रविवार, 3 सितंबर 2017

किताबी समीक्षा
 ‘पथ्यला मा दिख्येंदन जीवन अर संस्कृति का बन्या- बन्या रंग
समीक्षक –संदीप रावत
 बथो (तेज हवा) का कारण जो पत्ता भुयां पडी जांदन वूं खुणि ‘पथ्यला’ ब्वले जान्द | पाड का रैबास्यों का जीवन मा बि कुछ यनि होंणू रैंद यानि बथों औणा रैन्दिन पर फेर बि यखा मनखी टकटका रैन्दीन अर एक जीवंत जीवन बितोंदन | ‘पथ्यला’ नौ छ एस० सी ० ई ० आर ० टी नरेन्द्र नगर मा प्रवक्ता पद पर कार्यरत डॉ० उमेश चमोला कि नै गढ़वाली काव्य पोथी कु जो कि नै छवालि का एक हुणत्यला लिख्वार छन |विचारक छन अर दगड़ा दगड़ी शोधार्थी बि छन | कवि का रूप मा डॉ ० चमोलान अपणा जीवन रूपि डाला से हुयाँ अनुभव रूपि झौडयां पत्तों (पतगा या पथ्यला) तैं ये काव्य संग्रह कु पथ्यला नौ रख्युं छ |
  यीं काव्य पोथी मा उनतीस गीत अर पंद्रह कविता कुल मिलैकि चवालीस रचना छन | जैकु आमुख प्रसिद्ध रंगकर्मी प्रो० डी० आर ० पुरोहित जी कु भौत अच्छा ढंग से लिख्युं छ | अपणि रचनौ कि शुरुवात डॉ० चमोलान ‘शारदे माँ’ का गीत से कर्युं छ | यामा वु वाग्देवी से उत्तराखण्ड मा ज्ञान कु दिया जलौनो अर प्रेम कु बसंत ल्यौनो आह्वान कर्द –
 ‘नया राज उत्तराखण्ड मा, ज्ञान कु दयू जले दये,
 ख्यद अम्पत का बथों मा, प्रेम फुल्यार लै दये |
 रूखी सूखी डाली बोट्लों,मोल्यार ल्येक ऐ तू,
 भला भला बाटों मीं हिटै दये,शारदे ब्वे मेरि तू |’
पथ्यला नौं का गीत की शुरुवात मा डॉ० चमोलान लेखि –
‘हम पथ्यला बौण का, कैतें हमुन दयोंण क्या,
डालों का जब पतगा छा, भला लगदा कतगा छा,
डालों का हम गैल छा,सबु तैं देंदा छैल छा |
ये गीत का अंत मा ब्वलदन –
‘हैका मोल्यार फेर औला, रीति डालों तैं सजोला,
आज छन हम उदास, भोल खुश्या गीत गौला,
जिन्दगी की औणी जाणी,हमुन कै बतोंण क्या,
हम पथ्यला बौण का|’
   यीं काव्य पोथी मा वास्ते मा जीवन अर पाडै संस्कृति का बन्याँ –बन्याँ रंग दिखेंदन | बसंत का दगडी पतझड़ कु बि स्वागत, प्रकृति चित्रण, पाड़ी जीवन मा औण वालि खैरी विपदा अर लोकजीवन से जुडी बात यीं काव्य पोथी मा छन | यों सब्यों का दगड़ी पाड़ी जीवन मा होण वला परिवर्तनों पर बि कवि कि पैनि नजर छ तबि त मद्य निषेध,पलायन, जातिवाद, भ्रष्टाचार अर देश प्रेम जना मुद्दों पर बि बड़ा असरदार ढंग से यीं पोथी मा कविता अर गीतों का माध्यम से लिख्युं छ | ‘ब्वारी नि मिलि भलि’ रचना मा डॉ० चमोला ब्वलदन –‘स्वीणों कु महल चूर चूर ह्वेगी, ब्वारी नि मिलि भलि जिकुड़ी रवेगी ‘| मजबूरी मा पहाड़ का गौ छोडीक शहर की तरफा पैटणा कु वर्णन कविन ‘गुरुमूल्या ढूंगो सीं नौ कि कविता मा करयूँ छ – ‘घौणा बौण का स्वाणा ये मुलुक छोड़ी, अपडी जिकुड़ी तैं तोडी ,द्वी चार कागजा कत्तरो तैं पौनो, दादा –दादी, अर ब्वे बुबा कि मुखड़ी मा चलक देखणों मी आयूँ यख,धुआं ही धुआं च जख |’’
