शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 14 आंशिक आवासीय छात्रावास और मैस मोनिटरी



  एक दौर वह था जब कक्षा 8 के बाद एकीकृत परीक्षा उत्तीर्ण करना एक बड़ी उपलब्धि माना जाता था । एकीकृत परीक्षा में पूछे जाने वाले उच्च स्तरीय होते थे
  एकीकृत परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद श्रीनगर स्थित आवासीय छात्रावास में प्रवेश मिलता था । कक्षा 9 में जब हमने यहाँ  प्रवेश लिया तो तीन -चार महीने तक  घर की बहुत याद आती
थी । जब कोई अभिभावक कभी मिलने को आते तो यह यादें दुगुनी हो जाती थी । इसका कारण एक तो घर के सदस्यों से दूर रहना और दूसरा सीनियर छात्रों की अपेक्षा रहती थी कि जूनियर होने नाते हम विनम्र और अनुशासित रहें । हम बीच – बीच में घर चिट्ठी भी भेजते
थे | यहाँ  सीनियर छात्रों को भाई साहब कहा जाता था । छात्रावास अधीक्षक की ही तरह  भाई साहब लोगों के सामने जाने में भी झेंप  और सम्मान का भाव होता था। अनुशासन बनाए रखने की यह अद्भुत परंपरा थी । कुछ महीनो के बाद हमें  घर जैसा वातावरण ही लगने लगा । बाद में तो छुट्टियों में भी यहाँ  रहने का मन करता था ।
   शिक्षा के उद्देश्यों में से एक प्रमुख उद्देश्य बच्चों में नेतृत्व क्षमता और समस्या समाधान के कौशल का विकास करना भी है । बच्चों में नेतृत्व गुणो के विकास के लिए इस छात्रावास में मैस मोनिटरिंग की व्यवस्था लागू थी । इसके अंतर्गत हर माह दो छात्रावासियों को एक महीने के लिए मैस मोनिटर का दायित्व निभाना होता था । एक मोनिटर को मैस से संबंधित खर्चे, बिल आदि का रजिस्टर में विवरण तैयार करना होता था । दूसरे का काम दुकानदार से समन्वयन कर सामान को छात्रावास तक पहुंचाना होता था । छात्रावास के भोजन सामग्री के स्टोर की चाबियां मैस मोनिटर के पास ही रहती थी । उन्हीं की उपस्थिति में खाना तैयार करने वालों को भोजन बनाने के लिए राशन दिया जाता था । मैस मोनिटर की जिम्मेदारी कक्षा 11 के छात्रों को ही दी जाती थी । कक्षा 10 और 12 के छात्रों को इससे मुक्त रखा जाता था । विशेष परिस्थितियों में 12 और 10 के छात्रों को सत्र के शुरुआती महीनो में ही यह जिम्मेदारी दी जाती थी । जब हम कक्षा 9 में पढ़ते थे तो हम कल्पना करते थे कि मैस मोनिटरिंग का कार्य कितना कठिन होता होगा ? जब कक्षा 11 में हमें यह जिम्मेदारी मिली तो हमें इसमें आनन्द आने
लगा । इससे जिम्मेदारी लेने, प्रबंधन और नेतृत्व गुणो के विकास के साथ ही आत्मविश्वास भी जाग्रत हुआ ।
   मुझे याद है एक बार जब मैं मैस मोनिटर था । सुबह जैसे ही मैंने स्टोर का ताला खुला  और खाना बनाने वालों को चायपत्ती, चीनी और मिल्क पाउडर दिया । उसी समय स्टोर के अंदर एक जूनियर भाई आकर बोला,  ‘‘भाई साहब! पाउडर और चीनी ।‘‘ ‘‘मतलब‘‘ ? -मैंने कहा। वह नजर झुकाए सकुचाते हुए बोला, ‘‘ खाने के लिए चाहिए ।‘‘
मैंने उसे एक मुट्ठी के बराबर चीनी और कुछ पाउडर देते हुए कहा, ‘‘ ठीक है । ले लो। रोज-रोज मत आना ।‘‘
 उसने पाउडर और चीनी को हाथ में रखकर मिला दिया और मुँह  में रख दिया । इसके बाद एक गिलास पानी पी दिया ।
 मैस मोनिटर का यह काम भी होता था कि वह देखे कि कोई नाश्ता दुबारा तो नहीं ले  रहा
है ?  एक दिन मेरे और एक सहपाठी के बीच शर्त लगी । मैंने कहा, ‘‘मैं आज दुबारा नाश्ता करके रहूंगा ।‘‘  मैं एक बार नाश्ता लेने के बाद फिर से नाश्ता लेने लगा । मैस मोनिटर भाई साहब ने मुझसे कहा, ‘‘ तू तो पहले भी नाश्ता कर चुका है । मैंने कहा,‘‘ भाई साहब! मेरा नाश्ता गिर गया है।‘‘  उस दिन नाश्ते में पाकीजा लाया गया था । उन्होंने मुझे एक पाकीजा और दिला दिया   । शर्त लगाने वाले मेरे सहपाठी को जब यह पता लगा कि यह दुबारा नाश्ता प्राप्त करने में सफल रहा तो उसने मैस मोनिटर भाई साहब से मेरी शिकायत कर दी । उन्होंने मुझे और मेरे उस दोस्त को अपने पास बुलाया । मेरे दोस्त ने शिकायत करते हुए भाई साहब से कहा, ‘‘ इसका नाश्ता गिरा नहीं था । इसने झूठ बोला था ।‘‘
 उन्होंने मुझसे कहा, ‘‘ तुमने झूठ क्यों बोला ?‘‘ मैंने कहा, ‘‘ भाई साहब मेरा नाश्ता सचमुच गिर गया था । यह जमीन में नहीं गिरा था । यह मेरे दूध के गिलास में गिर गया था।‘‘  मेरी बात को सुनकर भाई साहब ने  मुझे डांटने के बजाय जोर से ठहाका लगाया। 


शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

इतिहास लिख रहा है कोरोना - रचना डॉ. उमेश चमोला


इतिहास लिख रहा है कोरोना ,
इसमें कुछ उजले पन्ने भी होंगे
जिनमे मानवता की रक्षा में तत्पर
लोगों का जिक्र किया जाएगा ,
इतिहास उन्हें विस्मृत होने नहीं देगा ,
आने वाली पीढी उन पन्नो को
सम्मान भरी नजरों से देखेंगी ,
कुछ ऐसे पन्ने भी होंगे
जब भी वे टटोले जाएंगे
पढ़ने वालों की  आँखों में इतिहास के 
इस    कालखंड का स्याह पक्ष उतर जाएगा ,
उन्हें लगेगा इतिहास भी स्वयं
थू थू कर रहा है मानवता के  हत्यारों पर |



बुधवार, 18 मार्च 2020

राउमावि पाला कुराली जखोली रूद्रप्रयागा नौनो कि कविता - प्रस्तुति अश्विनी गौड अध्यापक विज्ञान राउमावि पाला कुराली जखोली रूद्रप्रयाग ।

शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 14 श्री गुरुराम राय पब्लिक स्कूल और ऑडियो कैसेट ‘गौं मा‘


  वर्ष 1998 की बात है। डॉ. दिनेश चन्द्र भट्ट, दीपक गौड़, गोकरण बमराड़ा, गणेश डिमरी और महेन्द्र सिंह अधिकारी हम लोग श्री गुरुराम राय पब्लिक स्कूल श्रीनगर गढ़वाल में पढ़ाते थे। शाम को  दिनेश चन्द्र भट्ट और मैं अलकनंदा किनारे घूमने जाते थे। श्री भट्ट जी का उस समय भी साहित्यिक रुझान था । वे भी अपनी कुछ रचनाएं मुझे सुनाते थे। वे मुझसे पूछते थे,‘‘चमोला जी! आजकल क्या लिख रहे हो ? उन दिनो मैं हिन्दी में हास्य व्यंग्य की कविताएंॅ लिखता था। साथ ही मैंने गढ़वाली में भी कुछ गीत और कविताएंॅ लिखी थी। मैंने इन्हें श्री भट्ट जी को सुनाना शुरू किया। वे मेरा उत्साह बढ़ाते रहते थे। कुछ दिनो के बाद शाम को घूमने वाली टीम में  गणेश डिमरी, दीपक गौड़ और गोकरण बमराड़ा भी शामिल हो गए। गीतों को गुनगुनाने और सुनने-सुनाने का सिलसिला चलता रहा। एक दिन गोकरण बमराड़ा और दीपक गौड़ ने मुझे एक थीम दी। उन्होंने कहा कि एक ऐसा गीत लिखो जिसमें गांव के सौन्दर्य का जिक्र हो और गांव आने का आह्वान किया गया हो। श्री बमराड़ा ने एक गीतांश  सुना दिया,
                  ‘‘ टक लगैक सूण, ढोलकी चैत की,
                    छांछरी लगांदी बेटुली मैत की,
                    कबि खुदेड़ गीत, कबि सदैं लगांदी,
                    थड़्या चौफळों का हुलेर चौक मा,‘‘
मुझे अब इन्हीं पंक्तियों के ट्रैक पर एक गढ़वाली गीत रचना था। दो -तीन दिन में मैंने तीन-चार गीतांश बना दिए। इनमें से एक था-
                     ‘‘गौत,तोर, दाळ, चुला मा धैरीक
                      कुटेरि खुल्दि छुंयों कि दगड़ा बैठीक,
                      लंबी रात ह्यून्द की कटिदी छुयांे मा,
                      तू भी ऐ जा कछिड़ी मा ह्यूंद मैनो मा‘‘
जब मैंने ये गीतांश शाम को घूमते समय दीपक गौड़,गोकरण बमराड़ा और गणेश डिमरी को सुनाए तो उन्हें यह गीत अच्छा लगा । मैंने उन्हें अपना गीत ‘गाड गदेरा, गीत सुणौणा‘, किलै नी औणू त्वैतें बुलौणा पहले ही सुना रखा था। उन्हें यह गीत बहुत अच्छा लगा था। सबका यह मानना था कि यह गीत अत्यंत मार्मिक है।
