सोमवार, 28 अगस्त 2017




सहज-सरल – सुगम शिक्षण : परिणामोन्मुखी    शिक्षण के लिए एक दिग्दर्शिका

      शिक्षण प्राचीन काल से ही दार्शनिकों, शिक्षा के अध्येताओं और चिंतकों के लिए विचार विश्लेषण का विषय रहा है | शिक्षण को परिणामोन्मुखी बनाने के लिए कई अध्ययन और शोध किये गए हैं | इसके अलावा शिक्षण की प्रक्रिया में शिक्षकों द्वारा व्यक्त अनुभव शिक्षण को समझने,शिक्षण में आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों तथा उनके समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं | प्राथमिक शिक्षकों के शिक्षण को सरल बनाने के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए पुस्तक ‘सहज-सरल-सुगम शिक्षण’ लिखी गई है जिसका संपादन प्रो ० दुर्गेश पन्त, निदेशक उत्तराखण्ड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसन्धान केंद्र देहरादून,प्रो० जे० के ० जोशी,वरिष्ठ वैज्ञानिक सलाहकार उत्तराखण्ड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसन्धान केंद्र देहरादून,डॉ० ओम प्रकाश नौटियाल वैज्ञानिक उत्तराखण्ड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसन्धान केंद्र देहरादून तथा डॉ० सुनील कुमार गौड़ शिक्षक –प्रशिक्षक राज्य शैक्षिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद् उत्तराखण्ड देहरादून द्वारा किया गया है |
 इस पुस्तक के माध्यम से संपादक मण्डल द्वारा शिक्षण,अध्ययन और शोध सम्बन्धी अनुभवों से प्राप्त ज्ञान को पाठकों से साझा करने का प्रयास किया गया है | पुस्तक की विषयवस्तु को १५ अध्यायों में बांटा गया है | इन अध्यायों में प्रभावी शिक्षण,बोलना,दूसरी भाषा को सीखना,व्याकरणीय, सामाजिक –भाषाई और युक्ति दक्षता पर प्रकाश डाला गया है | इसके अलावा पढना सीखना और सिखाना ,पठन कौशल का शिक्षण, लिखना, आंकिक चिंतन,संगीत एवं पठन कौशल,न्यूरोप्लास्टिसिटी, हैन्डेडनेस ( बांये / दांये हाथ से लिखने की प्रवृत्ति ) तथा शिक्षण में हास -परिहास के महत्व को समझाया गया है |
  ‘प्रभावी शिक्षण कार्य’ के अंतर्गत सीखने की प्रक्रिया, लिखने – पढने के कौशल, मानव बुद्धि के विभिन्न प्रकारों, शैक्षिक प्रक्रियाओं, शैक्षिक उपलब्धि के मूल्यांकन की प्रक्रियाओं आदि से सम्बंधित जानकारियों के साथ शिक्षा से जुड़े सिद्धांतो और बातों की समझ को आवश्यक बताया गया है | साथ ही आवश्यक कौशलों के शिक्षण में महत्व को भी बताया गया है | शिशु के जन्म से 24 माह की अवधि तक बच्चों में बोलने के कौशल के चरणबद्ध विकास पर अध्याय 2 ‘बोलना’ में प्रकाश डाला गया है |  इसमें यह बताया गया है कि जन्म के तुरंत बाद शिशु माँ की आवाज की लय /ताल –ध्वनि के साथ प्रतिक्रिया व्यक्त करना शुरू कर देता है | 6 माह में वह शब्द ध्वनि की पहचान करने में सक्षम हो जाता है | १२ माह में वह शब्दों से अर्थ जोड़ना शुरू कर देता है | १८ माह में वह संज्ञा और क्रिया के अन्तरो  को पहचानना शुरू कर देता है | अध्याय में इस वैज्ञानिक सत्य को भी उल्लखित किया गया है कि एक शिशु के मस्तिष्क में अवस्थित तंत्रिका कोशिकाएं दुनियाँ की सभी भाषाओँ की ध्वनियों के प्रति प्रतिक्रिया देने में सक्षम होती है | इसलिए इस जन्मजात क्षमता के सम्यक उपयोग के लिए ऐसा वातावरण सृजित किया जाना चाहिए जिससे उन्हें अनेक शब्द और वाक्य सुनने को मिलें |इसके साथ ही इस अध्याय में जन्म के बाद के प्रारम्भिक वर्षों में शिशु को अधिकतम चीजों के अवलोकन पर बल दिया गया है |