  कवि अर गीतकार डॉ० चमोला अपणि जमीन अर अपणा पहाड़ से भितर तक जुडयूँ च या बात वेका ‘ऐ जा मेरा गौं मा, नौ का गीत से स्पष्ट ह्वे जान्द – ‘टक लगैक सुण, ढोलकी चैत की,
               चांचरी लगान्दी बेतुली मैत की,
               कबि खुदेड़ गीत,कबि सदें लगान्दी,
         थड्या चौफलों का हुलेर चौक मा,
               मेरा गौ मा |’
कविता अर गीतों की भाषा सरल च, नागपुरी शब्द कविता अर गीतों मा दिखेंदन |कुछ शब्दों मा प्रिंटिंग कि गलती दिख्येन्द | आम जीवन अर लोखू से जुड्यां शब्दों कु प्रयोग करयूँ छ | कविन कठिन शब्दों कु हिन्दी मा अर्थ पोथी का सबसे पिछ्न्याँ पन्नों मा देकी होरि अच्छु काम करी | कुल मिलैकि यीं काव्य पोथी मा भला –भला गीत अर कविता छन | वास्तव मा कवि कु यीं काव्य पोथि कु सार्थक नौ  ‘पथ्यला’ रख्युं छ | लोकसंस्कृति अर लोकभाषा का संरक्षण का वास्ता यनि काव्य पोथी लिखे जाण जरूरी छ | आज का ये समय मा इलेक्ट्रोनिक मीडिया का ये दौर मा रुचिपूर्ण स्वस्थ मूल्यों पर आधारित ,लोकजीवन से जुड्यीं बातों पर आधारित अर सबसे बड़ी बात कि अपणि लोकभाषा मा लिख्युं साहित्य कु प्रचार प्रसार कि भौत जर्वत छ आज |
   यीं कविता पोथी से पैलि डॉ० चमोला कि राष्ट्रदीप्ति(राष्ट्र भक्तिपूर्ण गीत अर कविता संग्रह ), उमाळ( गढ़वाली खंडकाव्य), पर्यावरनीय शिक्षा पाठ्य सहगामी क्रियाकलाप अर आस- पास विज्ञान का नौं से पोथी पैलि ऐग्येनी  / प्रकाशित ह्वे गैनी, उत्तराखण्ड विद्यालयी शिक्षा द्वारा प्रकाशित कै किताब्यों मा उंकों विषय समन्वयन अर सम्पादन लेखन कु काम करयूँ च अर कना छन | भौत कठिन काम होंद अपणि सरकारी नौकरि मा रैकि लेखन कु कम करणु | वास्तव मा यो अच्छु संकेत च हमारि लोकभाषों खुणि कि उच्चतर पढयां –लिख्याँ शिक्षक अर वु बि विज्ञान सेम का शिक्षक अपणि लोकभाषों मा लिखणा छन अर काम कना छन |
 काव्य संग्रह – पथ्यला
 कवि –डॉ० उमेश चमोला
प्रकाशक –अविचल प्रकाशन बिजनौर, मूल्य -१०० रु०
समीक्षक –संदीप रावत
( उत्तराखण्ड खबर सार १ अक्टूबर -१५ अक्टूबर २०११ का अंक से आभार )
  



