शुक्रवार, 21 जून 2019

शोध पत्र


 डॉ0 उमेश चमोला के साहित्य में नारी पात्रों का चरित्र चित्रण
          ( Women  characters in literature of Dr. Umesh Chamola ) 
-    डॉ. अनुराधा शर्मा  
              डॉ0 उमेश चमोला द्वारा रचित साहित्य को अध्ययन की दृष्टि से तीन भागों में बांटा जा सकता है- बाल साहित्य, लोक साहित्य विषयक और गढ़वाली लोकभाषा में  रचित साहित्य ।  डॉ0 चमोला की राष्ट्रदीप्ति (राष्ट्रभक्तिपूर्ण गीत एव कविता संग्रह), आस-पास विज्ञान (विज्ञान आधारित कविता,कहानी एवं पहेलियों का संग्रह), पर्यावरणीय शिक्षा पाठ्य सहगामी क्रियाकलाप (पर्यावरण पर आधारित नाटक,कविता,गीत एवं नारों का संग्रह ),फूल (बाल कविता संग्रह), धुरलोक से वापसी (विज्ञान कथा संग्रह) आदि पुस्तकों को बालसाहित्यपरक पुस्तकों के रूप में श्रेणीबद्व किया जा सकता है। डॉ0 उमेश चमोला द्वारा संग्रहीत   उत्तराखण्ड की लोक कथाएंॅ‘ (काथ काणी,रात ब्याणी) खण्ड एक और दो तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपे उनके लोक साहित्य पर आधारित आलेखों को लोक साहित्य विषयक रचनाओं के अंतर्गत सम्मिलित किया जा सकता है । डॉ0 उमेश चमोला ने गढ़वाली भाषा में उमाळ (खंडकाव्य) , पथ्यला (गढ़वाली गीत-कविता संग्रह), पड़्वा बल्द (गढ़वाली व्यंग्य कविता संग्रह) , नानतिनो कि सजोळि  (गढ़वाली एवं कुमांउनी बाल कविता संग्रह), निरबिजु (उपन्यास) , कचाकि (उपन्यास), बणद्यो कि चिटिठ (पर्यावरण अर शिक्षा कि दस बाल नाटिका ) आदि कृतियों का प्रणयन किया है।
     उपरोक्त सभी पुस्तकों का अध्ययन और विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि उमाळ (खंडकाव्य) ,पथ्यला (गढ़वाली गीत-कविता संग्रह),पड़्वा बल्द (गढ़वाली ब्यंग्य कविता संग्रह) , निरबिजु (उपन्यास) , कचाकि (उपन्यास), बणद्यो कि चिटिठ (पर्यावरण अर शिक्षा कि दस बाल नाटिका) में नारी पात्रों का वर्णन आया है । पथ्यला‘ (गढ़वाली गीत-कविता संग्रह) में कुछ गीत श्रृंगार रस प्रधान हैं । इन गीतों में संयोग और वियोग श्रृंगार की छटा देखने को मिलती है किन्तु नारी पात्रों के चरित्र चित्रण हेतु शोध के लिए इस पुस्तक का चयन प्रासंगिक नहीं होगा। इसी प्रकार बणद्यो कि चिट्ठिमें भी नारी पात्रों का चित्रण समग्र रूप से नहीं आया है । अतः प्रस्तुत शोध हेतु इस पुस्तक का चयन करना भी उचित नहीं है। अब आते हैं डॉ0 उमेश चमोला की वर्ष 2006 में प्रकाशित पुस्तक उमाळ (खंडकाव्य)  पर । यह खंडकाव्य कारगिल यु़द्ध में सीमा पर तैनात जवान अमर सिंह और उसकी प्रेयसी पत्नी सुशीला की विरह वेदना और देशभक्ति की भावना पर आधारित कृति है । इसमें नारी पात्र के रूप में सुशीला नायिका के रूप में वर्णित है किन्तु कवि खंडकाव्य का प्रारंभ सुशीला की मॉ के परिचय से करता है जो डांडी-कांठ्यों के बीच बसे गांव के प्रधान की पत्नी है। नायिका की मां के सौन्दर्य को चित्रित करते हुए कवि ने उसके मुखडे़ की ज्वोन (चांद) तथा उसके कोमल हृदय की उपमा नौण (मक्खन) से की है । उसके प्रेमपूर्ण नारी व्यक्तित्व को माया की छलार (प्रेम की धारा) कहकर समादृत किया है। सुशीला (कन्या ) के जन्म का समाचार प्राप्त होने पर सभी परिवारी जनो का मुंह पीतवर्णी प्यूंली के फूल के समान खिले हुए थे । ऐसा लग रहा था कि उनके घर खुशियों के सूर्य (घाम) ने प्रवेश कर लिया हो। कन्या के जन्म पर सुशीला के घर-परिवार वालों के हृदय की यह प्रसन्नतापूर्ण अभिव्यक्ति उन लोगों पर करारी चोट है जो कन्या भ्रूणहत्या जैसा पैशाचिक कृत्य करने से बाज नहीं आते। घर में कन्या के महत्व पर प्रकाश डालने के साथ -साथ कवि उन लोगों को भी चेताता है जो परिवार में पुत्र और पुत्री में भेदभाव करते हैं-
 दुई घरों तैं एक घौर बणोन्द,
 अपडि़ महक द्वी घौरु फैलोन्द,
भलि बेटुलि यन स्वाणि फूल छ,
नौना नौनि मां भ्येद बडि़ भूल छ,‘
     खंडकाव्य की नायिका सुशीला इस खंडकाव्य में कला-संगीत के प्रति अनुरागी,पतिव्रता, और देशभक्ति से परिपूर्ण आदर्श नारी के रूप में सामने आई है । वह सीमा पर देश की रक्षा को तैनात अपने पति की विरहाकुल नारी के रूप में चित्रित है। जब वह अपने मामा के ब्याह के अवसर पर नायक को महफिल में गीत गाते हुए देखती है तो कला (गीत)  के प्रति उसका अनुराग नायक के प्रति उसके मन में प्रेम के बीज बो देता है । उसके मन में नायक के प्रति उपजी प्रेम की भावना को कवि इन पंक्तियों में वर्णित करता है-