 ‘दूसरी भाषा को सीखना’ अध्याय में दूसरी भाषा के महत्व को समझाया गया है |इसमें स्पष्ट किया गया है कि दूसरी भाषा को सीखने के लिए उपयोग में लाई जाने वाली युक्तियाँ बच्चों की मातृभाषा की समझ और उसको बोलने की योग्यता में सहायता पहुँचाती है | इसके बाद के अध्यायों में व्याकरण से सम्बंधित दक्षता ( जैसे शब्द भंडार,भाषाई चिह्न विधान के नियम,शब्द निर्माण तथा वाक्य संरचना),सामाजिक –भाषाई दक्षता (व्याकरण के स्वरूपों का सामाजिक सन्दर्भों के अनुरूप उपयोग करना ),संवाद दक्षता,युक्ति दक्षता (शारीरिक हाव भाव तथा एक ही बात को स्पष्ट करने के लिए आवश्यकतानुसार मिलते जुलते शब्दों का प्रयोग करना ) को स्पष्ट किया गया है  तथा ‘पढना सीखना और सिखाना में इस वैज्ञानिक तथ्य को बताया गया है कि मानव मस्तिष्क में पढने के लिए कोई हिस्सा निर्धारित नहीं है| अत: पढना एक स्वाभाविक योग्यता नहीं है |इसलिए विद्यालय में भेजे जाने से पहले घर –परिवार में पढने का वातावरण तैयार किया जाना चाहिए | इससे विद्यालय में उसे पढना सीखने की योग्यता प्राप्त करने में सरलता होगी | पठन कौशल का विकास करने के लिए विद्यार्थियों को सतत अभ्यास कराये जाने की आवश्यकता है | ‘लिखना’ अध्याय में लिखने के कौशल के विकास के लिए बच्चों को चित्रण के पर्याप्त अवसर दिए जाने चाहिए | देखना, सुनने और चित्रण करने के बाद लिखने का कौशल विकसित होता है | यह केवल शब्दों को लिखने के लिए ही सत्य नहीं है अपितु अंकों को लिखने में भी लागू होता है |
   प्राय: आम धारणा प्रचलित है कि संगीत का भाषा की उपलब्धि पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है जबकि गणित जैसे विषयों में उपलब्धि को यह प्रभावित नहीं करता है | ‘आंकिक चिंतन’ में इस धारणा के विपरीत बताया गया है | संगीत का प्रशिक्षण प्राप्त करते समय मस्तिष्क के जो भाग सक्रिय होते हैं वे ही भाग गणितीय प्रक्रियाओ को करते समय भी सक्रिय होते हैं | इसलिए विद्यार्थियों को संगीत सम्बन्धी गतिविधियों में भाग लेने के अवसर दिए जाने चाहिए | 4 और 5 वर्ष के बच्चों पर किये शोध के परिणामो से ज्ञात हुआ है कि संगीत कौशलों के विकास होने पर पढने के विकास में भी वृद्धि देखी गई |
   ‘हैंडेडनेस’ अध्याय में सामान्य कार्यों को दायें हाथ से करने और बांये हाथ से करने वाले लोगों के बारे में बताया गया है | यदि बच्चा स्वाभाविक रूप से बांये हाथ से लिखता है तो उसे दांये हाथ से लिखने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए | बुद्धि,जीवन में सफलता और प्रसन्नता के सन्दर्भ में दांये हाथ से लिखने और बांये हाथ से लिखने वालों के बीच कोई सार्थक अंतर नहीं होता है | इस अध्याय में बांये हाथ से लिखने वाले प्रसिद्ध व्यक्तियों जैसे अल्बर्ट आईन्स्टीन, फ्रेंक्लिन,चार्ली चैपलिन ,सचिन तेंदुलकर,करन जौहर,अमिताभ बच्चन और अभिषेक बच्चन आदि के उदाहरण दिए गए हैं |
   पुस्तक के अंतिम अध्याय ‘शिक्षण में हास –परिहास’ में शिक्षण में हास परिहास के महत्व पर प्रकाश डाला गया है | साथ ही हास –परिहास का  वातावरण बनाने में कुछ ध्यान रखने वाली बातों जैसे बच्चों का मजाक न उड़ाना,जाति धर्म आदि के आधार पर उन पर कटाक्ष न करना आदि को बताया गया है | हास –परिहास के सम्बन्ध में कुछ भ्रांत धारणाओं की ओर भी पाठको का ध्यान खींचा गया है |हास –परिहास को समय के सम्यक निवेश की संज्ञा दी गयी है |
  पुस्तक सरल भाषा में लिखी गयी है | इसमें शिक्षण से जुड़े पक्षों को  वैज्ञानिक और मनोविज्ञान पर आधारित तथ्यों के साथ पुष्ट किया गया है | पुस्तक शिक्षकों ,शिक्षक –प्रशिक्षकों और अनुसंधाताओ के लिए उपयोगी है | इसमें तथ्यों को बिन्दुवत दिया गया है |  शैक्षिक अनुभवों के साथ जोडकर इन बिन्दुओं को विस्तारित रूप दिए जाने की आवश्यकता प्रतीत होती है | पुस्तक का आवरण पृष्ठ पुस्तक की विषयवस्तु के अनुरूप है जो पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचने में सफल है | पुस्तक शीर्षक ‘सहज –सरल –सुगम शिक्षण’ के अनुरूप प्राथमिक शिक्षकों के शिक्षण को सहज सरल सुगम बनाने में सफल होगी | शिक्षक , प्रशिक्षक और अनुसंधाताओं के लिए यह एक दिग्दर्शिका के रूप में उपयोगी सिद्ध हो सकती है | पुस्तक उत्तराखण्ड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसन्धान केंद्र विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग उत्तराखण्ड शासन द्वारा प्रकाशित की गई है जिसका कोई मूल्य निर्धारित नहीं है |

प्रकाशन वर्ष -२०१६, प्रथम संस्करण | 
समीक्षक -डॉ उमेश चमोला 

गुरुवार, 24 अगस्त 2017

drishti: गीत समीक्षा (गढ़वाली) 6            बेरोजगारि कु ब्य...