एक दिन दीपक गौड़ ने मुझे पूछा, ‘‘आपके कितने गढ़वाली गीत तैयार हैं ?‘‘ ‘बारह- चौदह‘- मैंने कहा। दीपक गौड़ ने सुझाव दिया,‘‘क्यांे न इन गानो की एक कैसेट निकाली जाए।‘‘ अब प्रश्न था, इन गीतों को गाएगा कौन‘‘ ? गोकरण बमराड़ा ने गीत की कुछ पंक्तियांे को गुनगुनाना शुरू किया। दीपक गौड़ और मैंने कहा, ‘‘ अगर इन गानो को हमारे गोकरण बमराड़ा ही गाएं तो कैसा रहेगा ? ‘‘ सबने एकमत से स्वीकृति दे दी।
  मैं गुरुराम राय स्कूल में जीवविज्ञान प्रवक्ता के रूप में कार्यरत था। इस नाते जीवविज्ञान प्रयोगशाला का प्रभारी भी था। यह निर्णय लिया गया था कि छुट्टी के बाद जीवविज्ञान की लैब खोली जाएगी और रोज गीतों की रिहर्सल की जाएगी। इसके लिए हमने प्रधानाचार्य श्री बर्त्वाल जी से अनुमति ले ली। कैसेट के लिए आठ गीतों का चयन किया गया । पहला गीत गोकरण बमराड़ा और दीपक गौड़ की दी गई थीम पर आधारित था। गीत ‘गाड गदेरा गीत सुणौणा‘ और ‘ ये रौंतेळा मुलुक दोनो पलायन पर केन्द्रित गीत थे। ‘दारु तेरु ही छ सारु‘ गीत समाज में शराब के बड़ते प्रचलन पर एक व्यंग्य रचना थी।  ‘भोळ पूसै कि मासंत‘ गीत लोकगीत  शैली पर रचा गया गीत था। यह नायक और नायिका की मीठी नोंकझोंक पर आधारित था। एक श्रृंगार रस प्रधान गीत भी था- ‘ जब देखा, तब देखा सुपीन्यों मा ऐ जांदी, जिकुड़ी का बौण मा कुयेडि़ सीं छै जांदी, बथों सीं तू ऐ जांदी, बथों सीं तू चलि जांदी,
 इस प्रकार अलग-अलग मिजाज वाले आठ गीतों का कैसेट के लिए चयन किया गया। छुट्टी के बाद इन गीतों की आठ- दस दिन तक रिहर्सल की गई। अब बारी थी इन गीतों के रिकार्डिंग की। उन दिनो नीलम कैसेट कंपनी का नाम काफी चल रहा था। हमने नीलम कंपनी को एक पत्र लिखा। यह पत्र हमने अपर बाजार श्रीनगर के एक टाइपिंग केन्द्र से इलेक्ट्रोनिक रूप से टंकित कर नीलम कैसेट कंपनी के पते पर भेज दिया। 10-15 दिन तक हम इंतजार करते रहे। वहांॅ से कोई उत्तर नहीं मिला। हमने नीलम कैसेट कंपनी के स्टूडियो जाने का निर्णय लिया । हम लोग दिल्ली के लिए रवाना हो गए। हमने जानकारी प्राप्त कर ली थी कि नीलम स्टूडियो पांडव नगर में है। दिल्ली में आइ.एस.बी.टी. के बाहर हमने पांडव नगर और नीलम स्टूडियो जाने के बारे में पता किया। एक बस परिचालक ने कहा,‘‘नीलम स्टूडियो का तो पता नहीं है किन्तु मैं तुम्हें पाण्डव नगर तक छोड़ सकता हूंॅ। मेरी गाड़ी में बैठ जाओ। हम उसकी गाड़ी में बैठ गए। एक जगह पर गाड़ी रुकी। उसने हमें उतरने का संकेत दिया। हमने वहांॅ पूछा, ‘‘नीलम स्टूडियो किस तरफ है ?‘‘ एक आदमी ने कहा,‘‘ नीलम स्टूडियो तो पाण्डव नगर में पड़ता है जो यहांॅ से बहुत दूर है। ‘‘तो यह पांडव नगर नहीं है ?‘‘- हमने कहा। वह बोला, ‘‘यह पाण्डु मोहल्ला है।
