शनिवार, 5 अगस्त 2017

उत्तराखंड की लोककथा
Folk tale of Uttarakhand by Dr Umesh Chamoa

जय घोघा माता
--डॉ उमेश चमोला
 बहुत पहले की बात है | एक राजा था | उसका नाम घोघाजित था | वह पराक्रमी, न्यायप्रिय एवं धर्म परायण था | उसके घर एक कन्या का जन्म हुआ | उसका नाम घोघा रखा गया | राज ज्योतिषी ने उसकी जन्मकुंडली बनाई और देखकर बताया,’’इस कन्या की जन्मकुंडली में असाधारण योग है | यह सुन्दर और प्रकृतिप्रेमी होगी| दस वर्ष की आयु पूरी होने पर यह तुमसे हमेशा के लिए बिछुड़ जाएगी|’’
  घोघा अन्य बच्चों से अलग थी | उसे जंगल,खेत,पशु पक्षी आदि प्रकृति से जुडी वस्तुएँ अच्छी लगती थी | एक दिन उसने महल में राखी बांसुरी उठाई | जंगल में पेड़ों की घनी छाँव में बैठकर वह बांसुरी बजाने लगी | बांसुरी की मीठी धुन जंगल में गूंजने लगी| घोघा के चारों ओर जंगल के कई जानवर और पक्षियाँ जमा हो गए जैसे वे बांसुरी की धुन से खिंचे चले आए हों | ऋतु बसंत के समय जब जंगल और खेत की दीवारें प्यूली के पीले फूलों से भर जाती,जब बुरांस के पेड़ लाल –लाल फूलों से लद जाते,सरसों के पीले हरे खेत छटा बिखेरते,पैंयाँ के पौधे हरी –हरी पत्तियों से भर जाते,तब घोघा इन फूलों के पास आ जाती|ऐसा लगता घोंघा इन फूल-पत्तियों से खूब बातें कर रही हो| वह घुघुती,कफ्फू,मेलुड़ी आदि पक्षियों की मीठी आवाज को सुनकर कहीं खो जाती |
    ऋतु बसंत का मौसम था | जंगल एवं खेतों की दीवारें प्यूली से भरी थी | जंगल में लाल-लाल बुरांस खिले थे | जंगल पक्षियों के मृदु स्वरों से गूंज रहा था | घोंघा हमेशा की तरह जंगल चली गई | दिन बीता | काली रात का अँधेरा पसरा लेकिन घोघा महल में वापस नहीं लौटी | राजा को चिंता हुई | उसने दरबारियों को  घोघा को ढूंडने भेजा | घोघा का कहीं पता नहीं चला|घोघा की दस वर्ष की आयु पूरी हो गयी थी | राजा को ज्योतिषी की भविष्यवाणी याद आ गई | वह बहुत दुखी हुआ | उसे रात भर नींद नहीं आई | रात्रि के अंतिम पहर उसकी आँखें लग गई| उसने एक सपना देखा | दिव्य आभूषनों से सुसज्जित एक सुन्दर नारी सिंहांसन में बैठी थी | घोघा उस नारी की गोद में बैठी थी | उसे देखते ही राजा चिल्लाया,’’पुत्री!’’| घोघा मुस्करा रही थी | राजा की बात को सुनकर सिंहासन में बैठी वह नारी बोली,’’पुत्र घोघा जित! मैं तुम्हारी कुलमाता हूँ | मेरा एक नाम प्रकृति भी है | तुम्हारी पुत्री घोघा जिस प्रकृति की गोद में पली बढ़ी थी,देखो उसी प्रकृति (मेरी) गोद में अभी भी है | प्रकृति का संरक्षण तुम्हारे राज्य की समृद्धि एवं अस्तित्व के लिए आवश्यक है| यही सन्देश देने के लिए तुम्हारे घर घोघा ने जन्म लिया था | दूसरे वर्ष की चैत्र माह की सक्रांति के दिन से तुम अपने राज्य में घोघा की याद में फूलों का त्यौहार मनवाना | इस त्यौहार में सभी छोटे बच्चे प्यूली,बुरांस के फूलों और पैंया के सुन्दर पत्तों को रिंगाल की छोटी छोटी टोकरियों में जमाकर हर घर की देहरी में डालेंगे | घोघा की एक डोली भी बनाई जाएगी | सभी बच्चे ‘जय घोघा माता,प्यूली फूल, जय पैंया पात कहकर घोघा की जयकार करेंगे | तुम्हारी पुत्री घोघा अब घोघा माता के रूप में याद की जाएगी | घोघा माता की कृपा से तुम्हारे राज्य में प्राकृतिक  सुन्दरता और समृद्धि बनी रहेगी|
  घोघा की याद में आज भी उत्तराखण्ड में प्रत्येक वर्ष चैत्र माह के संक्रांति से आठ गते तक फूलों का त्यौहार मनाया जाता है | इसे फूल्देई का त्यौहार कहा जाता है | चैत्र माह की सक्रांति को फूल संक्रांति के नाम से जाना जाता है |
                     



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