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गीत समीक्षा (गढ़वाली) 6
            बेरोजगारि कु ब्यौ 
   मेरि किताबी ‘पथ्यला’ मा अयां ये गीत की  समीक्षा वरिष्ठ साहित्यकार (समीक्षक) श्री ईश्वर प्रसाद उनियाल जी द्वारा ‘रंत रैबार’ मा करे गै छै | समीक्षा का वास्ता तौंकू भौत-भौत आभार | ईं पोस्ट से पैलि  ‘ऐ जा मेरा गौं मा’  ‘पथ्यला बौण का’  ‘त्वैतें बुलोणा’ ‘रैबार’ अर ‘उत्तराखण्ड बणी ग्याई’ कि समीक्षा का बाद  गीत दगिडी ईं पोस्ट मा श्री उनियाल जी द्वारा करीं छटू  गीत ‘ बेरोजगारि कु ब्यौ ’    कि समीक्षा पेश छ |
  
             बेरोचगारि कु  ब्यौ

बेरोचगारि  मा ब्यौ करी, भौत पछ्तायूँ,
अपड़ी खैरी लाणों कु, मीं तुम मू आयूँ |

खर्च नीं छ,पर्च नीं छ, जेब हुईं  खाली,
दक्षिणा किलै नि देंद, ब्वनी छन स्याली,
जोग बिगड़ी,जाणि बुझीक यीं आफत ल्य़ायूँ,
बेरोचगारि  मा ब्यौ करी, भौत  पछ्तायूं |

हर दिन की नई –नई वींतें चेंदि  साड़ी,
कखै ल्येण क्रीम पौडर, कनकै चललि गाडी?
ब्वे बाबून ब्यौ कराई ,ऊँकि छ्वीं मा आयूँ ,
बेरोचगारि  मा ब्यौ करी, भौत  पछ्तायूं |

अंगरालो कि भ्योल पर, कन ढूगु मारी ,
सोचि छौ सुख मिललू, आई असंद भारी,
ये मकड़जाल मा, कन  फंस  ग्यांयू,
बेरोचगारि  मा ब्यौ करी, भौत  पछ्तायूं |

बेरोचगारि मा ब्यौ न कर्या, गेडी बांधा बात,
ब्वे, बाबू, भै बिरणा होंदा, कजाणि मरदि लात,
तुम न जयां तै बटा बी, जै बाटा मीं जायूं,
बेरोचगारि  मा ब्यौ करी, भौत  पछ्तायूं |
 -----रचना – डॉ० उमेश चमोला