शनिवार, 2 सितंबर 2017

किताबी समीक्षा
  हम पथ्यला बौण का
समीक्षक – डॉ० नन्द किशोर ढोंडियाल ‘अरुण’
   या बड़ी खुशी की बात छ कि अजकाल गढ़वाली भाषा का लिख्वारू मा लिखनौ को जो उत्साह दिखेणु छ वे से लगदा कि वो दिन दूर नी जै दिन ये को साहित्य हिन्दी की तरां हि समृद्ध ह्वे जालू | आज कविता बि लिखेणी छन,त एकांकी नाटक बि,निबंध छपेणा छन त उपन्यास कहानी बि,रिपोर्टिंग बणणी छन त समीक्षा बि, क्वी पत्र साहित्य को सृजन कना छन त क्वी आत्मकथा लेखन कु प्रयत्न बि कना छन | ब्वलनो अर्थ यो छ कि आज गढ़वाली भाषा मा सभी प्रकार को साहित्य लिखेणु छ |
     कविता साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण, प्रभावशाली अर अमर साहित्य विधा छ,जो आज कई धारों मा बगणी छ | कखि या शुद्ध कविता का रूप मा अपणि पुराणी पछ्यांण मा ज्युन्दी छ त कखि गीतों का बाना सुणदरों तैं अपणि मिट्ठी भाषा मा मन मुग्ध करी देंद | कखि या नवगीत बणी ऐ त कखि जापानी काव्य शैली का हाईकू का रूप मा समणि आणी छ | गजल कि बानगीमा ईं कविता तैं लोग हथ्युं हाथु लीणा छन त अकवियों कि अकविता का रूप मा मुक्त या रबड़ छंद मा मान्यता का शिखरों तैं बि छूंण लगीं |
   डॉ० उमेश चमोला की सन २०११ मा अविचल प्रकाशन बिजनौर /हल्द्वानी बटी प्रकाशित ‘पथ्यला’ कविता संग्रे बि कविता की द्वी धारों तैं स्पर्श करण वालि कृति छ | यीं कृति मा जख एक गीतकार का गढ़वाली गीत छन वख मॉडर्न कविता की नई बानगी बि | सुन्दर नयनाभिराम सतरंगा चित्र वालि यीं ८० पृष्ठीय कृति डिमाई आकृति हार्ड बाइंडिंग मा गुथी छ | मात्र सौ रूप्या कीमत वली ईं कविता पोथी तैं डॉ० उमेश चमोलान गीत कविता संग्रे को रूप देकि वे ‘पथ्यला’ को भाव जागृत करि दे जो कि पथ्वडयो करदु छौ |
    यीं पोथी को शीर्षक बड़ो मार्मिक अर अर्थपरक छ | कविन यीं कविता मा ‘पथ्यला’ शब्द को अर्थ आंधी अर बरखा से टूटयां पत्तों को ढेर जैतें हिन्दी मा ‘मर-मर’ बि ब्वले जान्द | पर गढ़वाल मा पथ्वडया एक द्यबता बि छ जो कि घणा जंगलु मा पथ प्रदर्शन को काम करदा | वेका थान मा लोग पत्ता तोडी कि डालदी | जैसे एक स्पष्ट संकेत मिल्द कि निर्जन बण मा इनो मन्खि पैलि बि इख से ह्वेकि गै | इलै जंगल मा डरने कि क्वी बात नी | ये अर्थ मा बि पथ्वडया या पथ्यला को अर्थ पथप्रदर्शक हूंद | कविन यीं कृति को नों शैद पथ प्रदर्शक या बिखरयां पत्तों का अर्थ मा करी |
   कविवर डॉ उमेश चमोला की यीं कविता कृति ‘पथ्यला’ कि भूमिका सन २००९ मा प्रोफेसर डी० आर ० पुरोहित निदेशक (तत्कालीन)लोककला अर निष्पादन केंद्र हे० न० बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर न लेखि | विद्वान भूमिका का लेखकन ‘आमुख’ शीर्षक से लिखीं या भूमिका डॉ० चमोला की यीं कविता पोथी की कवितों तैं केंद्र मा रखि लिखीं | गीत अर आधुनिक कवितों का उद्धरण देकि भूमिका लेखक न या सिद्ध करीं की ‘पथ्यला’ गीत अर कविता संग्रे एक उच्चकोटि कि साहित्यिक कृति छ  जैमा गढ़वाल का जनजीवन की झांकी मिल्द |
    भूमिका का बाद शुरू हुंदिन यीं कृति की वो चवालीस रचना जौं तैं कविन ‘अपडी बात’ का बाद स्थान दे | यीं कृति कि उनतीस रचनो तैं गीत खंड मा स्थान दियेगे, त पन्द्र रचनो तैं कविता खंड मा | गीत खंड कि उनतीस रचनौ मा पैलि रचना छ ‘शारदे ब्वे मेरि तू’| यीं रचना मा डॉ० उमेश चमोला माँ सरस्वती से प्रार्थना करदिन कि हे ज्ञान, सम्मान,गीत –संगीत ,बुद्धि प्रीती अर जीत का प्रतीक मेरि शारदा माँ यीं ढगडयंदि माया का भंवर से मेरि जीवन रूपि नाव तैं भैर करि दे | मैं तेरो बालो नौनो छयुं अर तू मेरि माँ छई |
 ‘ज्ञान की ,सम्मान की तू, गीत संगीत की तू,
 बुद्धि से प्रीत की तू, ज्ञान की जीत की तू,
 ढगडयंदि माया का भौंर नाव मेरि खेई तू,
 तेरो बालो नौनो छौं मी, शारदे ब्वे मेरी तू |’