 भिजिगे जिकुडि़ ह्वेगि तर तर,
 गरम्यूं मां बथों जन सर सर ।
   सुशीला पारिवारिक और सांस्कृतिक संस्कारों से बंधी हुई है । इसलिए  सोचती है कि वह अपने हृदय की मयाळी छ्वीं (प्रेम की बात) कैसे किसी को बता सकती है ? इसलिए होंठों को सिले रखने में ही समझदारी है । उसे पता है कि परंपरा के अनुसार उसका विवाह वहीं होगा जहाँ उसके माता-पिता चाहेंगे । वह ईश्वर के प्रति आस्थावान है । वह ईश्वर से मन ही मन प्रार्थना करती है कि वह उसके हृदय की बात उसके और नायक तथा नायक के माता-पिता के पास  पहुचाए ।  होता भी ऐसा ही है । उसके माता-पिता के पास उसी युवक (नायक अमरसिंह) की जन्म पत्रिका सुशीला के साथ ब्याह के लिए आती है। पत्रिका के साथ एक पत्र भी उन्हें प्राप्त होता है जिसमें लिखा होता है कि वह वही अमरसिंह है जिसका विवाहोत्सव के अवसर पर सुशीला से परिचय हुआ था। पत्र में यह भी लिखा था-
 ‘‘ फौजी से तुमुन बेटी बिवोण,
  खैरि ही खैरि मिललि समौण ।‘‘
अर्थात् अगर तुमने एक फौजी के साथ अपनी बेटी का ब्याह करना है तो तुम्हें उपहार के रूप में विपत्ति ही प्राप्त होगी ।
   इस पत्र को पढ़कर सुशीला के माता-पिता चिन्ता में पड़ जाते हैं। वे सोचते हैं कि  कहीं वे फौजी से अपनी बेटी का विवाह कर उसका जीवन पथ कांटों भरा तो नहीं बनाने जा रहे ? अपने माता-पिता की इस भावना से अवगत होने पर सुशीला उन्हें समझाती है कि फौजी तो देश के भाल को झुकने नहीं देते हैं। हमें उनका सम्मान करना चाहिए । मनुष्य जन्म लेकर
यदि हमारे हृदय में देश प्रेम की भावना नहीं है तो हम भाग्यहीन हैं। यदि फौजी की जीवन संगिनी बनकर उसे भी पुण्य कमाने का अवसर प्राप्त होता है तो वह फौजी के साथ ब्याह करने के लिए तैयार है। सुशीला के हृदय के यह उद्गार  देश के प्रति उसके अगाध प्रेम की भावना को व्यक्त करते हैं।
    देश प्रेमी होने के साथ -साथ उमाळ खंडकाव्य में सुशीला पतिव्रता नारी के रूप में भी सामने आई है । पति अमर सिंह को कारगिल युद्ध के लिए विदा करते समय वह कहती है कि उसका मन भी पति के साथ युद्ध में जाकर दुश्मनो से लोहा लेने का करता है । वह पति की प्रतीक्षा करेगी कि वे देश की सीमा को दुश्मनो के चंगुल से मुक्त कर उसके पास वापस लौटेंगे। अगर उसके पति युद्ध में शहीद होकर अमर हो जांए तो वह ईश्वर से प्रार्थना करेगी कि ईश्वर उसे भी पति के साथ स्वर्ग ले जाए ।
     खंडकाव्य के पांचवे सर्ग में सुशीला पति की याद में तड़पती हुई विरहिणी के रूप में चित्रित है। इस सर्ग में सुशीला की विरह दशा को महसूस कर पाठकों का हृदय करुणा से द्रवित हो जाता है । इस सर्ग का शब्द चित्रण पाठकों की आँखें भिगोने की सामर्थ्य रखता है। पहाड़ के जंगलों में बसंत के समय सुन्दर बुरांस खिले हैं। बिठे-पाखों में प्यूंली के फूल सुन्दरता बिखेर रहे हैं। ये संयोग श्रृंगार की स्थितियाँ  हैं किन्तु नायक इस नयनाभिराम दृश्य का अवलोकन करने के लिए उसके साथ नहीं है। अतः विरहिणी की आँखों में इस समय सावन की बरसात का आना स्वाभाविक है । वह सुन्दर जंगलों में घुघुती, कफ्फू  जैसी पक्षियों की मधुर घ्वनि को सुनकर रो पड़ती है । उसे सपने में बर्फीला बॉर्डर दिखाई देता है । गोलियों की आवाज सुनाई देती है । यह सुनकर उसका शरीर चचला जाता है । जब वह आसमान में बादलों से घिरी ज्वोन ( चन्द्रमा) को देखती है तो सोचती है कि इस चाँद की तरह वह भी विपत्ति रूपी बादलों की ओट में है । पता नहीं विपत्ति रूपी बादलों को हटाने वाली परिस्थिति रूपी पवन आएगी या नहीं ? वह होली के समय खयालों में अपने  पति के पास पहूँच जाती है किन्तु जब खयालों की दुनियाँ से बाहर आती है तो उसके गाल में अश्रुकण ऐसे लगते हैं जैसे पानी में भीगा हुआ कोई गुलाब हो।
  छटवें सर्ग में सुशीला की विरह दशा का वर्णन कवि इन पंक्तियों के माध्यम से करता है-
 कन होला स्वामी जी,बौडर लड़ै मां,
 सुशीला यन मन मां सोचिणी,
  आँसू कि धार बगिणी सरासर,
 सुशीला आँसू सें आँसू छै धोणी