समीक्षा
                   क्य सोची करि ब्यौ  
------ आई ० पी ० उनियाल
   अपण मुल्को रिवाज छ कि नौनु जरा सयाणु ह्वे ग्ये त वेको ब्यौ कर दिए जान्द | घर वलोंन यु नि स्वचणु कि छोटा अपणि ब्वारी तैं खलै-पिलै बि सकद कि न | कखि यु तनि ह्वे जाव कि हमतें हि ब्वारि पलण पड़ो | एक दिन मैं अपणि तिबारि मा बैठयूँ छौ |  रूडयूँक को दिन छौ | हम द्वी चार लोग समणि बटी भ्यूला डालों से छनैक औणी ठण्डी हवा को आनंद उठौणा छा कि यितगा मा एक बुजुर्ग हमारि पैड्यों चढ़ी तिबारि मा ऐकि धम्म खटला बैठि ग्ये | हम हकदक रै गयां | यु सोची कि हम ये मनखि तैं जणदा छां न पछणदा छां अर बिना जच्यां पुछ्यां धम्म खटला मा बेठण वलो यो को छ | मैन पूछि,’’भैजी! को छां तुम ? कै गौं का छां ? यीं घामे दोपरि  मा कख पैटयां छन  ? तुमरू त बुरु हाल छ |’’ वु मनखि पैलि त जरा चुप रै | तब बोन बैठि, ‘’चुचों ! दूर बटी आयूं छौं | पैलि जरा थौ बिसौण द्या धों | जरा हवा मा पसिन्य सुखि जालो त गिचा बटि तब त कुछ बोलुलु | यितगा मा केरि काकी भितर बटि ठण्डो पाणयो गिलास लेकि ऐग्ये अर बोन बैठि .’’पैलि पाणी पी ल्या तब बोलि दयया धों | सि काकी मू बोन बैठिंन,’’यो नोनो कि छुयूं मा नि अयां | यित अबि झुल्लों मा ख्यलणा छन |’’ हमरो ध्यान फिर अपणि छुयूं मा लग ग्ये | किलैकि काकी अर वुँ बुजुर्ग सि लगदा मनखि आप सभा छ्वीं लगौण बैठ ग्ये छा | वुंकि छुयूं कु मतलब कुछ यिनु लगणू छौ कि जन ब्वलेंद वु आदिम अपणा नौना वास्ता ब्वारी ख्व्जनों भटकणू छौ |
      छुयूं मा वून बतै  कि वूंको नौनु देहरादूण नौकरि कनू छ | वेतैं अच्छी ख़ासी तनखा बि मिलनी छ | वुंकि मंशा छ कि वेको ब्यौ कर दिए जाव | व यी लगन मा घामे दोफरा मा गौ- गौ रिटण पर लग्युं छ | मैंन पूछि वूँतैं कि नौनु कथगा सालो छ ? अर कथगा  पढयूं छ | जवाब मिले वुंको नौनु मैट्रिक पास छ अर बीस सालो ज्वान छ | जब वूँसे वेका जॉब का बारा मा पूछे ग्ये त पता चलि कि कै होटल मा वेटर कि नौकरि कनू छ | मैन पूछि कि तुमुन अपण नौना तैं बि पूछि ब्यौ का बारा मा त बोन बैठि कि ब्यटा! हम वेका ब्वे बाब छां | वेको भलो –बुरो कै बात मा छ हम जांणदा छां | ये वास्ता वे तै क्या पूछण? यकुलो नौनु छ | घर कि सब संपत्ति वेकि ही छ | ये वास्ता वेतैं पूछने क्या जर्वत छ | बस ढंगे नौनि मिल जाव त हम अपण छोरो कालु मुंड कर दयां | बुडयजी को तर्क सुणी भौत ताज्जुब ह्वे यो सोची कि छोटो बुबा वेको ब्यौ करी तैं वेका वास्ता एक यिनी मुसीबत का हालत त्यार कन पर लग्यों छ | मैं तैं ताज्जुब ह्वे कि यो बुजुर्ग क्या सोची ब्यौ कनू होलो | जबकि नौने तनखा जादा सि जादा ढाई तीन हजार होली यिथगा क्या अफु खालु ? क्या ब्वारी तैं खलालो? यांका अलावा क्वार्टर को किराया अपणु खर्च मिलैक वैतें यितगा तनखा नि मिल्दी होलि आखिर क्या करलो यु बिचारु ?
    ठीक यीं सोच पर आधारित छ प्रस्तुत गीत ,पथ्यला नों कि कविता संकलन मा छपी डॉ ० उमेश चमोला कि रचना | शीर्षक छ ‘बेरोजगारि कु ब्यौ’ | ये गीत मा डॉ० चमोलान वु सबि मुश्किल बयान करीं छन जु कि एक अल्प वेतनभोगी शादीशुदा मनखि का समणि औंदन | खाण पेण से ल्हेकि मकान को किराया का अलावा नयु नयु ब्यौ अर वुंकि कच्चि उमर कि ब्वारी, बिचारो जनानी फरमैश हि पूरि नि कर सकणू छ | वु अपण ब्वे बाबु तैं कोसण पर लग्युं छ कि बिना देखभाल अर सोच विचार का वूंन ब्यौ त कर दये पर निभोंण वैतें पड़नू छ | आखिर कथगा दिन तक चललि गिरस्ती ?

         (रंत रैबार २८ मई २०१२ बटी)

 





रविवार, 20 अगस्त 2017

गीत समीक्षा (गढ़वाली) 5
            उत्तराखण्ड बणी ग्याई
  मेरि किताबी ‘पथ्यला’ मा अयां ये गीत की  समीक्षा वरिष्ठ साहित्यकार (समीक्षक) श्री ईश्वर प्रसाद उनियाल जी द्वारा ‘रंत रैबार’ मा करे गै छै | समीक्षा का वास्ता तौंकू भौत-भौत आभार | ईं पोस्ट से पैलि  ‘ऐ जा मेरा गौं मा’  ‘पथ्यला बौण का’  ‘त्वैतें बुलोणा’ अर ‘रैबार’ कि समीक्षा का बाद  गीत दगिडी ईं पोस्ट मा श्री उनियाल जी द्वारा करीं पांचू   गीत ‘ उत्तराखण्ड बणी ग्याई’    कि समीक्षा पेश छ | या समीक्षा द्वी रूपों मा (अलग –अलग) रंत रैबार मा छपी छै |
                    (5)
         उत्तराखण्ड बणी ग्याई  
उत्तराखण्ड बणी ग्याई,
गौंकु  विकास होलु ब्वे,
घौर कि रोटि खौलु
परदेसू नि रौलु ब्वे |

भाण्डा मजाणु होटलों मा,
दिन कटूणू रोई रवे,
राज्य बणनै कि खुशि मा
चिट्ठी लेख्णु त्वेतैं ब्वे |

छोटा मा गाजि चरोंण कु,
याद भौत आणु च,
बौण मा रडाघुसि खेनु,
मी सणी रुलाणु च,
रूठि गैन डांडी कांठी
मी तैं वख लिजै दे क्वी,
राज्य बणनै कि खुशि मा
चिट्ठी लेख्णु त्वेतैं ब्वे |