डांडी- कांठी, रौलि गद्न्युं, गढ़ गीतुं तैं गुंजै दये,
भटकणा छन जु आज लोग,वूँतैं बाटू बतै दये,
अपणा खुटयों मा मी जगा दे, शारदे ब्वे मेरि तू |
   ये गीत मा कवि चमोला यो संकेत करदा कि लोग अपणा रास्तों से भटकणा छन | वूँ भटग्या लुखु तैं रस्ता बतै दे | कवि कि यीं पोथी कि दुसरी कविता छ ‘गढ़वंदना’ जैमा गढ़वाल कि धरती कि महिमा, यख का तीरथ अर सुन्दर प्रकृति को वर्णन करे गे |
‘ देवभूमि, गढ़भूमि, त्वेतैं प्रणाम,
 बद्री केदार जन जख छन धाम ,
 हिमालै का कोखला मा, बस्युं गढ़वाल ,
 ऋसि मुन्यों की तपोभूमि, भारत कु भाल,
 भक्ति कु उजालू फैलि, पैलि आई घाम,
  देवभूमि, गढ़भूमि, त्वेतैं प्रणाम |
  ये ही तरां यीं कृति का ‘पथ्यला बोण का’ कविता गीत से ये संसार तैं एक सन्देश मिलद कि-
 ‘हम पथ्यला बौण का, कैतें हमुन दयोंण क्या,
  डालों का जब पतगा छा,भला लगदा कतगा छा,
डालों का हम गैल छा,सबु तैं देंदा छैल छा,
बथोंन मारयां रोण क्या, हम पथ्यला बौण का |’
  ये गीत मा कवि संसार तैं यो संदेस दीन्द कि हम त डाली बटी झडयां पत्तों का जनि छवां | हम कैतें क्या दे सकदो ? एक समै छौ जब हम डाली की शोभा छ्यां | डाली का मित्र बणी हम संसार तैं छाया दीन्दा छ्या पर अब हम आंधी का मरयां भुयां गिरयां पत्ता छ्वां | यां से क्या रोण ?
   ईं कविता कि तरों यीं पोथी की शेष २६ गीत त्वेतैं बुलोणा, सूणा दिदों,सूणा भूलों,सुपीन्यों मा,ऐ जा म्यारा गौं मा,कैकि इन याद आई,बुरांस का डालों मा,तेरि खुद मा, बसंत ऐगी,गीत गाणू,तेरि आन्ख्यों मा,मोल्यार आलू, जाणु छौ, सुपिन्यों मा औणी रै, क्या पाई त्वेन,रैबार मेरु,बेरोजगारी कु ब्यौ,अब छौं टूटूदु गैणू,उत्तराखण्ड बणी ग्याई,कनकै बतों,रैबार, ब्वारी नि मिलि भली,रौड, यकु बगत सदनि नि रैंदु,माया का जाळ मा, दणमण आंसिधारी अर आज –आज भोल –भोल बड़ा मार्मिक अर द्वी अर्थक का साथ वियोग सृंगार का उदाहरण बि छन |
    कविता खंड कि सबि कविता जबरि बटी पीनि दारु,सुपिन्या,बसंत तु सोचि समझी ऐ, रवाडू, गुरमुल्या ढूंगु सीं, गौं कु नेता, पहाड़ एक, पहाड़ –दो, भ्वींचलु- एक, भ्वींचलु- दो , छ्वीं,देखी धों,सोचा भैज्यों,पलायन –एक, पलायन –दो बड़ी आत्मपरक अर समाज सापेक्ष छन | सोचा भैज्यों कविता चिंतनीय कविता छ जैमा कवि बोल्दा –
 ‘जातिवाद क्षेत्रवाद को जम्युं छ यो खोड़ कट्यार,
 कैन बूति? कैन बूति,सोचा भैज्यों,बींगा भूलों |’
  डॉ उमेश चमोला कि या पोथी साहित्यिक पोथी छ | येमा समाज,देश अर व्यक्तिपरक कविता छन | डॉ० चमोला कि कलम गतिशील कलम छ जै पर प्रगति की स्याही भ्वरी छ | आशा छ कि वु यीं कृति का बाद और चललि अर गढ़वाली साहित्य को भण्डार भरली | यीं आशा अर अपेक्षा का दगड़ी, कवि तैं बधे |
किताबी नों – पथ्यला, कवि –डॉ ० उमेश चमोला,
प्रकाशक –अविचल प्रकाशन बिजनौर ,मोल -१०० रु ;छ्पन्याँ साल -२०११
समीक्षक –डॉ० नन्द किशोर ढोंडीयाल’अरुण’


( उत्तराखण्ड खबरसार  1 जुलाई बटी  १५ जुलाई २०११ का अंक से साभार) 