    सुशीला ईश्वर के प्रति आस्थावान है । जब वह नायक (अमर सिंह) के प्रति आकृष्ट होती है तो सोचती है कि वह अपने हृदय की बात अपने माता-पिता को कैसे बताए ? तो वह ईश्वर से प्रार्थना करती है कि वह उसके हृदय की बात उन तक पहुंॅचा दे। उसका विश्वास फलित भी होता है । जब उसका पति कारगिल सीमा पर दुश्मन से लोहा ले रहा होता है तो वह सुबह माँ दुर्गा के मन्दिर में दीपक जलाकर अपने सुहाग की रक्षा के लिए प्रार्थना करती है । वह कहती है,‘‘ मेरे पति सभी माताओं और बहिनो के कष्टों के निवारण के लिए सीमा पार के असुरों को मारने गए हैं। इसलिए उनकी खातिर भी वह मेरे पति की रक्षा करे।‘‘
   जब उसे समाचार मिलता है कि उसके पति का कारगिल लड़ाई में कोई पता नहीं चल पाया है तो उसे लगता है जैसे उसके पैरों के नीचे की धरती खिसक रही हो। उसे डांडी-कांठियां (ऊंची नीची पर्वत श्रेणियां) घूमती हुई नजर आती है । कटे हुए पेड़ की तरह वह जमीन में गिर जाती है। उसकी आँखें बन्द हो जाती हैं। वह स्वप्नलोक में पहुंॅच जाती है । वहाँ वह माता भवानी से पूछती है कि माता ने उसके पति की रक्षा क्यों नहीं की ? माता भवानी उसके पति के कुशल होने की बात उसे बताती है । तभी उसकी आँखें खुल जाती हैं।
 इस प्रकार सुशीला को ईश्वर के प्रति पूर्ण आस्था है । उसका सोचना है -
 ‘‘धैरीक ध्यान ऐंच वळा से
 जू कुछ मांगा स्वो मिलि जांद,
 सब कुछ वेका नौं छोडि़ जावा,
 सुपिन्यों कु फूल तब खिलि जांद ।
 सुशीला अपनी बांई आँख फड़कने को ईश्वर के संकेत के रूप में मानती है कि उससे पति के मिलन की घड़ी बस आने वाली है ।
 इस प्रकार उमाळ खंडकाव्य में कवि ने जहाँ एक फौजी के देश के प्रति समर्पण भाव को दिखाया है वहीं उसकी पत्नी के त्याग की भावना का भी विशद वर्णन किया है ।
    उमाळ खंडकाव्य के बाद साहित्य में नारी पात्रों के चित्रण का अनुशीलन करते हैं अब उनके उपन्यास कचाकिमें । इस उपन्यास में दीपा, दीपा की माँ सुरिणी, दीपा की दादी और दीपा की सौतेली माँ मांसंती नारी पात्र हैं। दीपा के बालपन में ही जंगल में घास काटते समय उसकी माँ की मौत पहाड़ी से गिरकर हो जाती है । सुरिणी की मौत के बाद दीपा की दादी अपने बेटे और सुरिणी के पति हयात सिंह को पुनर्विवाह के लिए राजी  करती है । हयात सिंह की मासंती के साथ शादी हो जाती है । मांसंती दीपा को कभी भान होने नहीं देती कि वह उसकी सौतेली माँ है। मासंती की सगी लड़की सुरेखा और दीपा दोनो स्कूल पढ़ने जाती हैं । दीपा सुरेखा की तुलना में पढ़ाई -लिखाई में होशियार होती है । इससे मासंती के मन में दीपा के प्रति ईर्ष्या का भाव पैदा हो जाता है। वह दीपा का रिश्ता फटाफट करवाना चाहती है जिससे उसकी सगी बेटी का विवाह समय पर हो सके । वह दीपा की नकली जन्म कुण्डली बनाकर उसकी शादी प्रभात नामक युवक से करवा देती है। शादी के बाद दीपा के भोलेपन का लाभ उठाकर वह दीपा और प्रभात के बीच दरार पैदा करने के लिए तंत्र-मंत्र का सहारा लेती है । इसमें भी सफल न होने पर वह साजिश रचकर दीपा के पति के खाने में जहर मिलाकर उसे मरवाना चाहती है किन्तु वह बच जाता है । अंत में जब मासंती के कुकर्म उसकी सगी बेटी सुरेखा के ब्याह में बाधा बनकर खड़े हो जाते हैं तो वह पगला जाती है और अपना अपराध प्रकट कर देती है ।
   इस उपन्यास में मासंती खलनायिका के रूप में वर्णित है । वह ईर्ष्यालु और अनैतिक कार्यों में लिप्त है । अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए वह जीवानन्द ब्राह्मण से दीपा की नकली जन्मकुण्डली बनाती है । वह तंत्र-मंत्र का सहारा लेती है । दीपा को उसके ससुराल वालों के विरुद्ध समय-समय पर भड़काती रहती है ताकि उसका गृहस्थ जीवन बरबाद हो जाए। वह अपने खेत का विस्तार करने के लिए  वोडा (सीमा मापक पत्थर) को आगे खिसकाती है । वह बाजारवादी मानसिकता से ग्रस्त नारी है जो रिश्तों का व्यापारीकरण करती है । पंचायत में अपनी सौतेली बेटी के लिए भरण पोषण के रूप में चार हजार रूपए प्रति माह जारी करवाती है । दीपा के ससुराल वालों पर दहेज का झूठा मुकदमा दायर कर उनसे लाखों रुपए ऐंठती है। इस उपन्यास की दूसरी महत्वपूर्ण नारी पात्र दीपा है । वह भोली भाली है। घरेलू कामों में यहाँ तक पेड़ों पर चढ़ने के काम में भी निपुण है। बचपन में उसकी  माँ सुरिणी की मौत के बाद मासंती ने ही उसे माँ का प्यार दिया था। इसलिए वह अनुचित लगने पर भी मासंती के दुष्कर्मों का विरोध नहीं कर पाती। उसकी बु़द्धि पर भावना अधिकार जमाती है । अनचाहे ही सही वह मासंती के दुष्कर्मों में सहयोग देती है। वह अपने पति से प्रेम तो करती है किन्तु भोलेपन से मासंती के बताए रास्ते पर चलकर अपने दांपत्य जीवन को बरबाद कर देती है।