परदेस मी आयूँ यख
ढुंगा सीं जिकुड़ी कैरीकि,
कनकै लगौण ब्वे,
छ्वीं यखै कि खैरि की,

रोणु छौं मी दिन रात,
तू जिकुड़ी ना दुखै,
राज्य बणनै कि खुशि मा
चिट्ठी लेख्णु त्वेतैं ब्वे |

न मन्योडर भेजणु,
न क्वे त्वे समोण ब्वे,
गरीबी मा पल्या बडयाँ,
भाग मा लेख्युं रोण ब्वे,

सदनी नि रैला यन,
खैरयों का दिन ब्वे,
राज्य बणनै कि खुशि मा
चिट्ठी लेख्णु त्वेतैं ब्वे |

 -----रचना – डॉ० उमेश चमोला

समीक्षा -१
               दिन बौडने  आस मा 
------ आई ० पी ० उनियाल
    गरीबी अर बेचारगी उत्तराखण्ड का पहाडी अंचलों कि पुराणी नियति
रे | उखड़ी खेति से टंगी जिन्दगी कब बेमान ह्वे जाव पता नि चल्दु छौ कबि | आज भले हि वखा हाल कुछ सुधरयां छन पर वामा मौलिक विकास नीं छ | हाल सुधरणा पिछ्नै आयातित अर्थ व्यवस्था का सिवा कुछ नीं छ | फिर बि द्वी टेमों खानों जुगाड़ कर हि देन्दन वखा लोग | य स्थिति आजै छ पर अस्सी –नब्बे का दसक मा स्थिति अलग छै | हालाँकि तब बि वख भूकन क्वी म्वरदु छौ पर बच्यां रेण तको गफ्फा पैदा ह्वेहि जान्दो छौ | बस यु समझा कि जिन्दगी तैं धक्का देनै स्थिति छै |
   तब खेति-पाती अर पशु पालन का अलावा क्वी हैको व्यवसाय नि छौ |
छ्व्टा नौन्याल अव्वल त प्राइमरी से अग्ने पढै नि कर्दा छा | ये वास्ता गोर बखरा चरोणा अलावा घर को काम बि वूंतैं कन पड़दा छा | छ्व्टा भै बैनो कि देखभाल कना अलावा धारा बटी पाणयों बंठा भरी ल्याणु ,गोरु भैंसों तैं पाणी पिलोणु जना काम बि वूँ छ्वटा- छ्व्टा बच्चों का जिम्मा रैंदु छौ | यांको कारण छौ कि ब्वे बाब खेति पर हाड़ गौण त्वडोन्द छा | पथरीला पुंगडों मा धाण –धंधा कना सिवा हल्यों का दगिडी एक का बाद हैको काम पड़ जांदो छौ | यी वजै छै कि खास तौर पर घर कि जनान्यों तैं बाल- बच्चों कि देखभाल कनो मौका नि मिल्दु छौ | यांको जिम्मा इस्कुल्या बच्चों मदे सबसे ठुला भै- बैणयों का कन्धा मा जांद | यां से वु छ्व्टा बच्चों तैं पढ्नो मौका नि मिल्दु छौ | यां से अपणा पहाड़ मा शिक्षा अर स्वास्थ्य का गैराल छा | काम चलाऊ आखर  ज्ञान तक यि बच्चा रै जांदा छा | यी वजै रै कि यि बच्चा घर बटी कैका बि दगडी देश ऐ जांदा छा | अब वुँका समिणी होटल ढाबों मा भांडा मठोंण का सिवा कुछ विकल्प नि रैंदु छौ अर ताजिंदगी वु भांडे मठोंद रैंदों छौ | जादा सि जादा क्वी बड़ा होट्लू मा बेयर कि नौकरि तक मिलि जांदि छै |हाँ एक और बात छै  कि कैकि सिफारिस पर कै अधिकारि को घरय नौकर बण जांदा छा यि बच्चा | कुछ कारखानों मा नौकरि करी अपणि ज्वन्नि तक पार कर देंदा छा |
    पर आज य बात नीं छ | अलग राज्य उत्तराखण्ड बण जाण से स्थिति मा थोड़ा भौत बदलौ ऐ ग्ये | वुन पहाड़ का लोग अब कामगत्ती ह्वे जावन वु बड़ी आसनि से ख़ुशी से जिंदगी बितै सकदन | सरकारी योजना यितगा बण ग्येनि कि वूँ पर आश्रित काम शुरू करी तैं आर्थिक स्थिति सुधरे जै सकद पर यिनु कम से कम करीतें जादा से जादा प्राप्त कनै मानसिकता घर कर ग्ये वखै ज्वान पीढी मा | राज्य बणने खुशि मा एक प्रवासि गढ़वाली लोगु मा भौत सारि अपेक्षा छै कि अपण राज्य मा यु कल्ला,यिन्के अपणि जिंदगी तैं सौंगी बनै दयोला |
    डॉ० उमेश चमोला कि प्रस्तुत कविता कु सार भाव यी छ | कविन अपणि रचना तैं ढाळ दयेकि वीं तैं गीत कि अन्वार देयीं छ | ‘उत्तराखण्ड बण ग्याई’ नौंकि ईं कविता /गीत मा घर कि खस्ता आर्थिक स्थिति से उकतै कि देश अयां एक जवान नौना कु ज्यू कु उमाळ छ | वु देश बटी अपणि ब्वेका वास्ता चिट्ठी ल्यखणु छ कि अब चिंता कने जर्वत नीं छ किलैकि उत्तराखण्ड राज्य बणग्ये अब | अब वक्त ऐग्ये कि अपण गौं घर मा रैक त्यरा हाथे रवटि खौलो | होटुलु मा भांडा मठोणा दिन अब ख़त्म ह्वे जाला | दिन कटणा भारि होयां छन | अब नयु राज्य बणनू छ यीं खुशी मा त्यरा वास्ता चिट्ठी भ्यजुणू छौं |
   वु दिन बि क्या छा कि गौं मा गोर चरोणा अर बोण मा रडाघुसी ख्यलुणु यि सबि याद आणी छन | अब किलैकि नयु राज्य बणणू छ | ये वास्ता बुरा दिन ख़त्म ह्वे जाला | यिन लगुणू छ जन कि हमर वास्ता वखै डांडी कांठी रुसै ग्येनि | पर परदेश आणु मेरा वास्ता शौक या ख़ुशी कि बात नि छै | जिकुड़ा मा ढूगो धरी तैं मैन घर छोडि छौ | अब यख मीरा ज्यू पर क्य बितणी छ त्वेतैं कनुक्वे बतौण?
   एक प्रवासि नौने दिल कि क्य हालत होंद कविन यीं कविता मा साफ़ करीतें उल्लेख कर्युं छ | प्रवासी बतौणु छ कि अब तक हमरा भाग्य मा रोणु लख्युं छ | गरीबी मा पल्यां छां यां से लगद कि पैलि जु दुःख पै छा अब वु ख़त्म ह्वे जाला  किलैकि नयु राज्य उत्तराखण्ड बणनू छ | ये वास्ता त्वैतैं चिट्ठी ल्यखणु छौं |
      (रंत रैबार २  अप्रैल  २०१२  बटिन)


