शनिवार, 22 जुलाई 2017

कविता

कविता
मजबूरी
-------डॉ उमेश चमोला
हे सूरज !
तेरे खिलाफ बरसात ने की है
जाँच की सिफारिश.
तुझ पर आरोप है कि
तू दहक रहा है,
जनहित से भटक रहा है.
तू आग के गोले बरसाने में है व्यस्त,
जनता हो गयी तेरे अत्याचारों से त्रस्त,
हे सूरज!
हमें पता है तेरे बाद
बरसात की सत्ता आएगी,
जनता को पहले लुभाएगी,
फिर कहर बरसायेगी.
तेरी सत्ता में
जनता झेल रही सूखे का कष्ट,
और बरसात की सत्ता में
बाढ़ से होगा जनजीवन नष्ट.
बारी –बारी से बरसात और तेरी
सत्ता को झेलना
जनता की मजबूरी है.


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