   इस प्रकार कचाकिउपन्यास में उपन्यासकार ने नारी के विशिष्ट रूपों का चित्रण किया है । कचाकि  उपन्यास की भांति डॉ0 चमोला के दूसरे उपन्यास निरबिजुमें भी नारी चरित्रों को केन्द्रीय स्थान दिया गया है । इस उपन्यास में रूपिणी, कुसुम और मोहिनी नारी पात्र आए हैं। महेन्द्र प्रताप शेरगढ़ का राजा अपने पड़ोसी गढ़ सौरगढ़ पर आक्रमण करता है तो वहाँ की राजकुमारी रूपिणी के प्रेम के संदेश से उसका हृदय परिवर्तित हो जाता है। उन दोनो को एक दूसरे से प्रेम हो जाता है। दोनो विवाह के सूत्र में बंध जाते हैं। बसंतोत्सव के समय राजा महेन्द्र प्रताप नर्तकी मोहिनी के रूप सौन्दर्य पर निछावर हो जाता है। वह उसे राजनर्तकी का दर्जा देता है। एक दिन वह उससे ब्याह कर उसे रानी बना देता है। मोहिनी राजा से कहकर  अपने भाई दीवानू को सेनापति बनवा देती है और राज्यद्रोह का आरोप लगाकर पूर्व सेनापति खडगसिंह और रानी रूपिणी को वनवास भिजवा देती है। एक दिन मोहिनी के कहने में आकर राजा महेन्द्रप्रताप अपने मृत्यु की झूठी खबर जंगल में रह रही रानी रूपिणी और खडगसिंह के पास एक दूत के माध्यम से भिजवा देता है। इस खबर को सुनकर प्रतिव्रता रूपिणी प्राण त्याग देती है। इस उपन्यास में रूपिणी साहसी,पतिव्रता,प्रेमी हृदय की स्वामिनी के रूप में वर्णित है। उसे स्वप्न के माध्यम से आने वाली घटना का पूर्वाभास हो जाता है । वह महेन्द्रप्रताप के नर्तकी मोहिनी से विवाह करने के निर्णय का  भी विरोध नहीं करती है। वह राजकाज चलाने में निपुण और दैवीय गुणों से युक्त है। पति की मृत्यु के झूठे समाचार को सुनते ही उसका प्राण त्याग देना उसके पतिव्रता धर्म की गहराई को व्यक्त करता है।
    जब रूपिणी के हृदय में राजा महेन्द्रप्रताप के लिए प्रेम का निर्झर फूटता है तो वह अपनी सहेली कुसुम से कहती है,‘‘ आज मुझे प्यूली के फूल इतने सुन्दर क्यों दिखाई दे रहे हैं ? घुघुती पक्षी कल भी मीठी वाणी में बासती थी पर आज उसकी वाणी में कुछ अधिक ही मिठास का मुझे अनुभव हो रहा है ।‘‘ रूपिणी के कुसुम के साथ ये संवाद उसके प्रकृति प्रेम और नायक के प्रति गहरे प्रेम को व्यक्त करते हैं। कुसुम उसकी सच्ची सहेली है । कुसुम को किसी पुरुष  ने प्रेम पाश में बांधकर छोड़ दिया था । अतः उसका मन शंकाग्रस्त है कि कहीं उसकी सहेली रूपिणी के साथ भी धोखा न हो ।
  जहाँ उपन्यास में रूपिणी सात्विक गुणों से युक्त एक सुन्दर नारी है वहीं  मोहिनी अपार सौन्दर्य की स्वामिनी है । उसका मुखड़ा चाँद जैसा है । उसकी हिरनी जैसी चंचल आँखें हैं । घुटनो तक फैली उसकी केशराशि सावन के महीने में आसमान में घिरी बादलों की छटा जैसी मनोहर है । वह जितनी सुन्दर है उससे अधिक स्वार्थसिद्धि के लिए सब कुछ करने को तत्पर एक षडयंत्रकारी स्त्री है । अपनी महत्वाकांक्षा के कारण वह अपने पति के विरुद्ध भी मौत की साजिश रचती है । उसके कुकर्मों से सारा राज्य छिन्न-भिन्न हो जाता है।
   इस प्रकार समग्र रूप से अनुशीलन करने पर स्पष्ट होता है कि जहाँ डॉ0 चमोला के खंडकाव्य उमाळमें नारी का उदात्त चरित्र अभिव्यक्त हुआ है वहीं उनके उपन्यास कचाकिऔर निरबिजुमें नारी चरित्र दोनो रूपों में ही सामने आए हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि डॉ0 उमेश चमोला के खंडकाव्य और दोनो उपन्यासों में नारी चरित्र केन्द्रीय भूमिकाओं में हैं । इनका कथानक नारी पात्रों के ही इर्द गिर्द घूमता है ।
संदर्भ संकेत-
 1-मधुकांत, राजेश, संपादक उत्तराखण्ड स्वर,‘मई 2013। उत्तराखंड को माटु बल निरबिज्या
   ह्वेगि,समीक्षा आलेख डॉ0 नागेन्द्र जगूड़ी नीलांबरम। उन्नति बिहार चौक, 
   नत्थनपुर,हरिद्वार,रोड देहरादून।
2-मोहन हरि संपादक नवल‘, फरवरी-मार्च 2013। उत्तराखण्ड प्रैस, रानीखेत रोड,
  रामनगर,नैनीताल, उत्तराखण्ड।
3-नेगी,विमल,संपादक खबर सार,‘ पुरानी ट्रेजरी पौड़ी गढ़वाल, 15 फरवरी से 18 फरवरी
  2013
4- चमोला, डॉ0 उमेश, ‘उमाळः खंडकाव्य,2006, बिनसर प्रकाशन, 8 प्रथम तल,डिसपेन्सरी 
   रोड,    देहरादून,  उत्तराखण्ड।
5- चमोला, डॉ0 उमेश, ‘निरबिजू उपन्यास ,2013, बिनसर प्रकाशन, 8 प्रथम तल,डिसपेन्सरी 
   रोड,    देहरादून, उत्तराखण्ड।
6- चमोला, डॉ0 उमेश, ‘कचाकिउपन्यास ,2014, अविचल प्रकाशन, हाइडिल
   कॉलोनी, बिजनौर, उत्तर प्रदेश । 
  

