शनिवार, 2 सितंबर 2017

किताबी समीक्षा
  हम पथ्यला बौण का
समीक्षक – डॉ० नन्द किशोर ढोंडियाल ‘अरुण’
   या बड़ी खुशी की बात छ कि अजकाल गढ़वाली भाषा का लिख्वारू मा लिखनौ को जो उत्साह दिखेणु छ वे से लगदा कि वो दिन दूर नी जै दिन ये को साहित्य हिन्दी की तरां हि समृद्ध ह्वे जालू | आज कविता बि लिखेणी छन,त एकांकी नाटक बि,निबंध छपेणा छन त उपन्यास कहानी बि,रिपोर्टिंग बणणी छन त समीक्षा बि, क्वी पत्र साहित्य को सृजन कना छन त क्वी आत्मकथा लेखन कु प्रयत्न बि कना छन | ब्वलनो अर्थ यो छ कि आज गढ़वाली भाषा मा सभी प्रकार को साहित्य लिखेणु छ |
     कविता साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण, प्रभावशाली अर अमर साहित्य विधा छ,जो आज कई धारों मा बगणी छ | कखि या शुद्ध कविता का रूप मा अपणि पुराणी पछ्यांण मा ज्युन्दी छ त कखि गीतों का बाना सुणदरों तैं अपणि मिट्ठी भाषा मा मन मुग्ध करी देंद | कखि या नवगीत बणी ऐ त कखि जापानी काव्य शैली का हाईकू का रूप मा समणि आणी छ | गजल कि बानगीमा ईं कविता तैं लोग हथ्युं हाथु लीणा छन त अकवियों कि अकविता का रूप मा मुक्त या रबड़ छंद मा मान्यता का शिखरों तैं बि छूंण लगीं |
   डॉ० उमेश चमोला की सन २०११ मा अविचल प्रकाशन बिजनौर /हल्द्वानी बटी प्रकाशित ‘पथ्यला’ कविता संग्रे बि कविता की द्वी धारों तैं स्पर्श करण वालि कृति छ | यीं कृति मा जख एक गीतकार का गढ़वाली गीत छन वख मॉडर्न कविता की नई बानगी बि | सुन्दर नयनाभिराम सतरंगा चित्र वालि यीं ८० पृष्ठीय कृति डिमाई आकृति हार्ड बाइंडिंग मा गुथी छ | मात्र सौ रूप्या कीमत वली ईं कविता पोथी तैं डॉ० उमेश चमोलान गीत कविता संग्रे को रूप देकि वे ‘पथ्यला’ को भाव जागृत करि दे जो कि पथ्वडयो करदु छौ |
    यीं पोथी को शीर्षक बड़ो मार्मिक अर अर्थपरक छ | कविन यीं कविता मा ‘पथ्यला’ शब्द को अर्थ आंधी अर बरखा से टूटयां पत्तों को ढेर जैतें हिन्दी मा ‘मर-मर’ बि ब्वले जान्द | पर गढ़वाल मा पथ्वडया एक द्यबता बि छ जो कि घणा जंगलु मा पथ प्रदर्शन को काम करदा | वेका थान मा लोग पत्ता तोडी कि डालदी | जैसे एक स्पष्ट संकेत मिल्द कि निर्जन बण मा इनो मन्खि पैलि बि इख से ह्वेकि गै | इलै जंगल मा डरने कि क्वी बात नी | ये अर्थ मा बि पथ्वडया या पथ्यला को अर्थ पथप्रदर्शक हूंद | कविन यीं कृति को नों शैद पथ प्रदर्शक या बिखरयां पत्तों का अर्थ मा करी |
   कविवर डॉ उमेश चमोला की यीं कविता कृति ‘पथ्यला’ कि भूमिका सन २००९ मा प्रोफेसर डी० आर ० पुरोहित निदेशक (तत्कालीन)लोककला अर निष्पादन केंद्र हे० न० बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर न लेखि | विद्वान भूमिका का लेखकन ‘आमुख’ शीर्षक से लिखीं या भूमिका डॉ० चमोला की यीं कविता पोथी की कवितों तैं केंद्र मा रखि लिखीं | गीत अर आधुनिक कवितों का उद्धरण देकि भूमिका लेखक न या सिद्ध करीं की ‘पथ्यला’ गीत अर कविता संग्रे एक उच्चकोटि कि साहित्यिक कृति छ  जैमा गढ़वाल का जनजीवन की झांकी मिल्द |
    भूमिका का बाद शुरू हुंदिन यीं कृति की वो चवालीस रचना जौं तैं कविन ‘अपडी बात’ का बाद स्थान दे | यीं कृति कि उनतीस रचनो तैं गीत खंड मा स्थान दियेगे, त पन्द्र रचनो तैं कविता खंड मा | गीत खंड कि उनतीस रचनौ मा पैलि रचना छ ‘शारदे ब्वे मेरि तू’| यीं रचना मा डॉ० उमेश चमोला माँ सरस्वती से प्रार्थना करदिन कि हे ज्ञान, सम्मान,गीत –संगीत ,बुद्धि प्रीती अर जीत का प्रतीक मेरि शारदा माँ यीं ढगडयंदि माया का भंवर से मेरि जीवन रूपि नाव तैं भैर करि दे | मैं तेरो बालो नौनो छयुं अर तू मेरि माँ छई |
 ‘ज्ञान की ,सम्मान की तू, गीत संगीत की तू,
 बुद्धि से प्रीत की तू, ज्ञान की जीत की तू,
 ढगडयंदि माया का भौंर नाव मेरि खेई तू,
 तेरो बालो नौनो छौं मी, शारदे ब्वे मेरी तू |’

