रविवार, 25 नवंबर 2018


कुछ यादें , कुछ बातें 5
मधुशाला और मेरा अनुभव
वर्ष १९९५ की बात है | एक इंटरव्यू के लिए मैं  इलाहाबाद गया था | मैं वहाँ एक होटल में रुका था | मैं होटल के बाहर घूम ही रहा था तभी मुझे एक आदमी मिला | उसने मुझसे बातचीत की | पता चला कि वह भी उत्तराखण्ड का रहने वाला है | उसने मेरे बगल का कमरा किराया पर ले लिया | रात को भोजन करने के बाद उसने बोतल निकाली | ढक्कन खोलने के बाद उसने मुझसे कहा, भुला ! तुम भी इसका शौक रखते हो ? मैंने कहा, नहीं| वह बोला, थोड़ी सी ले लो | कुछ नहीं होगा | मैंने मना किया | वह बोला, सॉरी , मुझे माफ़ करना| मुझे शराब पीने की आदत है | अगर  मेरे साथ अच्छा नहीं लग रहा है तो तुम अपने कमरे में चले जाओ | मैंने कहा, आप शौक फरमाओ | आप के साथ यहाँ बैठकर रहने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है |
मैं शराब नहीं पीता किन्तु मैं शराबियों की महफ़िल में  कई बार मौजूद रहा हूँ | इस महफ़िल में शराबियों के संवाद मुझे बहुत रोचक  लगते हैं | कई ऐसे मौके भी आये हैं जब शराबी मित्रों ने कहा, हम आपको शराब पिलाकर मानेंगे | मैं कहता तुम मुझे शराब नहीं पिला सकते | हाँ, किन्तु मुझे इस समय तुम्हारे साथ बैठने में कोई परहेज नहीं है | शराबियों की महफ़िल में मैं उनकी बातों का विश्लेषण करता रहता हूँ | कई बार शराबी नशे में बहुत गहरी बात बोल देते हैं | शायद इसीलिये कहा जाता है कि शराब के नशे में आदमी दिल की बात करता है | शराबियों की महफिल में मैंने उनकी दरियादिली को व्यक्त होते देखा है | इलाहाबाद में जो मेरे बगल के कमरे  में रहे थे , उन्होंने मुझे एक बार भी सुबह और रात के भोजन का बिल चुकता करने नहीं दिया | मैं बिल चुकता करने को होता तो वे नशे में कहते, भुला ! जब तक तेरा ये बड़ा भाई जिन्दा है तू फ़िकर मत किया कर |
दूसरे दिन  इंटरव्यू होने के बाद मैं उसी होटल में लौट आया | मैं थका हुआ था | इसलिए मैंने सोचा आज यहीं आराम करूंगा | कल यहाँ के महत्वपूर्ण स्थानों का भ्रमण करने के बाद वापस चला जाऊँगा | दूसरे दिन मेरे बगल में ठहरे वे शराबी मधुशाला जाने को तैयार हो गए | मैंने भी उनके साथ मधुशाला जाने का निर्णय लिया | वहाँ टूटी फूटी कुछ पुरानी बेंचें थी | कुछ पुरानी कुर्सियां भी थी | मैं भी एक खाली कुर्सी पर बैठकर शराबियों के व्यवहार का अध्ययन करने लगा | वहाँ लोग काउंटर से शराब की बोतल ला रहे थे | कुर्सी और बेंचों में बैठकर पी रहे थे | जो भी शराबी मुझे कुर्सी में बिना बोतल के देखता, वह समझता मेरे पास रूपये समाप्त हो गए हैं | वे अपने साथ रूपये लेकर आते | कहते, ये रूपये रख लो | वापस मत लौटाना | ये तुम्हारे बड़े भाई की तरफ से तुम्हारे लिए हैं |’’ कोई बोतल लेकर आता और कहता, यार तेरे पास रूपये नहीं हैं तो चिंता मत कर | ये ले ये बोतल पी ले | ’’
 मधुशाला में शराबियों के बीच बीते आत्मीय माहौल, उनके प्रेम और दरियादिली को देखकर मुझे अनुभव हुआ कि हरिवंश राय बच्चन ने बिलकुल सही कहा है, बैर बढाते मंदिर – मस्जिद, मेल कराती मधुशाला|