---- डॉ0 अनुराधा शर्मा, ‘शशि निकुंज‘ 3, निकट गुरुद्वारा रोड, मोहाली, पंजाब। मो0. 9875607651,

साभार – साहित्य प्रभा , सम्पादक – डॉ. चन्द्र सिंह तोमर ‘मयंक’ आमवाला अपर, डाकघर  तपोवन नालापानी देहरादून , उत्तराखंड २४८००८८

शनिवार, 15 जून 2019




पुस्तक समीक्षा
शिक्षा में पर्यावरण की समग्र रूप से पड़ताल करने में सफल है ‘पर्यावरण शिक्षण भारत में रुझान एवं प्रयोग ‘
लेखक – चोंग शिमरे,
समीक्षक – डॉ. उमेश चमोला
पर्यावरण शिक्षा से जुड़े शिक्षक, शिक्षक – प्रशिक्षक और अन्य हितधारक प्राय: पर्यावरण, पर्यावरण शिक्षा, पर्यावरण विज्ञान, पर्यावरण अध्ययन आदि शब्दों का प्रयोग करते हुए देखे जाते हैं | कई बार वे इनका प्रयोग एक दूसरे के समानार्थी या पर्यायवाची शब्दों के रूप में करते हैं जबकि इनमे से प्रत्येक शब्द अवधारणात्मक दृष्टि से अलग है | इसी तरह पर्यावरण शिक्षा को पृथक विषय और समावेशित रूप में क्रियान्वित किए जाने के बारे में भी विचारों में अस्पष्टता दिखाई देती है | शिक्षा में पर्यावरण शिक्षा के कुछ इन्हीं विविध पक्षों की पड़ताल करती है पुस्तक ‘पर्यावरण शिक्षण भारत में रुझान एवं प्रयोग ‘ | इस पुस्तक को लिखा है चोंग शिमरे ने जो राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद नई दिल्ली में विज्ञान और गणित शिक्षा विभाग में एसोसिऐट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं और विगत कई वर्षों से भारत में पर्यावरण शिक्षा कार्यान्वयन में निरंतर योगदान देती आ रही हैं |
पुस्तक में पर्यावरण से संदर्भित विषयवस्तु को दस अध्यायों में समाहित किया गया है | प्रथम अध्याय में पर्यावरण शिक्षा के परिचय के साथ वैश्विक स्तर पर पर्यावरण शिक्षा के उद्भव पर प्रकाश डाला गया है | इसी अध्याय में प्रमुख राष्ट्रीय , अंतराष्ट्रीय दस्तावेजों और विभिन्न शिक्षाविदों द्वारा उल्लिखित पर्यावरण शिक्षा की परिभाषाओं को बाक्स के अन्दर दिया गया है | पर्यावरण शिक्षा के मार्गदर्शक सिद्धान्तों को भी स्थान दिया गया है | पर्यावरण शिक्षा के महत्वपूर्ण घट्नाक्रमों के कालक्रम के अंतर्गत दी गई जानकारियों से पर्यावरण शिक्षा में समय के साथ –साथ आये बदलावों की एक झलक देखने को मिलती है | पर्यावरण शिक्षा को समझने और अन्य विषयों से इसके सम्बन्ध को जानने के लिए पर्यावरण शिक्षा और अन्य विषयों की प्रकृति को समझना अत्यंत आवश्यक है | इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए दूसरे अध्याय में विभिन्न विषयों और पर्यावरण शिक्षा की प्रकृति को स्पष्ट करने के साथ विभिन्न विषयों में पर्यावरण शिक्षा के प्रयोग को विश्लेषित करने का प्रयास किया गया है | कुछ विचारक मानते हैं कि विज्ञान की शिक्षा पर्यावरण शिक्षा को लागू करने के लिए एक अनुकूल मंच प्रदान करती है | यह सही भी है क्योंकि पर्यावरण के सभी मुद्दे वैज्ञानिक अवधारणाओं से जुड़े हुऐ हैं किन्तु अन्य विचारकों का सोचना है कि पर्यावरण के मुद्दों के सामाजिक, राजनीतिक, भौगोलिक, आर्थिक और ऐतिहासिक आयाम पर्यावरण शिक्षा और विज्ञान के सम्मिलिन से पढ़ाये जाने खतरे से खाली नहीं हैं | दूसरे अध्याय में ‘विज्ञान के साथ पर्यावरण अध्यापन का सम्मिलिन , संभावनाएँ और सीमाएँ’ में इन्ही दो दृष्टिकोणों में विभेद और पूरकता की पड़ताल की गई है | इसी अध्याय में पर्यावरण शिक्षा, पर्यावरण विज्ञान और पर्यावरण अध्ययन का विश्लेषण किया गया है और 14 बिन्दुओं के आधार पर इनके बीच सम्बंधों और विभेदों को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है | अध्याय 3 ‘विद्यालयीन पाठ्यक्रम में पर्यावरण शिक्षण एवं स्थिति’ में पर्यावरण शिक्षा के प्रमुख उद्देश्यों के अंतर्गत जागरूकता (पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता ) , ज्ञान (पर्यावरण और इससे सम्बंधित समस्याओं की बुनियादी समझ ), मनोवृत्ति ( पर्यावरण के लिए मूल्यों और चिंता सम्बन्धी अनुभूतियाँ , सक्रिय रूप से पर्यावरण के सुधार और सुरक्षा में भाग लेने की प्रेरणा ), कौशल ( पर्यावरण सम्बन्धी समस्याओं की पहचान एवं उनका समाधान करना ) और भागीदारी ( पर्यावरण सम्बन्धी समस्याओं के समाधान के लिए सक्रिय रूप में प्रतिभागिता ) को वर्णित किया गया है | एक सार्थक पर्यावरण शिक्षा के लिए इन सभी उद्देश्यों की आवश्यकता को स्पष्ट करने के साथ ही यह भी बताया गया है कि बच्चों के बौद्धिक और नैतिक विकास में भिन्नता को देखते हुए कक्षावार इन उद्देश्यों में से कुछ उद्देश्यों को दूसरों की तुलना में अधिक बल दिया जाना चाहिए | पर्यावरण शिक्षा पर्यावरण के द्वारा, पर्यावरण के बारे में और पर्यावरण के लिए शिक्षा है | अध्याय में चिंता व्यक्त की