सोमवार, 14 अगस्त 2017

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drishti:      गीत समीक्षा (गढ़वाली) 3         त्वैतेंबुलौणा ...:       गीत समीक्षा (गढ़वाली) 3           त्वैतें बुलौणा       मेरि किताबी ‘पथ्यला’ मा अयां ये गीत की  समीक्षा वरिष्ठ साहित्यकार (समीक...
     गीत समीक्षा (गढ़वाली) 3
         त्वैतें बुलौणा    

  मेरि किताबी ‘पथ्यला’ मा अयां ये गीत की  समीक्षा वरिष्ठ साहित्यकार (समीक्षक) श्री ईश्वर प्रसाद उनियाल जी द्वारा ‘रंत रैबार’ मा करे गै छै | समीक्षा का वास्ता तौंकू भौत-भौत आभार | ईं पोस्ट से पैलि  ‘ऐ जा मेरा गौं मा’ अर ‘पथ्यला बौण का’ कि समीक्षा का बाद  गीत दगिडी ईं पोस्ट मा श्री उनियाल जी द्वारा करीं तिसरा  गीत ‘त्वैतें बुलोणा’  कि समीक्षा पेश छ –
                    (3)
             त्वैतें बुलौणा
गाड़ गदेरा गीत गीत सुनोणा,
किले नि औणु त्वैतें  बुलोणा,

कफ्फू बासणा,घुघुती घुराणी,
बणों- बणों मा ,हिलांस रोणी,
लैंया का पुंगड़ा,छन भौत स्वाणा,
किले नि औणु त्वैतें  बुलोणा |

जू डाला बोट्ला, रोप्यां छा त्वेन,
यति साल बीत्याँ सी फूली गैन,
सुंघाण भौत फूलों से औणी,
किले नि औणु त्वैतें  बुलोणी|

जूं डालों तौला,छैल छौ  रौंदू,
जूं बौणों मा छौ तू गाजी चरोंदू,
बौण मुछाला बणीक रोणा,
किले नि औणु त्वैतें  बुलोणा |

बसगाल,ह्यूंद,रूड भी गैन,
तेरा बाटा तैं हेरदा  रैन,
गगडांदू सर्ग धै छ लगाणु,
किले नि औणु त्वैतें  बुलोणु |

औंदू मोल्य़ार जब गौं गल्यु मा ,
हैंसदा छन फूल,डाल्युं डाल्यों मा,
संगरांद चैते  त्वेतें  धधोणी,
किले नि औणु त्वैतें  बुलोणी|

चैते समोण फूल प्युली का,
खुदेड़ गीत दीदी भूली का ,
कै कोणा तेरा जिकुड़ा  मा होला,
कबि न कबि त्वेतैं बुलोला |
गाड़ गदेरा गीत गीत सुनोणा,
किले नि औणु त्वैतें  बुलोणा |
     -----रचना – डॉ० उमेश चमोला