सोमवार, 28 अगस्त 2017




सहज-सरल – सुगम शिक्षण : परिणामोन्मुखी    शिक्षण के लिए एक दिग्दर्शिका

      शिक्षण प्राचीन काल से ही दार्शनिकों, शिक्षा के अध्येताओं और चिंतकों के लिए विचार विश्लेषण का विषय रहा है | शिक्षण को परिणामोन्मुखी बनाने के लिए कई अध्ययन और शोध किये गए हैं | इसके अलावा शिक्षण की प्रक्रिया में शिक्षकों द्वारा व्यक्त अनुभव शिक्षण को समझने,शिक्षण में आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों तथा उनके समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं | प्राथमिक शिक्षकों के शिक्षण को सरल बनाने के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए पुस्तक ‘सहज-सरल-सुगम शिक्षण’ लिखी गई है जिसका संपादन प्रो ० दुर्गेश पन्त, निदेशक उत्तराखण्ड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसन्धान केंद्र देहरादून,प्रो० जे० के ० जोशी,वरिष्ठ वैज्ञानिक सलाहकार उत्तराखण्ड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसन्धान केंद्र देहरादून,डॉ० ओम प्रकाश नौटियाल वैज्ञानिक उत्तराखण्ड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसन्धान केंद्र देहरादून तथा डॉ० सुनील कुमार गौड़ शिक्षक –प्रशिक्षक राज्य शैक्षिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद् उत्तराखण्ड देहरादून द्वारा किया गया है |
 इस पुस्तक के माध्यम से संपादक मण्डल द्वारा शिक्षण,अध्ययन और शोध सम्बन्धी अनुभवों से प्राप्त ज्ञान को पाठकों से साझा करने का प्रयास किया गया है | पुस्तक की विषयवस्तु को १५ अध्यायों में बांटा गया है | इन अध्यायों में प्रभावी शिक्षण,बोलना,दूसरी भाषा को सीखना,व्याकरणीय, सामाजिक –भाषाई और युक्ति दक्षता पर प्रकाश डाला गया है | इसके अलावा पढना सीखना और सिखाना ,पठन कौशल का शिक्षण, लिखना, आंकिक चिंतन,संगीत एवं पठन कौशल,न्यूरोप्लास्टिसिटी, हैन्डेडनेस ( बांये / दांये हाथ से लिखने की प्रवृत्ति ) तथा शिक्षण में हास -परिहास के महत्व को समझाया गया है |
  ‘प्रभावी शिक्षण कार्य’ के अंतर्गत सीखने की प्रक्रिया, लिखने – पढने के कौशल, मानव बुद्धि के विभिन्न प्रकारों, शैक्षिक प्रक्रियाओं, शैक्षिक उपलब्धि के मूल्यांकन की प्रक्रियाओं आदि से सम्बंधित जानकारियों के साथ शिक्षा से जुड़े सिद्धांतो और बातों की समझ को आवश्यक बताया गया है | साथ ही आवश्यक कौशलों के शिक्षण में महत्व को भी बताया गया है | शिशु के जन्म से 24 माह की अवधि तक बच्चों में बोलने के कौशल के चरणबद्ध विकास पर अध्याय 2 ‘बोलना’ में प्रकाश डाला गया है |  इसमें यह बताया गया है कि जन्म के तुरंत बाद शिशु माँ की आवाज की लय /ताल –ध्वनि के साथ प्रतिक्रिया व्यक्त करना शुरू कर देता है | 6 माह में वह शब्द ध्वनि की पहचान करने में सक्षम हो जाता है | १२ माह में वह शब्दों से अर्थ जोड़ना शुरू कर देता है | १८ माह में वह संज्ञा और क्रिया के अन्तरो  को पहचानना शुरू कर देता है | अध्याय में इस वैज्ञानिक सत्य को भी उल्लखित किया गया है कि एक शिशु के मस्तिष्क में अवस्थित तंत्रिका कोशिकाएं दुनियाँ की सभी भाषाओँ की ध्वनियों के प्रति प्रतिक्रिया देने में सक्षम होती है | इसलिए इस जन्मजात क्षमता के सम्यक उपयोग के लिए ऐसा वातावरण सृजित किया जाना चाहिए जिससे उन्हें अनेक शब्द और वाक्य सुनने को मिलें |इसके साथ ही इस अध्याय में जन्म के बाद के प्रारम्भिक वर्षों में शिशु को अधिकतम चीजों के अवलोकन पर बल दिया गया है |