गई है कि प्राय: पर्यावरण शिक्षा पर्यावरण के द्वारा और पर्यावरण के बारे में ही केन्द्रित रखी जाती है | इसमें पर्यावरण के लिए अर्थात् पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी क्रियाओं की उपेक्षा की जाती रही है | कुछ शिक्षाविद पर्यावरण शिक्षा को अलग विषय के रूप में पढ़ाने की वकालत करते हैं जबकि अन्य शिक्षाविद विभिन्न विषयों में पर्यावरण शिक्षा के समावेशन की बात करते हैं | इस अध्याय में इन दोनों प्रकार के दृष्टिकोणों को विस्तार से समझाया गया है | साथ ही विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, गणित और भाषा के शिक्षण में पर्यावरण शिक्षा के अनुप्रयोग के उदाहरण दिए गए हैं | विभिन्न राष्ट्रीय दस्तावेजों, आयोगों और शिक्षा नीतियों में पर्यावरण शिक्षा की उपयोगिता पर बल दिया गया है | अध्याय 4 में इस पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है जबकि अध्याय 5 में पर्यावरण शिक्षा के क्रियान्वयन से सम्बंधित वैश्विक रुझानो और इनके परिप्रेक्ष्य में भारत में किये जा रहे प्रयासों को साझा किया गया है | पर्यावरण के प्रति दायित्वपूर्ण व्यवहार के अंतर्गत अध्याय 6 में दो कारकों को विश्लेषित करने का प्रयास किया गया है – संज्ञानात्मक और व्यक्तित्व सम्बन्धी | पर्यावरण सम्बन्धी मुद्दों का ज्ञान, कार्यवाही की रणनीति का ज्ञान और कार्यवाही के कौशलों को संज्ञानात्मक कारक में सम्मिलित किया गया है जबकि व्यक्ति के दृष्टिकोण, समस्या के व्यक्ति के नियंत्रण में होना या न होना और व्यक्तिगत जिम्मेदारी को व्यक्तित्व सम्बन्धी कारक के रूप में वर्णित किया गया है | इसी अध्याय में व्यवहार परिवर्तन के लिए, पारिस्थितिक अवधारणा, अवधारणात्मक जागरूकता , समस्या की जाँच और मूल्यांकन तथा पर्यावरण सम्बन्धी समस्याओं के समाधान के कौशलों को उत्तरदाई माना गया है |
पर्यावरण शिक्षा के कुछ शोधार्थी पर्यावरण शिक्षा को जैव भौतिक के साथ – साथ सामाजिक आयामों को समाहित करने वाली शिक्षा के रूप में महत्व देते हैं जबकि अन्य विचारक पर्यावरण शिक्षा को पारिस्थितिक केन्द्रित शिक्षा के रूप में स्वीकार करते हैं | अध्याय 7 में पर्यावरण शिक्षा के इन्ही परिप्रेक्ष्यों का विश्लेषण किया गया है | अध्याय 8 पर्यावरण शिक्षा में शिक्षक सशक्तीकरण की चिंताओं को समाहित किये हुए है | इसमें पर्यावरण शिक्षा के लक्ष्यों और उद्देश्यों को प्राप्त करने के सन्दर्भ में चिंतन दिखाई देता है | इसके लिए यूनेस्को द्वारा दिए गए निर्देशों को दिया गया है | सेवा पूर्व और सेवाकालीन प्रशिक्षणों में पर्यावरण शिक्षा की स्थिति को भी स्पष्ट किया गया है | अध्याय 9 में संवहनीय विकास के लिए शिक्षा के विविध पक्षों को विश्लेषित करने का प्रयास किया गया है | संवहनीय विकास से सम्बंधित ऐतिहासिक घटनाक्रम का विवरण प्रस्तुत करते हुए पर्यावरण शिक्षा से इसके सम्बंधों पर प्रकाश डाला गया है | संवहनीय विकास के लिए शिक्षा कहीं पर्यावरण शिक्षा से विचलन प्रस्तुत तो नहीं कर रही है ? इस प्रश्न पर भी विचार किया गया है | पर्यावरण शिक्षा के धरातलीय क्रियान्वयन के सन्दर्भ में वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर कई सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहीं हैं | अध्याय 10 में इन्हीं संस्थाओं की भूमिका का वर्णन किया गया है | साथ ही भारत में पर्यावरण शिक्षा क्रियान्वयन की योजना का एक खाका खींचा गया है |
अत: यह पुस्तक पर्यावरण शिक्षा के क्षेत्र के अनुसन्धाताओं के साथ ही पर्यावरण शिक्षा से जुड़े प्रत्येक हितधारक , शिक्षकों, विद्यार्थियों और शिक्षक – प्रशिक्षकों के लिए उपयोगी है | पुस्तक में सरल भाषा का प्रयोग किया गया है | यह पर्यावरण शिक्षा से जुडी विभिन्न अवधारणाओं को स्पष्ट करती है , विभिन्न शैक्षिक दस्तावेजों में पर्यावरण शिक्षा की स्थिति के साथ ही सेवा पूर्व और सेवाकालीन प्रशिक्षणों में पर्यावरण शिक्षा क्रियान्वयन के लिए एक रूपरेखा बनाने में मददगार सिद्ध हो सकती है | पुस्तक अंग्रेजी और हिन्दी दोनों संस्करणों में उपलब्ध है |
पुस्तक ‘पर्यावरण शिक्षण भारत में रुझान एवं प्रयोग ‘
लेखक – चोंग शिमरे,
प्रकाशक- SAGE Publications Inc,2455 Teller Road Thousand Oaks,
Californiya 91320, USA.
SAGE Publications Ltd.
1 Oliver;s yard,55 City Road London ECIY ISP,
United Kingdom
SAGE Publications Asia Pacific Pte Ltd
3 Church Street , # 10-04Samsung Hub
Singapore 049483
SAGE Publications India Pvt Ltd.
B1/1-1 Mohan Cooperative Industrial Area
Mathura Road New Delhi, 110044 India
मूल्य – 375 रु
समीक्षक - डॉ उमेश चमोला