डांडी- कांठी, रौलि गद्न्युं, गढ़ गीतुं तैं गुंजै दये,
भटकणा छन जु आज लोग,वूँतैं बाटू बतै दये,
अपणा खुटयों मा मी जगा दे, शारदे ब्वे मेरि तू |
   ये गीत मा कवि चमोला यो संकेत करदा कि लोग अपणा रास्तों से भटकणा छन | वूँ भटग्या लुखु तैं रस्ता बतै दे | कवि कि यीं पोथी कि दुसरी कविता छ ‘गढ़वंदना’ जैमा गढ़वाल कि धरती कि महिमा, यख का तीरथ अर सुन्दर प्रकृति को वर्णन करे गे |
‘ देवभूमि, गढ़भूमि, त्वेतैं प्रणाम,
 बद्री केदार जन जख छन धाम ,
 हिमालै का कोखला मा, बस्युं गढ़वाल ,
 ऋसि मुन्यों की तपोभूमि, भारत कु भाल,
 भक्ति कु उजालू फैलि, पैलि आई घाम,
  देवभूमि, गढ़भूमि, त्वेतैं प्रणाम |
  ये ही तरां यीं कृति का ‘पथ्यला बोण का’ कविता गीत से ये संसार तैं एक सन्देश मिलद कि-
 ‘हम पथ्यला बौण का, कैतें हमुन दयोंण क्या,
  डालों का जब पतगा छा,भला लगदा कतगा छा,
डालों का हम गैल छा,सबु तैं देंदा छैल छा,
बथोंन मारयां रोण क्या, हम पथ्यला बौण का |’
  ये गीत मा कवि संसार तैं यो संदेस दीन्द कि हम त डाली बटी झडयां पत्तों का जनि छवां | हम कैतें क्या दे सकदो ? एक समै छौ जब हम डाली की शोभा छ्यां | डाली का मित्र बणी हम संसार तैं छाया दीन्दा छ्या पर अब हम आंधी का मरयां भुयां गिरयां पत्ता छ्वां | यां से क्या रोण ?
   ईं कविता कि तरों यीं पोथी की शेष २६ गीत त्वेतैं बुलोणा, सूणा दिदों,सूणा भूलों,सुपीन्यों मा,ऐ जा म्यारा गौं मा,कैकि इन याद आई,बुरांस का डालों मा,तेरि खुद मा, बसंत ऐगी,गीत गाणू,तेरि आन्ख्यों मा,मोल्यार आलू, जाणु छौ, सुपिन्यों मा औणी रै, क्या पाई त्वेन,रैबार मेरु,बेरोजगारी कु ब्यौ,अब छौं टूटूदु गैणू,उत्तराखण्ड बणी ग्याई,कनकै बतों,रैबार, ब्वारी नि मिलि भली,रौड, यकु बगत सदनि नि रैंदु,माया का जाळ मा, दणमण आंसिधारी अर आज –आज भोल –भोल बड़ा मार्मिक अर द्वी अर्थक का साथ वियोग सृंगार का उदाहरण बि छन |
    कविता खंड कि सबि कविता जबरि बटी पीनि दारु,सुपिन्या,बसंत तु सोचि समझी ऐ, रवाडू, गुरमुल्या ढूंगु सीं, गौं कु नेता, पहाड़ एक, पहाड़ –दो, भ्वींचलु- एक, भ्वींचलु- दो , छ्वीं,देखी धों,सोचा भैज्यों,पलायन –एक, पलायन –दो बड़ी आत्मपरक अर समाज सापेक्ष छन | सोचा भैज्यों कविता चिंतनीय कविता छ जैमा कवि बोल्दा –
 ‘जातिवाद क्षेत्रवाद को जम्युं छ यो खोड़ कट्यार,
 कैन बूति? कैन बूति,सोचा भैज्यों,बींगा भूलों |’
  डॉ उमेश चमोला कि या पोथी साहित्यिक पोथी छ | येमा समाज,देश अर व्यक्तिपरक कविता छन | डॉ० चमोला कि कलम गतिशील कलम छ जै पर प्रगति की स्याही भ्वरी छ | आशा छ कि वु यीं कृति का बाद और चललि अर गढ़वाली साहित्य को भण्डार भरली | यीं आशा अर अपेक्षा का दगड़ी, कवि तैं बधे |
किताबी नों – पथ्यला, कवि –डॉ ० उमेश चमोला,
प्रकाशक –अविचल प्रकाशन बिजनौर ,मोल -१०० रु ;छ्पन्याँ साल -२०११
समीक्षक –डॉ० नन्द किशोर ढोंडीयाल’अरुण’


( उत्तराखण्ड खबरसार  1 जुलाई बटी  १५ जुलाई २०११ का अंक से साभार) 

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