 ‘दूसरी भाषा को सीखना’ अध्याय में दूसरी भाषा के महत्व को समझाया गया है |इसमें स्पष्ट किया गया है कि दूसरी भाषा को सीखने के लिए उपयोग में लाई जाने वाली युक्तियाँ बच्चों की मातृभाषा की समझ और उसको बोलने की योग्यता में सहायता पहुँचाती है | इसके बाद के अध्यायों में व्याकरण से सम्बंधित दक्षता ( जैसे शब्द भंडार,भाषाई चिह्न विधान के नियम,शब्द निर्माण तथा वाक्य संरचना),सामाजिक –भाषाई दक्षता (व्याकरण के स्वरूपों का सामाजिक सन्दर्भों के अनुरूप उपयोग करना ),संवाद दक्षता,युक्ति दक्षता (शारीरिक हाव भाव तथा एक ही बात को स्पष्ट करने के लिए आवश्यकतानुसार मिलते जुलते शब्दों का प्रयोग करना ) को स्पष्ट किया गया है  तथा ‘पढना सीखना और सिखाना में इस वैज्ञानिक तथ्य को बताया गया है कि मानव मस्तिष्क में पढने के लिए कोई हिस्सा निर्धारित नहीं है| अत: पढना एक स्वाभाविक योग्यता नहीं है |इसलिए विद्यालय में भेजे जाने से पहले घर –परिवार में पढने का वातावरण तैयार किया जाना चाहिए | इससे विद्यालय में उसे पढना सीखने की योग्यता प्राप्त करने में सरलता होगी | पठन कौशल का विकास करने के लिए विद्यार्थियों को सतत अभ्यास कराये जाने की आवश्यकता है | ‘लिखना’ अध्याय में लिखने के कौशल के विकास के लिए बच्चों को चित्रण के पर्याप्त अवसर दिए जाने चाहिए | देखना, सुनने और चित्रण करने के बाद लिखने का कौशल विकसित होता है | यह केवल शब्दों को लिखने के लिए ही सत्य नहीं है अपितु अंकों को लिखने में भी लागू होता है |
   प्राय: आम धारणा प्रचलित है कि संगीत का भाषा की उपलब्धि पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है जबकि गणित जैसे विषयों में उपलब्धि को यह प्रभावित नहीं करता है | ‘आंकिक चिंतन’ में इस धारणा के विपरीत बताया गया है | संगीत का प्रशिक्षण प्राप्त करते समय मस्तिष्क के जो भाग सक्रिय होते हैं वे ही भाग गणितीय प्रक्रियाओ को करते समय भी सक्रिय होते हैं | इसलिए विद्यार्थियों को संगीत सम्बन्धी गतिविधियों में भाग लेने के अवसर दिए जाने चाहिए | 4 और 5 वर्ष के बच्चों पर किये शोध के परिणामो से ज्ञात हुआ है कि संगीत कौशलों के विकास होने पर पढने के विकास में भी वृद्धि देखी गई |
   ‘हैंडेडनेस’ अध्याय में सामान्य कार्यों को दायें हाथ से करने और बांये हाथ से करने वाले लोगों के बारे में बताया गया है | यदि बच्चा स्वाभाविक रूप से बांये हाथ से लिखता है तो उसे दांये हाथ से लिखने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए | बुद्धि,जीवन में सफलता और प्रसन्नता के सन्दर्भ में दांये हाथ से लिखने और बांये हाथ से लिखने वालों के बीच कोई सार्थक अंतर नहीं होता है | इस अध्याय में बांये हाथ से लिखने वाले प्रसिद्ध व्यक्तियों जैसे अल्बर्ट आईन्स्टीन, फ्रेंक्लिन,चार्ली चैपलिन ,सचिन तेंदुलकर,करन जौहर,अमिताभ बच्चन और अभिषेक बच्चन आदि के उदाहरण दिए गए हैं |
   पुस्तक के अंतिम अध्याय ‘शिक्षण में हास –परिहास’ में शिक्षण में हास परिहास के महत्व पर प्रकाश डाला गया है | साथ ही हास –परिहास का  वातावरण बनाने में कुछ ध्यान रखने वाली बातों जैसे बच्चों का मजाक न उड़ाना,जाति धर्म आदि के आधार पर उन पर कटाक्ष न करना आदि को बताया गया है | हास –परिहास के सम्बन्ध में कुछ भ्रांत धारणाओं की ओर भी पाठको का ध्यान खींचा गया है |हास –परिहास को समय के सम्यक निवेश की संज्ञा दी गयी है |
  पुस्तक सरल भाषा में लिखी गयी है | इसमें शिक्षण से जुड़े पक्षों को  वैज्ञानिक और मनोविज्ञान पर आधारित तथ्यों के साथ पुष्ट किया गया है | पुस्तक शिक्षकों ,शिक्षक –प्रशिक्षकों और अनुसंधाताओ के लिए उपयोगी है | इसमें तथ्यों को बिन्दुवत दिया गया है |  शैक्षिक अनुभवों के साथ जोडकर इन बिन्दुओं को विस्तारित रूप दिए जाने की आवश्यकता प्रतीत होती है | पुस्तक का आवरण पृष्ठ पुस्तक की विषयवस्तु के अनुरूप है जो पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचने में सफल है | पुस्तक शीर्षक ‘सहज –सरल –सुगम शिक्षण’ के अनुरूप प्राथमिक शिक्षकों के शिक्षण को सहज सरल सुगम बनाने में सफल होगी | शिक्षक , प्रशिक्षक और अनुसंधाताओं के लिए यह एक दिग्दर्शिका के रूप में उपयोगी सिद्ध हो सकती है | पुस्तक उत्तराखण्ड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसन्धान केंद्र विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग उत्तराखण्ड शासन द्वारा प्रकाशित की गई है जिसका कोई मूल्य निर्धारित नहीं है |