बुधवार, 12 जून 2019

drishti: कविता अमलताश रचना - डॉ उमेश चम...

drishti: कविता अमलताश रचना - डॉ उमेश चम...: पीतवर्णी अमलताश पीतवर्णी आभा विखेरता अमलताश मैं उसे निहारता एकटक जैसे उसने मेरे मन की बात पढ़ ली हो , वह बोला मेरे जीवन म...

कविता अमलताश रचना - डॉ उमेश चमोला



पीतवर्णी अमलताश
पीतवर्णी आभा विखेरता अमलताश
मैं उसे निहारता एकटक
जैसे उसने मेरे मन की बात
पढ़ ली हो ,
वह बोला
मेरे जीवन में ये बहार
रातों रात नहीं आई,
इस दिन की साल भर से
मैं कर रहा था प्रतीक्षा,
थर –थर कंपाती शीत लहरी हो,
आंधी हो या झंझावत का प्रबल आघात,
मैं सब सहता रहा चुपचाप,
मैं रहा दृढ और स्थिर चित्त,
मुझे पता था ये सब मेरे जीवन
में आने वाली बहार को छीन नहीं पायेंगे,
मैं यह भी जानता हूँ धन के वहशी
रिश्तों और भावनाओं के व्यापारियों
के मिथ्यारोपों की आंधी ने
तुझे भी किया है पर्णविहीन,
इस आंधी को सहते –सहते
तेरे जीवन के चौदह साल बीत गए,
तुझे भी है अपने स्वर्ण काल की प्रतीक्षा,
तू चिंता मत कर
तेरे जीवन का भी ख़त्म होगा वनवास,
तेरे जीवन की डाली भी होगी
मेरी तरह खुशियों के फूलों से लकदक |

---------- c डॉ० उमेश चमोला

सोमवार, 29 अप्रैल 2019

कुछ बातें, कुछ यादें ६


    बात तब की है जब हम एम० एस-सी में पढ़ते थे | एक दिन मित्रों ने कहा कि एक कविता दाढ़ी पर होनी चाहिए | इस पोस्ट के माध्यम से मैं उस कविता को साझा कर रहा हूँ | इस कविता में सहपाठी दिनेश पाण्डेय, मदन जगवान, सतीश लखेड़ा और देव कुमार के नाम आये हैं | इनमें से मदन जगवान और  सतीश लखेड़ा से फेसबुक के माध्यम से संपर्क होता रहता है किन्तु दिनेश पाण्डेय और देव कुमार से अभी संपर्क होना शेष है | प्रस्तुत है कविता
हे परम पिता, हे भगवान,
सृष्टि की रचना करते वक्त,
तू क्यों भूला ज्ञान ?
ज्ञानी तुझे ज्ञानी कहते,
पर तू है अन्यायी,
तेरे मन में कैसे आई ?
तूने दिए बालाओं को
लम्बे लहराते बाल,
लम्बे –लम्बे बालों में
गुलाब जैसे गाल,
पर बिना काँटों के नहीं
होता है गुलाब शोभित,
इसीलिये तो ईश्वर मैं
तेरी थेरी पर हूँ क्रोधित,
गुलाब जैसे गालों पर
देते कांटे रूपी दाढ़ी,
दाढ़ी वाली लडकी पर,
सोचो कैसे जमती साडी,
पर तूने सारी बात बिगाड़ी,
लड़कियों को गुलाबी गाल दिए ,
हमें मोच और दाढ़ी,
महाभारत काल में जैसे
द्रोपदी की बढ़ी थी साढी,
वैसे पाण्डेय जी की
बड़ रही देखो दाढ़ी,
देव तो कलियुगी देव हैं,
वे क्यों बनवाते दाढ़ी,
पर वीर सतीश लखेडा ने
काट दी दाढ़ी रूपी झाड़ी,
दाढ़ीविहीन मदन मुख पर
लाल चिह्न जब देखा,
खिंच गई उमेश मस्तक पर
चिंता की लम्बी रेखा,
दिल का हाल सुनाकर
मदन जी मुस्काए,
बोले दाढ़ी बना रहा था
ख्वाब मुझे तब आए,
ख्वाबों में मैं भूल गया
बना रहा हूँ दाढ़ी,
गाल कटा ब्लेड से जब
चुस्त हो गई नाडी,
प्रेमिका की याद में
लोग बहाते आँसू,
खून बहाकर मदन बन गए
कलियुगी प्रेमी धांसू |