 हमें पता चल गया कि पांडव नगर के भ्रम में बस का परिचालक हमें पाण्डु मोहल्ला छोड़ गया। इसके बाद हम पूछते -पूछते पांडव नगर और अंततः नीलम स्टूडियो पहुंॅच गए। वहांॅ हमने नीलम स्टूडियो के मालिक श्री कृष्ण कुमार चौधरी से संपर्क किया। उन्होंने हमें 15 दिन के बाद रिकार्डिंग की तारीख दी।
   हम 15 दिन के बाद गीतों की रिकार्डिंग के लिए नीलम स्टूडियो चले गए। वहांॅ हमारी मुलाकात संगीतकार श्री राजेन्द्र चौहान और लोकगायिका कल्पना चौहान से हुई। गोकरण बमराड़ा ने गीत श्री राजेन्द्र चौहान और श्रीमती कल्पना चौहान को सुनाए। श्री राजेन्द्र चौहान जी ने हारमोनियम पर गीतों को बजाया और हमारी सोची गई धुन में परिमार्जन किया। हम आठ गानो की रिकार्डिंग करके श्रीनगर वापस लौट आए।
   कुछ दिनो के बाद हमें सूचना मिली कि हमारे गानो की कैसेट ‘गौं मा‘ बाजार में आ चुकी है। हमने इसके लोकार्पण के बारे में सोचा। सोच विचार के बाद बैकुण्ठ चतुर्दशी मेले में इसके लोकार्पण करने का निर्णय लिया गया। हमने तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष श्री मोहन लाल जैन जी से संपर्क किया। वे लोकार्पण के लिए तैयार हो गए। हमने कार्यक्रम संचालन के लिए डॉ. राकेश भट्ट से बात की । डॉ. राकेश भट्ट के कुशल संचालन में कैसेट का लोकार्पण संपन्न हुआ। लोकार्पण कार्यक्रम में श्री राजेन्द्र चौहान और श्रीमती कल्पना चौहान भी शामिल हुए।
  वर्ष 1998 के बाद श्री गुरुराम राय में कार्यरत हमारी टीम बिखर गई। हमारी सरकारी नौकरी लग गई। इस बीच समय ने करवट ली । ऑडियो कैसेट के बाद सीडी का जमाना आया। देखते ही देखते यू ट्यूब ने सीडी और डी.वी.डी की जगह ले ली। वर्षों के बाद गोकरण बमराड़ा और दीपक गौड़ से प्रशिक्षण शिविरों में मुलाकात होती रहती । एक मुलाकात में गोकरण बमराड़ा जी ने बताया कि उनके पास ‘गौं मा‘ कैसेट के साउंड ट्रैक की सी.डी. है। हमने उस सी.डी. को यू ट्यूब में रिकार्ड करने की योजना पर कार्य करना शुरू कर दिया। मैंने  बमराड़ा जी से कहा,‘‘ ये साउंड ट्रैक मुझे ह्वट्सअप पर शेयर कर दो। बमराड़ा जी ने प्रयास किया किन्तु ये शेयर नहीं हो पाया। सितंबर 2019 में गोकरण बमराड़ा और दीपक गौड़ एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में मसाही ध्यान केन्द्र पुराना राजपुर देहरादून आए। हमने राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक श्री रमेश प्रसाद बड़ोनी से इस बात की चर्चा की।  उन्होंने कहा कि हमें पूरे साउंड ट्रैक को अलग-अलग गीतों में तोड़ना होगा। उन्होंने लैपटाप के माध्यम से साउंड ट्रैक को अलग-अलग गीतों के रूप में तोड़ दिया। इन गीतों में से तीन गीत श्री गोकरण बमराड़ा ने मुझे ह्वट्सप पर शेयर किए। 10 सितंबर 2019 को इस कैसेट के गीतों में से एक गीत ‘गाड गदेरा गीत सुणोणा‘ को ‘अपणी पछ्याण, गढ़वाली कुमाऊं उत्तराखण्ड‘ के यू ट्यूब में अपलोड किया गया। ‘गौं मा‘ ऑडियो कैसेट के अन्य गीत भी शीघ्र ही आपके पास यू ट्यूब के माध्यम से उपलब्ध होंगे।