प्रकाशन वर्ष -२०१६, प्रथम संस्करण | 
समीक्षक -डॉ उमेश चमोला 

गुरुवार, 24 अगस्त 2017

drishti: गीत समीक्षा (गढ़वाली) 6            बेरोजगारि कु ब्य...

drishti: गीत समीक्षा (गढ़वाली) 6            बेरोजगारि कु ब्य...: गीत समीक्षा (गढ़वाली) 6             बेरोजगारि कु ब्यौ     मेरि किताबी ‘पथ्यला’ मा अयां ये गीत की  समीक्षा वरिष्ठ साहित्यकार (समीक्षक) श...
गीत समीक्षा (गढ़वाली) 6
            बेरोजगारि कु ब्यौ 
   मेरि किताबी ‘पथ्यला’ मा अयां ये गीत की  समीक्षा वरिष्ठ साहित्यकार (समीक्षक) श्री ईश्वर प्रसाद उनियाल जी द्वारा ‘रंत रैबार’ मा करे गै छै | समीक्षा का वास्ता तौंकू भौत-भौत आभार | ईं पोस्ट से पैलि  ‘ऐ जा मेरा गौं मा’  ‘पथ्यला बौण का’  ‘त्वैतें बुलोणा’ ‘रैबार’ अर ‘उत्तराखण्ड बणी ग्याई’ कि समीक्षा का बाद  गीत दगिडी ईं पोस्ट मा श्री उनियाल जी द्वारा करीं छटू  गीत ‘ बेरोजगारि कु ब्यौ ’    कि समीक्षा पेश छ |
  
             बेरोचगारि कु  ब्यौ

बेरोचगारि  मा ब्यौ करी, भौत पछ्तायूँ,
अपड़ी खैरी लाणों कु, मीं तुम मू आयूँ |

खर्च नीं छ,पर्च नीं छ, जेब हुईं  खाली,
दक्षिणा किलै नि देंद, ब्वनी छन स्याली,
जोग बिगड़ी,जाणि बुझीक यीं आफत ल्य़ायूँ,
बेरोचगारि  मा ब्यौ करी, भौत  पछ्तायूं |

हर दिन की नई –नई वींतें चेंदि  साड़ी,
कखै ल्येण क्रीम पौडर, कनकै चललि गाडी?
ब्वे बाबून ब्यौ कराई ,ऊँकि छ्वीं मा आयूँ ,
बेरोचगारि  मा ब्यौ करी, भौत  पछ्तायूं |

अंगरालो कि भ्योल पर, कन ढूगु मारी ,
सोचि छौ सुख मिललू, आई असंद भारी,
ये मकड़जाल मा, कन  फंस  ग्यांयू,
बेरोचगारि  मा ब्यौ करी, भौत  पछ्तायूं |

बेरोचगारि मा ब्यौ न कर्या, गेडी बांधा बात,
ब्वे, बाबू, भै बिरणा होंदा, कजाणि मरदि लात,
तुम न जयां तै बटा बी, जै बाटा मीं जायूं,
बेरोचगारि  मा ब्यौ करी, भौत  पछ्तायूं |
 -----रचना – डॉ० उमेश चमोला