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019


कुछ बातें, कुछ यादें ६
मैं  और डग्गामार बस का अनुभव
वर्ष २००७ की बात है | मुझे एक कार्यक्रम के सिलसिले में जयपुर जाना था |  मैं आई० एस ० बी० टी ० दिल्ली पहुँचा  तो मुझे वहाँ एक आदमी दिखाई दिया | मैंने पूछा, भाई जी ! जयपुर जाने के लिए टिकट कहाँ से मिलेगा ?
उसने बोला, चलो ! मेरे साथ चलो | मैं उसके पीछे – पीछे जाने लगा | वह मुझे आइ० एस ० बी० टी के बाहर ऊपर रिट्ज सिनेमा हाल के पास ले गया | वहाँ पास में एक ऑफिस जैसा था | वह मुझे वहाँ ले गया | वहाँ उन्होंने मुझसे ६०० रूपये लेकर एक टिकट दे दिया | टिकट मिलने के बाद वह आदमी बोला, ‘’ आप यहाँ पर वेट कीजिये | यहीं से आपको गाडी मिलेगी  और हाँ आपको स्लीपर वाली सीट मिली है | वहाँ पर मेरे जैसे कुछ और यात्री भी थे | वे भी उसी गाडी का इन्तजार कर रहे थे | कुछ देर बाद वहाँ एक गाडी आ गई | हम उसमे बैठ गए | मैं उस आदमी के बताये के अनुसार स्लीपर में चला गया | मेरे बगल के स्लीपर की सीट पर एक आदमी लेटा हुआ था | कुछ देर के बाद बस का कंडक्टर बस में चढ़ा | वह उस स्लीपर की सीट के नीचे खड़े होकर स्लीपर में लेटे आदमी को भद्दी – भद्दी गालियाँ बकने लगा |  उसकी बात को सुनकर मैं स्लीपर से उतरकर बस में नीचे आ गया | मैंने उससे पूछा, भाई जी , इन्होने क्या किया है जो आप ऐसी गालियाँ दे रहें हैं | वह बोला, ये स्लीपर में ऐसे सो रहे हैं जैसे  गाडी इनके बाप की हो | स्लीपर तो पहले ही बुक है | स्लीपर में कोई नहीं सोयेगा |
लेकिन हमने तो स्लीपर का किराया दे रखा है | – उसने बोला |
‘’किराया तो आपने मुझे नहीं दिया है | - कन्डकटर ने बोला | उस आदमी ने अपना टिकट दिखाया | कंडक्टर मानने को तैयार ही नहीं हुआ | कंडक्टर ने स्लीपर वालों को सामान्य सीट पर बिठा दिया | कुछ देर बाद गाडी में एक और आदमी आया | वह बोला,सब लोग अपना- अपना टिकट दिखाओ | सबने अपना टिकट दिखाया | वह टिकट ऐसा बना था जिसका एक भाग बैंक के फॉर्म की रिसीविंग जैसा था जिसे आसानी से फाड़ कर अलग किया जा सकता था | उसने सबके टिकट का वह हिस्सा फाडकर अपने पास रख लिया | जो हिस्सा उसने अपने पास फाडकर रख लिया था उस पर किराया लिखा हुआ था | बाद में पता चला कि उस गाडी में हर सवारी से  जयपुर जाने का अलग – अलग किराया लिया गया था | कोई शिकायत न कर पाए शायद इसीलिये वह व्यक्ति टिकट के किराये वाले हिस्से को अपने साथ ले गया था |
 दिल्ली से राजस्थान जाने वाले रास्ते पर ऐसी गाड़ियाँ बहुत चलती हैं | जब कोई व्यक्ति दिल्ली आता है और रिक्शा वालों से पूछता है कि मुझे आ० एस० बी ० टी जाना है | तो कई बार आ० एस० बी० टी के बजाय वे डग्गामार बसों के ओफिस ले जाते हैं | शायद इनका भी कमीशन रहता है इसमें | दिल्ली में सिंधिया हाउस से अच्छी प्राइवेट बसें  विभिन्न मार्गों के लिए मिलती हैं | एक दिन मैंने एक रिक्शा वाले से कहा, मुझे सिंधिया हाउस जाना है | चलोगे ?
वह पचास रूपये में वहाँ जाने के लिए तैयार हो गया | वहाँ से रिक्शा वाले अमूमन एक सौ रूपये लेते हैं | मुझे आश्चर्य हुआ कि यह कम रुपयों पर कैसे तैयार हो गया ? मैं उसके रिक्शे में बैठ गया | चांदनी चौक में उसने टूरिस्ट बुकिंग ऑफिस के सामने रिक्शा रोक दिया | मैंने उससे पूछा, सिंधिया हाउस आ गया ? वह बोला, सिंधिया हाउस अभी दूर है | सिंधिया हाउस से भी अच्छी गाड़ियाँ यहाँ से मिलती हैं |’’ मैं समझ गया कि यह मुझे डग्गामार बस में बिठाने के लिए यहाँ लाया है | मैंने उसे पचास रूपये दे दिए | मै एक कोने पर खड़ा हो गया | वह मुझसे बार – बार कहने लगा, बाबू जी ! ओफिस से टिकट क्यों नहीं लेते ? मैंने कहा , मैं जाऊँगा तो सिंधिया हाउस से ही |
 मैंने उससे पूछा , मैं यहाँ से टिकट लूं या नहीं , तुम्हें क्या मतलब ? मैंने तुम्हें रिक्शा का किराया भी दे दिया है | अब अपना रास्ता नापो |
वह मुझसे वहीं से टिकट लेने के लिए दबाव बनाने लगा | अंत में उसके मुंह से सच्चाई बाहर आ ही गई ,बाबू जी ! दो पैसे अपने भी बन जायेंगे | आप बैठ ही लो | दिल्ली में अजनबी लोगों को सावधान रहना चाहिए जब भी आप टिकट लें आई ० एस ० बी ० टी के अन्दर निर्धारित काउंटर से ही लें | किसी और के बहकावे में न आयें |



मंगलवार, 19 फ़रवरी 2019

कुछ बातें , कुछ यादें ४


बछिया और चीनी की चोरी
बचपन की बात है | हमारी एक गाय थी | उसे हम प्यार से मधु कहते थे | उस गाय की एक बछिया थी | उसका नाम हमने यशोदा रखा था | यशोदा जब बड़ी हुई तो उसे भी मधु और दो बैलों के साथ जंगल चुगाने ले जाते थे | जब ये जंगल में चरते तो हम इनसे कुछ  दूर जंगल में ऊँचे स्थान पर बैठ जाया करते थे  जहाँ से इन पर नजर रखी जा सके | यशोदा कुछ देर अन्य गायों और बैलों के साथ रहकर वहाँ आ जाती | वहाँ आकर वह मेरे बालों को चाटती थी | जब मैं अपना सिर यशोदा से हटाता तो वह मुझे मारने को दौडती |
 एक दिन घर में मैं अकेला ही था | मेरा चीनी खाने का मन करने लगा | मैंने डिब्बे से चीनी निकाल कर खा दी | मुझे पक्का विश्वास था कि मेरी चीनी की चोरी पकड़ी जाने वाली नहीं है | शाम के समय जब सभी लोग घर आये | माँजी ने कहा, उमेश ! तूने आज चीनी खाई ?’’
मैं चक्कर में पड़ गया | मैं सोचने लगा, माँजी को मेरी चीनी चोरी का कैसे पता चला ?’’
दीदी ने पूछा , चीनी उमेश ने ही खाई तू यह कैसे कह सकती हो ?
माँजी ने कहा, उमेश जब भी कोई चीज खाता है तो पहले उसका कुछ हिस्सा यशोदा को जरूर देता है | मैंने यशोदा के मुंह पर चीनी चिपकी हुई देखी |  मैं समझ गई कि यह काम उमेश ने ही किया होगा |  
मै डर रहा था कि चीनी चोरी की डांट पड़ने वाली है किन्तु मैंने मांजी की आँखों में आँसू देखे | मैं समझ गया कि  मेरे यशोदा के प्रति  प्रेम को देखकर माँजी का ह्रदय भर उठा है |