शनिवार, 25 जनवरी 2020

कुछ यादें , कुछ बातें 13





लेखन और  मेरे पत्रमित्र श्री मिट्ठन लाल अरोड़ा 
       जब मैं डिग्री कालेज में पढ़ता था तो अख़बारों में पत्र कालम के अंतर्गत अपने आलेख भेजता था | सप्ताह में कम से कम दो पत्र मेरे प्रमुख समाचार पत्रों में छपते ही रहते थे | इन पत्रों पर कई विद्वान पाठकों की प्रतिक्रिया पोस्ट कार्ड के माध्यम से  प्राप्त होती रहती थी  | वे मेरे पत्रमित्र बन गये थे | कुछ दिन पहले जब मैं अपने किताबों की आलमारी में एक किताब ढूढ   रहा था तो एक पुरानी किताब के अन्दर उस समय के कुछ मित्रों के भेजे पत्र मुझे
 मिले |  तो उन पत्रों को देखकर उन पत्रमित्रों की याद ताजा हो गई | इन पत्रमित्रों में से एक प्रमुख नाम था – मिट्ठन लाल अरोड़ा डिप्टी कलैक्टर सेवानिवृत्त जो मुजफ्फरनगर के रहने वाले थे | जब भी समाचार पत्र में प्रकाशित मेरा कोई पत्र उन्हें अच्छा लगता था तो वे पोस्टकार्ड में उसके बारे में लिखकर मुझे बधाई सन्देश भेजते रहते थे | इसके अलावा तीज त्यौहार और राष्ट्रीय पर्वों पर उनके शुभकामना सन्देश पोस्ट कार्ड के माध्यम से मुझे प्राप्त होते रहते थे | मैं भी उनके पत्रों का जवाब देता था | डिग्री कालेज में पढने के समय से शुरू हुई यह पत्रमित्रता राजकीय सेवा में आने तक भी चलती रही | मैंने अपनी पहली पुस्तक ‘राष्ट्रदीप्ति’ की स्क्रिप्ट  उनको भेजी थी | उन्होंने इस पर अपनी प्रतिक्रिया मुझे भेजी | मैंने इसे पुस्तक में स्थान दिया था | वर्ष २००४ में जब मैं लमगौन्डी (जिला रुद्रप्रयाग ) से नरेंद्रनगर आया तो सामान की शिफ्टिंग के कारण उनके भेजे पत्र इधर उधर हो गये | इसलिए श्री अरोड़ा जी से संपर्क टूट गया |   अब इतने वर्षो बाद मुझे उनके भेजे गये पत्र पुरानी किताब के अन्दर मिले तो उनकी याद ताजा हो गई | क्या पता फेसबुक के माध्यम से उनके बारे में पता चल पाए  और उनसे फिर से संपर्क हो जाए | इस आशा के साथ इस पोस्ट को साझा कर रहा हूँ |


शनिवार, 18 जनवरी 2020

drishti: कुछ बातें, कुछ यादें 12 ...

drishti: कुछ बातें, कुछ यादें 12 ...:       बचपन में पिताजी को कविता लिखते और, और लोगों को   सुनाते हम देखते रहते थे | इसलिए देखते ही देखते कविता के प्रति कब आकर्षण पैदा हो गय...