समीक्षा -२
               नि बदले बुलागिरी कि तस्वीर
   ------ आई ० पी ० उनियाल
    कवि कि कल्पना जथगा उच्ची उड़ान भर द्या कम हि कम छ | वेकि उड़ान कि क्वी थौ नीं छ | वु एक तिरिण तैं विराट बनैक वेकि पूरि दुन्य सज्यें देंद | कखि कुछ न कथ पर कवि कि थौलि मा सब कुछ मौजूद होंदु | वु एक कुरमण पर हथ खुटा सज्येकि वेतैं बेगवान जीव बनैकि वेका अस्तित्व तैं विस्तृत कर देंद | ठीक यिनि ह्वे होलो उत्तराखण्ड राज्य निर्माण कि घोषणा होणे संभावनों से पैलि |
   उत्तराखण्ड राज्य बणलो लोगुन कल्पना करि होलि विकास कि ,नौकरयों कि, उत्तराखण्ड तैं देश का हौर राज्यों कि श्रेणी मा खड़ो कनो | वुंकि लालसा का क्य नतीजा ह्वेनि य बात त जुदा छ पर एक कविन अलग ही कल्पना करी तैं उत्तराखण्ड बणणा बादे तस्वीर खैंची रखीं रखीं छ | डॉ० उमेश चमोला जु कि गढ़वाली मा गीत व काव्य सृजन का वास्ता काफि जणयां मन्यां छन,वूंन उत्तराखण्ड बणनै ख़ुशी को इजहार एक होटल मा भांडा मठोंण वला भुला का मुख बटी कर्युं छ | हाँ, भांडा मठोंण वलो भुला जै नौकरि कि तलाश मा मैदान कि तर्फ उन्मुख होयुं छ डॉ० चमोलान  वेकि पिडा को वर्णन कर्युं छ | काव्य संकलन ‘पथ्यला’ मा संकलित गीत ‘उत्तराखण्ड बणी ग्याई’ शीर्षक वला गीत मा वे भंडमजा’ भुलाकि कल्पना पर चमोला जी वेकि यी न्रिकृष्ट पछ्याण से मुक्ति को मार्ग समझदन | भुला नौ का कलंक से ओतप्रोत पाड़ी छोरों कि पिडा  या छ कि होलो क्वी यनु जु मैं तैं ये कलंक से मुक्ति दिलैदयो | वेकि आस बंधीं छ कि अब उत्तराखण्ड बणन वालु छ ये वास्ता वु अब बुलागिरी कन्य नी छ |
     यु भुला अपणि माँ तैं चिट्ठी भ्यजुणू छ कि ब्वे अब बुरा दिन गया समझा | किलैकि उत्तराखण्ड बणी ग्याई | अब मैतै परदेश नि जाण पडलो | अब वेतैं अपुणु घर नि छ्व्डन पडलो | ब्वे मैं अब त्यरा हाथै रवटि खौलो |
   वु ल्यखणू छ कि भांडा मठोंद मठोंद वैका हाथ गळ ग्येनि | हाथ कबि सुख्दै नि छन | यी वजै छ कि द्विय हाथु मा कादैई लगीं छ | यूँ हालू मा रवे रवे कि दिन कटणु छौं पर अब खैरी दिन चलि ग्येनि | यु समझले | किलैकि उत्तराखण्ड बण ग्याई |
   किशोर अवस्था मा हि गरीबी से तंग एकि यु किशोर घर छोड़ी भैर ऐग्ये | वेकि उमर अबि यिथगा कठिन दिनचर्या बितोने नि छै पर क्य कन गौंकि कंगाली का यि दिन छन | भुला का अबि खेलकूद का दिन छन | बण का गोरु चरोणु, रडाघुसि ख्य्लण, जंगल मा सौ बनि बनि का फल -फूल  खानो अर नि जाणि क्य कल्पना ये भुला का मन मा पैदा होन्दी होलि | जनकि ब्व्लेंद वेका वास्ता वखै डांडी कांठी रुसै ग्येनि | क्वी हवा जु वेतैं वख ल्हेकि चल जाव | हे माँ ! राज्य बणने ख़ुशी मा त्यारा वास्ता चिट्ठी ल्यखणू छौं |
    परदेश आणु वैकि ख़ुशी नी छै | वु वखि पहाडै उन्मुक्त हवा जिन्दगी जीने इच्छा पाली रखण वलो एक साधारण छोरा छ | जैकि यख होटल मा भारि दुर्गति होणी छ | वु ल्यखणु छ कि परदेश मा वेतैं ज्व खैरि खाण पड़नी छ वु कन्क्वे लेख सकद | मीतें ढूंगो जिकुड़ा करीतें गौ छोडण पडि | मैं यख दिन रात रोणु रैंदु | सुबेर बटी अधा रात तक भांडा मठोनों काम करदो | यीं पिडा तैं त्वेमा कनक्वे लगै सकदों | पर अब उत्तराखण्ड बण ग्याई समझा कि दुःख तकलीफ जल्दी हि चल जैलि |
  क्य कन माँ यु सब भाग मा ल्यख्युं  होंद जुकि कबि टळदो नीं छ | कंगाली मा पळयां – बढ़यां छां |  जब भाग मा भांडा मठोंणु ल्यख्युं हो त क्वी करे बि क्य पर माँ अब बुरा दिन जाण वला छन किलैकि उत्तराखण्ड बण ग्याई | यि सबि दुःख ख़त्म ह्वे जाला |
  डॉ ० चमोलान कल्पना त खूब करि छै पर क्य यों नोन्यालु को सुपन्य पूरा ह्वे छन | क्य वे भुला कि चिट्ठी मा ल्यखीं खैरी छ्वीं अर सुख कि कल्पना पूरि व्हे छ ? शैद ना |हाँ, अब भंडमजा कम अर वेटर ,सैफ य फिर स्टुवर्ट जरूर बणग्येनि | यानि बुलागिरी कि जगा वेटरगिरी |
         (रंत रैबार ८  अक्टूबर  २०१२  बटिन)



