञानिक युग मंे तंत्र-मंत्र महज एक अंधविश्वास है किन्तु  एक बात स्पष्ट है तंत्र-मंत्र करने वाला दूसरे के अनिष्ट की इच्छा रखता है। उसकी मंशा दूसरे को नुकसान पहुंॅचाने की रहती है।  वह व्यक्ति विश्वास करने योग्य नहीं होता है। तंत्र मंत्र में सफल न होने पर वह किसी और माध्यम से भी आपको नुकसान पहुंॅचा सकता है। तंत्र करने वाला व्यक्ति दूसरे का न खाने योग्य पदार्थ खिलाता है जो उसके शरीर में निश्चय ही विकार पैदा करेंगे।
  अपने साथ घटी इन घटनाओं को आधार बनाकर मैंने कचाकिउपन्यास लिखा । यह सन 2014 में प्रकाशित हुआ । इस उपन्यास में खलनायिका के रूप में मासंतीपात्र द्वारा अपनी सौतेली बेटी के पति पर तंत्र-मंत्र का प्रयोग किया जाता है।  इस उपन्यास की समीक्षा डाॅ. नंद किशोर ढौंडियाल अरुण‘, डाॅ. नागेन्द्र जगूड़ी नीलांबरमऔर श्री भीष्म कुकरेती द्वारा की गई । इस उपन्यास में मैंने अपने द्वारा खिड़की से देखी गई तांत्रिक प्रक्रियाओं का वर्णन उपन्यास के नायक प्रभातके माध्यम से किया था । डाॅ. नागेन्द्र जगूड़ी नीलांबरम ने उत्तराखण्ड स्वरपत्रिका में इस उपन्यास की समीक्षा करते हुए लिखा था कि पहले उन्हें लगा कि उपन्यासकार द्वारा तंत्र प्रयोग के इस दृश्य को उपन्यास में नहीं दिखाना चाहिए था किन्तु पूरा उपन्यास पढ़ने के बाद उन्हें लगा कि यह दिखाना जरूरी था ।    


शनिवार, 13 जून 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 17 - ‘पथ्यला‘ (गीत -कविता संग्रह) में प्रकाशित गीत ‘उत्तराखण्ड बणी गाई‘ से जुड़ी यादें


वर्ष 1998 की बात है । मुझे अपने शोध के सिलसिले में मेरठ विश्वविद्यालय जाना था । मैं शाम को मेरठ पहुंचा । एक होटल में विश्राम करने के बाद मैं सुबह मेरठ विश्वविद्यालय की तरफ चला गया । मुझे जोर की भूख लगी हुई थी । विश्वविद्यालय से बाहर कुछ दूरी पर एक छोटा होटल था । मैंने सोचा,‘‘पहले जमकर नाश्ता कर लूं। इसके बाद विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में जाकर अपने शोध से संबंधित कार्य करूंगा । मैंने होटल में भोजन के बारे मे पता किया । होटल के मालिक ने मुझसे बातचीत की । उसने मुझे मेरठ आने का उद्देश्य पूछा । उसने मुझे यह भी सुझाव दिया कि यदि मैं चाहूं तो विश्वविद्यालय में काम होने तक अपना बैग होटल में रख सकता हूं । बातों -बातों में जब उसे पता चला कि मैं उत्तराखण्ड का रहने वाला हूं । उसने मुझे बताया कि उसके होटल में एक कर्मचारी उत्तराखण्ड का है। उसने उसको आवाज दी । वह दौड़ा -दौड़ा आया । उसने मुझसे पूछा, ‘‘ तुम कखा छन?‘‘ मैंने कहा, ‘‘ रुद्रप्रयाग जिला कु रौण वाळु छौं ‘‘  वह बड़ी आत्मीयता से मुझसे उत्तराखण्ड के मौसम, खेती आदि के बारे में बात करने लगा । वह मुझे पीने के लिए ठण्डा पानी लाया । होटल में अन्य लोग भी खाने के लिए आए थे किन्तु उसका ध्यान  मेरी ही ओर था । नाश्ता करने के बाद मैं विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में चला गया । वहां मैंने लगभग दो बजे तक अपना काम किया । इसके बाद मैं दिन के भोजन के लिए उसी होटल में चला गया । दिन के भोजन के बाद मैंने बचा हुआ काम शाम तक पूरा कर लिया । इसके बाद रात को मैं उत्तराखण्ड वाली बस में बैठ गया ।
    मेरे मन में होटल का वह दोस्त घूमने लगा । मैं सोचने लगा कि यदि उत्तराखण्ड अलग राज्य के रूप में बन गया तो क्या इस दोस्त जैसे होटल में काम करने वाले लोग रोजगार के लिए उत्तराखण्ड वापस लौट आएंगे ? मेरे दिमाग में एक गीत की थीम आ गई । कोई व्यक्ति होटल में उत्तराखण्ड से बाहर नौकरी कर रहा है। इसी बीच उत्तराखण्ड राज्य के गठन की घोषणा हो जाती है।  यह सुनकर होटल में काम करने वाला वह युवक प्रसन्न हो जाता है। वह खुशी में अपनी मांॅ को एक चिट्ठी लिखता है। इस चिट्ठी में वह प्रवासी जीवन की कठिनाइयों और अपने रोजगार की परेशानियों का जिक्र करता है। वह आशा व्यक्त करता है कि अब उत्तराखण्ड अलग राज्य के रूप में बनने वाला है। इसलिए उसके खौरी (विपत्ति) के दिन समाप्त होने वाले हैं। वह अपनी रोजी रोटी के लिए अपने गांॅव वापस आने का विचार  करता है। मैंने इस थीम पर छह- सात गीतांश तैयार कर लिए । यह गीत पथ्यलागीत-कविता संग्रह में प्रकाशित हुआ था। गीतों की समीक्षा की श्रृंखला के अंतर्गत रंत रैबारमें श्री ईश्वरी प्रसाद उनियाल जी द्वारा लिखी इस गीत की समीक्षा प्रकाशित  हुई ।  उन्होंने इस समीक्षा में उत्तराखण्ड निर्माण के इतने दिनो के बाद भी यहां
रोजगार के अवसर पैदा होने के बजाए निरंतर होेते पलायन पर चिन्ता प्रकट की । इस पोस्ट के साथ श्री ईश्वरी प्रसाद उनियाल जी द्वारा लिखी गई समीक्षा भी दी गई है।