कुछ बातें, कुछ यादें 12 लेखन और बचपन के अनुभव


      बचपन में पिताजी को कविता लिखते और, और लोगों को  सुनाते हम देखते रहते थे | इसलिए देखते ही देखते कविता के प्रति कब आकर्षण पैदा हो गया , पता ही नहीं चला | माँजी लिखती नहीं थी किन्तु माँजी के पास गढवाली भाषा की लोकोक्ति, मुहावरे और शब्दों का अकूत भंडार है | इसलिए पिताजी से हमें लेखन का संस्कार मिला  और माँ जी से लोक में प्रचलित कहावतों, मुहावरों आदि  से परिचय | बचपन में न जाने कितनी लोककथाएं माता जी के श्री मुख से हमें सुनने को मिली थी |
   कक्षा 8 उत्तीर्ण करने के बाद मेरा चयन एकीकृत परीक्षा के जरिए आवासीय छात्रावास श्रीनगर के लिए हुआ | छात्रावास में अंग्रेजी और हिन्दी के  महत्वपूर्ण अखबार पढने को मिल जाते थे | इसके अलावा श्रीनगर में नंदन, चम्पक, पराग, चंदामामा, लोटपोट, मधु मुस्कान और प्राण के और अन्य कामिक्स हम बाजार से खरीदकर चोरी छिपकर पढ़ते थे | इससे पढने – लिखने के प्रति हमारी रूचि बढ़ती गई | बचपन से ही मेरी रूचि भाषण,वाद – विवाद और कविता पाठ में रही थी | जब मैं कक्षा 10 का विद्यार्थी था , एक बार हिन्दी सप्ताह के अंतर्गत विद्यालय में राष्ट्रभाषा से सम्बंधित  भाषण प्रतियोगिता  चल रही थी | मैंने भी इसमें भाग लिया था | मैंने अपने भाषण के बीच में श्री मैथिलीशरण गुप्त की कविता की यह पंक्तियाँ भी उद्धरित करने के लिए शामिल की थी – बिना राष्ट्रभाषा स्वराष्ट्र की गिरा आप गूंगी असमर्थ,
                    एक भारती बिना हमारी , भारतीयता का क्या अर्थ ?’’
मुझसे पहले सीनियर कक्षा के छात्र का नंबर आया | उसने अपने भाषण में इसी कविता की पंक्तियाँ कह दी| यह सुनकर  मुझे निराशा हुई कि उन्हीं पंक्तियों को मैं फिर कैसे दुहराऊँ? उस दिन मैंने मन में संकल्प किया कि मैं भाषण को अलंकारिक और रोचक बनाने के लिए स्वयं की लिखी कविताओं का प्रयोग करूँगा | इसके बाद मैंने जिस भी भाषण और वाद – विवाद प्रतियोगिता  में भाग लिया उसमें अपनी कविताओं का प्रयोग किया | इस प्रकार इन प्रतियोगिताओं के साथ कविता लिखने का अभ्यास भी शुरू हुआ  जो इंटर कालेज से शुरू होकर उच्च शिक्षा तक चलता रहा |
 जब हम कक्षा 11 में पढ़ते थे | प्रमोद कुकरेती और मेरा चयन वाद – विवाद प्रतियोगिता के लिए विकासखंड स्तर से जिला स्तर के लिए हुआ था | जिला स्तर पर यह कार्यक्रम बालिका इंटर कालेज श्रीनगर में हुआ | हमारे छात्रावास अधीक्षक डॉ० लक्ष्मी प्रसाद नैथानी सर ने मुझे गीता के श्लोक की पंक्तियाँ नोट कराई और कहा कि भाषण के बीच में इनका प्रयोग करना | मैंने इन पंक्तियों को याद करने का प्रयास किया | ये याद भी हो गई थी | मैंने सुविधा के लिए कागज के एक टुकड़े में लिखकर प्रतियोगिता में पढने के लिए अपने पास रखा | जैसे ही मैंने