 






बुधवार, 16 अगस्त 2017

गीत समीक्षा (गढ़वाली) 4
                  रैबार
  मेरि किताबी ‘पथ्यला’ मा अयां ये गीत की  समीक्षा वरिष्ठ साहित्यकार (समीक्षक) श्री ईश्वर प्रसाद उनियाल जी द्वारा ‘रंत रैबार’ मा करे गै छै | समीक्षा का वास्ता तौंकू भौत-भौत आभार | ईं पोस्ट से पैलि  ‘ऐ जा मेरा गौं मा’  ‘पथ्यला बौण का’ अर ‘त्वैतें बुलोणा’ कि समीक्षा का बाद  गीत दगिडी ईं पोस्ट मा श्री उनियाल जी द्वारा करीं चौथा   गीत ‘ रैबार’    कि समीक्षा पेश छ –
                     (4)
                 रैबार
त्वेतैं च आयूँ पहाड़ो रैबार,
त्वेतैं बुलोणा बार-त्यवार |

कांठा मा ज्वोन,अब भी औंद,
सुबेर ह्वेगी गैनू  बतोंद,
मोल्यार मा यख डालों फुलार,
सूणी म्वारों कु गितालु रैबार,
त्वैतें ------------------------|

झिलमिल  औंदी यख बग्वाल,
ब्वे बाबों की च घौर जग्वाल,
त्वे बिन होली कन यख होली,
कन होलू यख रखुडी त्यवार,
त्वैतें ------------------------|

सैंती पाली तू बडू बणाई,
तेरा बाना क्या क्या खैरी नि खाई,
दाना सयानो को बिसरी दुलार,
ब्वे बाबु तेरा घौर बीमार ,
त्वैतें ------------------------|

ज्यूं पुंगडों मा नाज छौ पाणी,
बांजी पुंगडी सि त्वेतैं बुलाणी,
दूध कि नीं छ यख छ्लार,
रीता पड़यां छन यख कुठार,
त्वैतें ------------------------|
उत्तराखण्ड यो  राज्य  बणीगे;
आँखों मा सबुका स्वीणा सजीगे,
उड़ीक ऐ जा पोथलों की चार,
समाल अपडू तू घौर बार,
त्वैतें ------------------------|
        -----रचना – डॉ० उमेश चमोला