शुक्रवार, 12 जून 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 16 - ‘पथ्यला‘ (गीत -कविता संग्रह) के शीर्षक गीत/कविता से जुड़ी यादें





मित्र कई बार पूछते हैं, ‘‘ आप क्यों लिखते हो ? लिखा है तो इसी विषय पर क्यों लिखा है ? ‘‘ जब लेखक के आस-पास कोई ऐसी घटना घटित होती है जो उसे अन्दर से झकझोर देती है तो कविता के रूप में एक भावधारा कागज पर उतर आती है। जब वह बहुत अधिक आनंदित होता है तब भी ऐसी स्थिति आ सकती है। कवि की दृष्टि मामूली सी समझी जाने वाली घटना में भी ऐसी स्थिति देखकर महसूस कर सकती है।
कई बार ऐसी स्थिति भी आती है जब किसी पत्र-पत्रिका के संपादक या किसी कार्यक्रम के आयोजक का संदेश प्राप्त होता है कि अमुक विषय पर इस तारीख तक कोई कविता भेज दीजिए । ऐसे में यदि रचनाकार के पास पहले से बनी कोई कविता न हो तो उसे बैठकर और सोच समझ कर दिए गए विषय पर कविता रचनी पड़ती है। इस प्रकार लिखी गई कविता से वह आत्म संतुष्टि और आनन्द प्राप्त नहीं होता जो किसी घटना को देखते हुए स्वतः जन्म लेती है।
  यहांॅ पर संदर्भ है मेरे गढ़वाली गीत कविता संग्रह पथ्यलाके शीर्षक गीत /कविता हम पथ्यला बौण का। बात वर्ष  2000 की है। मैं राजकीय इण्टर काॅलेज लमगौण्डी जिला रुद्रप्रयाग में कार्यरत था । बोर्ड परीक्षा के समय मूल्यांकन पुस्तिकाओं का बण्डल संकलन केन्द्र राजकीय इण्टर काॅलेज अगस्त्यमुनि में जमा करना पड़ता था । लमगौण्डी से अगस्त्यमुनि जाने के दो रास्ते थे। एक था लमगौण्डी से जीप में बैठकर गुप्तकाशी जाने का । वहां से जीप या बस से अगस्त्यमुनि पहुंचने का  । दूसरा  लमगौण्डी से कुण्ड जंगल से होकर पैदल   रास्ता था । लमगौण्डी से गुप्तकाशी वाले रास्ते दिन के समय जीपें कम मिलती थी । इसलिए मुझे यह  पैदल वाला रास्ता अधिक सुविधाजनक लगता था । मैं प्रायः इसी रास्ते से कुण्ड आकर अगस्त्यमुुनि वाली बस मैं बैठकर अगस्त्यमुनि पहुंॅच जाता था । लमगौण्डी से कुण्ड पैदल रास्ता घने जंगल से होकर गुजरता है। यह रास्ता बहुत सुनसान था । भरी दोपहर में जंगल में पक्षियों और झींगुर की आवाज जंगल में गूंजती रहती थी । हवा की सनसनाहट जंगल के सन्नाटे को और भी बड़ा देती  थी । इस सुनसान जंगल का रास्ता सूखे पत्तों से भरा रहता था । मैं इस रास्ते मूल्यांकन की पुस्तिकाओं के बण्डल लेकर जा रहा था । मैं इन पत्तों के बीच मैं अचानक फिसल गया । इस समय मेरे मन में यह पंक्तियां आईं-
  ‘‘ ठौर नी ठिंगणू नी,
    बथों चै जख लिजौ,
    कैका खुट्योन कुर्चि जौं,
    बट्वे रौड़ु गाळि खौं,
    अपणि छ्वीं लगौण क्या,
    हम पथ्यला बौण का ।‘‘

 यह पंक्तियां मैंने झटपट अपनी जेब में रखे कागज पर नोट कर दी । संकलन केन्द्र में बण्डल जमा करने के बाद अगस्त्यमुनि से गुप्तकाशी पहुंचते -पहुंचते बस में इस कविता के 6-7 पद्यांश तैयार हो गए । घर आकर शाम को मैंने इन्हें डायरी में व्यवस्थित रूप से नोट कर दिया ।  बाद में सन् 2011 में प्रकाशित गढ़वाली गीत कविता संग्रह पथ्यलामें यह रचना शीर्षक गीत /कविता के रूप में सम्मिलित की गई। रंत रैबारमें श्री ईश्वरी प्रसाद उनियाल जी ने इस पुस्तक में दिए गए  हर गीत की अलग-अलग समीक्षा लिखी । उन्होंने हम पथ्यला बौण का गीत को विकास रूपी आंधी से हुए पलायन की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति लिखा ।