समीक्षा
                   क्य सोची करि ब्यौ  
------ आई ० पी ० उनियाल
   अपण मुल्को रिवाज छ कि नौनु जरा सयाणु ह्वे ग्ये त वेको ब्यौ कर दिए जान्द | घर वलोंन यु नि स्वचणु कि छोटा अपणि ब्वारी तैं खलै-पिलै बि सकद कि न | कखि यु तनि ह्वे जाव कि हमतें हि ब्वारि पलण पड़ो | एक दिन मैं अपणि तिबारि मा बैठयूँ छौ |  रूडयूँक को दिन छौ | हम द्वी चार लोग समणि बटी भ्यूला डालों से छनैक औणी ठण्डी हवा को आनंद उठौणा छा कि यितगा मा एक बुजुर्ग हमारि पैड्यों चढ़ी तिबारि मा ऐकि धम्म खटला बैठि ग्ये | हम हकदक रै गयां | यु सोची कि हम ये मनखि तैं जणदा छां न पछणदा छां अर बिना जच्यां पुछ्यां धम्म खटला मा बेठण वलो यो को छ | मैन पूछि,’’भैजी! को छां तुम ? कै गौं का छां ? यीं घामे दोपरि  मा कख पैटयां छन  ? तुमरू त बुरु हाल छ |’’ वु मनखि पैलि त जरा चुप रै | तब बोन बैठि, ‘’चुचों ! दूर बटी आयूं छौं | पैलि जरा थौ बिसौण द्या धों | जरा हवा मा पसिन्य सुखि जालो त गिचा बटि तब त कुछ बोलुलु | यितगा मा केरि काकी भितर बटि ठण्डो पाणयो गिलास लेकि ऐग्ये अर बोन बैठि .’’पैलि पाणी पी ल्या तब बोलि दयया धों | सि काकी मू बोन बैठिंन,’’यो नोनो कि छुयूं मा नि अयां | यित अबि झुल्लों मा ख्यलणा छन |’’ हमरो ध्यान फिर अपणि छुयूं मा लग ग्ये | किलैकि काकी अर वुँ बुजुर्ग सि लगदा मनखि आप सभा छ्वीं लगौण बैठ ग्ये छा | वुंकि छुयूं कु मतलब कुछ यिनु लगणू छौ कि जन ब्वलेंद वु आदिम अपणा नौना वास्ता ब्वारी ख्व्जनों भटकणू छौ |
      छुयूं मा वून बतै  कि वूंको नौनु देहरादूण नौकरि कनू छ | वेतैं अच्छी ख़ासी तनखा बि मिलनी छ | वुंकि मंशा छ कि वेको ब्यौ कर दिए जाव | व यी लगन मा घामे दोफरा मा गौ- गौ रिटण पर लग्युं छ | मैंन पूछि वूँतैं कि नौनु कथगा सालो छ ? अर कथगा  पढयूं छ | जवाब मिले वुंको नौनु मैट्रिक पास छ अर बीस सालो ज्वान छ | जब वूँसे वेका जॉब का बारा मा पूछे ग्ये त पता चलि कि कै होटल मा वेटर कि नौकरि कनू छ | मैन पूछि कि तुमुन अपण नौना तैं बि पूछि ब्यौ का बारा मा त बोन बैठि कि ब्यटा! हम वेका ब्वे बाब छां | वेको भलो –बुरो कै बात मा छ हम जांणदा छां | ये वास्ता वे तै क्या पूछण? यकुलो नौनु छ | घर कि सब संपत्ति वेकि ही छ | ये वास्ता वेतैं पूछने क्या जर्वत छ | बस ढंगे नौनि मिल जाव त हम अपण छोरो कालु मुंड कर दयां | बुडयजी को तर्क सुणी भौत ताज्जुब ह्वे यो सोची कि छोटो बुबा वेको ब्यौ करी तैं वेका वास्ता एक यिनी मुसीबत का हालत त्यार कन पर लग्यों छ | मैं तैं ताज्जुब ह्वे कि यो बुजुर्ग क्या सोची ब्यौ कनू होलो | जबकि नौने तनखा जादा सि जादा ढाई तीन हजार होली यिथगा क्या अफु खालु ? क्या ब्वारी तैं खलालो? यांका अलावा क्वार्टर को किराया अपणु खर्च मिलैक वैतें यितगा तनखा नि मिल्दी होलि आखिर क्या करलो यु बिचारु ?
    ठीक यीं सोच पर आधारित छ प्रस्तुत गीत ,पथ्यला नों कि कविता संकलन मा छपी डॉ ० उमेश चमोला कि रचना | शीर्षक छ ‘बेरोजगारि कु ब्यौ’ | ये गीत मा डॉ० चमोलान वु सबि मुश्किल बयान करीं छन जु कि एक अल्प वेतनभोगी शादीशुदा मनखि का समणि औंदन | खाण पेण से ल्हेकि मकान को किराया का अलावा नयु नयु ब्यौ अर वुंकि कच्चि उमर कि ब्वारी, बिचारो जनानी फरमैश हि पूरि नि कर सकणू छ | वु अपण ब्वे बाबु तैं कोसण पर लग्युं छ कि बिना देखभाल अर सोच विचार का वूंन ब्यौ त कर दये पर निभोंण वैतें पड़नू छ | आखिर कथगा दिन तक चललि गिरस्ती ?

         (रंत रैबार २८ मई २०१२ बटी)