कागज का वह टुकड़ा पोडियम पर पढने के लिए रखा और अपनी बात को पुष्ट करने के लिए कहा,
गीता में भी कहा गया है | वैसे ही वह कागज का टुकड़ा हवा से उड़कर एक निर्णायक की मेज पर  पहुँच गया | यह देखकर वह मुस्कराए | अचानक हुए इस घटनाक्रम से मेरा भाषण का प्रवाह कुछ पलों के लिए रुका किन्तु मैंने अपने को तुरंत संभालते हुए गीता के उस श्लोक का भाव हिन्दी में सुना दिया | हमारी टीम (प्रमोद कुकरेती और मैं ) ने प्रथम स्थान प्राप्त किया |
     बच्चों की लेखन क्षमता को उभारने में विद्यालय की पत्रिका की महत्वपूर्ण भूमिका होती है | राजकीय इंटर कालेज श्रीनगर में ‘वाणी’ वार्षिक पत्रिका का प्रकाशन किया जाता था | ;वाणी के संपादन का कार्य हिन्दी के गुरूजी डॉ. विष्णु दत्त कुकरेती करते थे | वाणी पत्रिका में मेरे दो आलेख ‘प्रतिकूलताएँ व्यक्तित्व निर्माण मे सहायक’ और ‘राष्ट्रीय एकता में बाधक राष्ट्रभाषा समस्या’ प्रकाशित हुए थे | एक लेखक के रूप में इनके प्रकाशित होने पर मुझे बहुत खुशी हुई थी | जब मैं कक्षा 11 का छात्र था डॉ. कुकरेती गुरूजी ने  ‘वाणी’ पत्रिका क छात्र सम्पादक के रूप में मेरा चयन किया था | इससे लेखन के प्रति मेरी रूचि और उत्साह बढ़ गया  |
    छात्रावास में शाम के समय एक दिन मैं अपने कमरे में अकेला था | मेरे कमरे की खिड़की से आसमान का एक छोर दिखाई देता था | उस छोर पर क्षितिज पर मैं सूर्यास्त के बाद की रंगीन आभा जिसे स्वीली घाम कहा जाता है , को देख रहा था | उस नयनाभिराम दृश्य को देखकर मेरे  मन में कविता की कुछ पंक्तियाँ आ रही थी | तभी मुझे छात्रावास अधीक्षक डॉ. नैथानी सर का स्वर सुनाई दिया, बेटा! प्रेयर का समय हो गया है | मैं तुम्हें पांच मिनट से आवाज दे रहा हूँ | तुम्हें सुनाई नहीं दिया | फिर कुछ रूककर बोले , बेटे ! तुम्हारे पिताजी शायद तुम्हें उतना नहीं जानते होंगे जितना मैं तुम्हें जान गया हूँ | तुम्हें अनुकूल परिस्थितियां मिल गई तो तुम अच्छे लेखक बन सकते हो |
     आज कुछ रचनात्मक शिक्षक दीवार पत्रिका के माध्यम से बच्चों की सृजनात्मक क्षमताओं को अभिव्यक्ति का मंच देने का सार्थक प्रयास कर रहे हैं | उस समय दीवार पत्रिका जैसा रचनात्मक मंच नहीं था | ऐसे में हम कभी – कभी विद्यालय के बोर्ड पर समाचारों के साथ – साथ कुछ सूक्तिपरक वाक्य खोजकर लिखते थे | एक बार शिवरात्रि के अवसर पर मैंने अपनी कविता बोर्ड पर लिखी थी | उसकी अंतिम पंक्तियाँ थीं – ‘ह्रदय से हटे तमस, यही हो भावना,
                                     यही शिवरात्रि की शुभकामना |’
इस कविता को पढ़कर डॉ. विष्णुदत्त कुकरेती सर ने मुझे बधाई दी | इस कविता के और क्या –क्या पक्ष हो सकते हैं ? उन्होंने मेरा मार्गदर्शन किया | इसके बाद मैंने इस कविता के दो – तीन पद्यांश और लिखे थे | मुझे अब वह कविता याद नहीं है |
c- डॉ. उमेश चमोला