समीक्षा
औ अब घर ऐ जा
------ आई ० पी ० उनियाल
      राज्य मिल्यां बारा वर्ष ह्वे ग्येनि पर आज बि राज्य का लोगु तैं मैसूस नि ह्वे कि क्य सचे हमतें अलग राज्य मिलगे | कारण कि नया राज्य जनु विकास उत्तराखण्ड मा द्य्खनो नि मिल्नू छ |
  सन १९९४ बटी द्वी हजार तक पूरा छै साल तक नयाँ राज्य प्राप्ति खुण आन्दोलन लडे गे | लोगुन झणि  क्य क्य सुपन्य गंठययां छा | सुख-समृद्धि का सुपन्य, होणी हुणत्यार का सुपन्य, पहाड़ का विकास का सुपन्य, पलायन पर रोक लगौणा सुपन्य अर झणि हौर क्य क्य गाणि करि छै उत्तराखण्ड का लोगुन पर आज लोगु का यि सुपन्य हि बणी रैग्येनि |
  गाणयों का बीच एक सुपन्य छौ पलायन पर रोक लगै जाणो | नतीजो उलटो ह्वे | राज्य बणना बाद प्रदेश मा पलायन तैं जादा हवा मिले | जु लोग पैलि कखि काम मिल्न पर हि पलायन कर्दा छा अब वु जरा बि सारो मिल्न पर घर छोड़ देणा छन | ख़ास तौर पर पहाड़ बटि लोगुको मैदान उन्द लमडने मानसिकता का पिछने फटाफट रूप्या  कमैक अग्नै कि पंगत मा खड़ो होणे इच्छा छ | पैलि जब उत्तर प्रदेश से जुडयां छा तब विचार हि पैदा नि होंदो छो भैर निकल्नो पर अब त प्रदेश कि राजधानि एक लतडाग पर छ | पहाड़ का छोरा छपरा जनि १५ -२० पर पौंछणा छन वूंकि मैदानुन्द दौड़ने लंग्यात लग जान्द |
  पिछला बारा वर्षो मा अगर द्यखे  जाव त पता चललो कि पैल्ये अपेक्षा यितगै अंतराल मा दुगुणा चौगुणा पलायन ह्वेग्ये | आज मैदानुंद आकि जब काम धंधा नि मिलणु छ त छोरों कु रुझान होटलु मा भांडा मठोंण / उठोणा तर्फ ह्वे जाणू छ | सब्यों तैं त नौकरि मिल्दी नीं छ | ये वास्ता जौंकु यिथगा पैनो भाग नि होंदो वु यख कठिन जिन्दगी जीणों मजबूर ह्वे जान्दन |
   अब जब पहाड़ छोड़ी ऐ हि जांदन त कखि कपडे दुकान हो या फिर परचून कि दुकान या फिर छ्वटि मोटी फैकटरयों मा नौकरि करी यूँ छोरों तैं टैम बितोंण पड़द | वूंतैं समझ नि औंदों कि वु द्वी चार हजार तनखा मा क्य क्य कर सकदन | एक तरफ मकान को किराया त हैका तर्फ द्वी टैमें रवटि कु जुगाड़ | यो हि ना मोबाइल फोन बि चैंद त बाकि यार दोस्तों का समणि अपणु स्टेंडर्ड बि त दिखोणु हि पड़द | ये वास्ता वु अपणि चादर से भैर तक खुटा पसार दिन्दन | नतीजा यो होंद कि वूंकि जिन्दगी नर्क बणी रै जांद | बात सिर्फ आजे नीं छ | सवाल सर्य जिन्दगी को छ | आज म्यरा पहाड़ का जवान छोरा गौं छोड़ी भैर आकि अपणि किस्मत अजमानो ऐ जाणा छन पर कथगों कि किस्मत वूंको दगडो कर्द | जादातर अधबिचे मा लटक्याँ रै जांदन | नतीजा यो होंद कि यि बच्चा न घर का रैंदा अर न घाट का |
   बात जब सर्य जीवन कि होन्दी त जीवन का खेल मा वी लोग कामयाब ह्वे सकदन जौंन भोला बारा मा आज हि योजना बनै दये हो | आज कि जर्वतों पर थोड़ी रोक लगै दिए जाव त वु भोल का वास्ता सौभाग्य को कारण बण जांद |
  बात चल्नी छै नया राज्य प्राप्ति खुण गाणि अर सुपन्यों कि | यीं विधा पर गढ़वाली का गितार अर लिख्वार डॉ० उमेश चमोलान एक गीत ल्यख्युं छ |’पथ्यला’ नों का गीत संकलन मा रैबार शीर्षक से ये गीत मा डॉ० चमोलान बड़ा साधारण शब्दों मा बतै दये नयु राज्य बणग्ये अब परदेस जयां लोगु तैं घर ऐ जाण चयेणु छ |
 बड़ा मार्मिक शब्दों मा चमोलाजीन रैबार दिन्युं छ | अब परदेस रेनै जर्वत नीं छ |
     (रंत रैबार १२  नवम्बर  २०१२  बटिन)