समीक्षा
बौण मुछाला बणीक रोणा
------ आई ० पी ० उनियाल
  जन्मभूमि कु दर्द कनु होंद,य बात कै प्रवासी तैं पूछी पता चल सकद | जन्मभूमि का कण- कण मा बचपन कि याद समयीं रैंद | यी वजै छ कि सब कुछ संपन्न होणा बावजूद प्रवास कि पिडा सैनै मजबूरी वैका गला पडी रैंद | भौत कम लोग होंदन जु माटी कु दर्द मैसूस नि कर्दा पर अमूमन मनखि होणा नाता लोगु को जन्मभूमि को प्यार हर टैम टीस बणी सतोणी रैंद |
  प्रवासी पिडा क्वांसो पराण वला कवि अपण गीतों मा त क्वी कथा-कवितों मा अंकित कनौ कोशिश कर्दन तब कखि जैकि वुँका मन कि तसल्ली ह्वे सकद | जन्मभूमि का ढूगा-डाला, गौला-गुज्यारा, पुंगडा-डोखरा, सैरा,उखाड़ी, थौल-बजार, गोर-बखरा, भैस्यूंको खरक, आम्वी डाल्यों को छैल, उची-निसी डांडी, गैरी गदनी जनि कतगै यनि विद्या छन जौ से पल्ला छडोणु प्रवासी का वास्ता भौत कठिन होंद | शहरकि हल्ला-गुल्ला भरी जिन्दगी, बनावटी सुभौ वला लोग, मुख अगनै कुछ हौर अर पीठ पिछनै कुछ हौर चरित्र रखण वलों का बीच कम से कम पहाडी परिप्रेक्ष्य भौत श्रेष्ठ होंद | वेसे कैबि क्षेत्र माहौल कि तुलना नि करे जै सकदी |
  आज कुछ लोग जु कि भौतिकवाद का बथों मा अपणु बचपन तक बिसरि ग्येनि वूंसे त क्वी शिकैत कनि ढुंगा तैं पाणी चरणु जनु छ | जै मनखि का वास्ता सब कुछ रूप्या छन त वैसे अगर पुछै  जाव कि वैतें कबि जलमभूमि कि खुद बि लगद त वेको साफ़ जवाब होंद कि क्या फर्क पड़द याद कन नि कन से | एक मित्र छ मेरो बचपन कु | काफी बड़ी पोस्ट पर कार्यरत छ | बाल बच्चों का नों पर द्वी नौनी अर एक नौनु छ | नौन्यों को ब्यौ-मंतर ह्वे ग्येनि | नौना को बि ब्यौ ह्वेग्ये | यानि सर्वसम्पन्न,एक दां मैं वूंका घर कै काम से पौंछ्यों | सोचि छौ दगड्या दगड़ी भेंट बि ह्वे जालि अर अपण दिल कि बात बि वैमा सुनै दयोलो | घर पौंछ्यों त घर मा वेकि ब्वारी छै | हौर क्वी ना | जांदे स्यवा सौंली ह्वे | औपचारिकता का रूप मा पूरी मेजबानी करेग्ये पर बर्ताव मा रस्याण को कखि नौं दयखनो नि मिलि | पूछे कि भुला कब रिटायर होणु छ | पता चलि कि वेकि नौकरी का दुएक साल बच्यां छन | जब पूछे कि रिटायर होणा बाद वेको क्य कनौ सोच्युं छ | जवाब मिलि कि सुदि घर मा बैठी बि वूंन क्य कन | ये वास्ता कखि नौकरी कि तलाश करला | वुन वूंते अबि बटी ऑफर औणी छन | तुम जणदे छा कि वुंकि गणित कथगा तेज छ | ये वास्ता कखि मा बि बैठ जाला | त बुढ़ापा तक काम कर सकदन | सोचि छौ वुंसे गौं का विकास कि बात करए जैलि अर वेका आधार पर कुछ कार्यक्रम तैं जमीन मा उतारे जाव | बस सोच दिल का दिल मा रैग्ये | यु वाकया बीच मा लायेग्ये कि हम सोच सकां कि आखिर जन्मभूमि को हम पर जु कर्ज छ वेसे हम कनक्वे उरिण ह्वे सकला | निराश ह्वेकि घर ऐ गयों | पर चला क्वी त स्व्चणू छैछ अपनि जन्मभूमि का कर्ज से मुक्त होणे जुगत |
  बस यिनी विधा पर एक गीत –कविता ल्यखीं छ डॉ उमेश चमोला जी कि | वूंकि कविता-गीत से लग जान्द कि भले ही अगर हम वापस अपनि जन्मभूमि मा नि जै सकों पर यिथगा त छैंछ कि हम अपनि भावना तैं कलम मा उतारी अपणा भाव प्रगट कर सकणा छं | डॉ० चमोला कि ईं कविता को भौ सीधु जिकुड़ा पर चोट कर्द | भाव यो छ कि प्रवासि तैं वेका गौंका गाड़,गदेरा गीत लगोंद पूछणा छन कि कब घौर औनू छै | कविता से लगद जन कि कवि घुघुती, कफ्फू, हिलांस कि भाषा समझी वूंका मन कि पिडा मैसूस कनू हो |
   लगद जनकि गौं का गौला गुज्यारा, खेती पाती, डाला-बोट्ला अपणा प्रवस्युं तैं पूछणा होवन कि बता त जरा घर कब औनू छै | जौ डालो का छैल बैठी वूंन कबि थौ बिसै होलि वु अबि तक अपणा दगडया मनख्यों कि खुशबू मैसूस कना छन| कवि मैसूस कनू छ कि जनकि वखा बौण मुछ्याला बणी धै लगोणा होवन कि बोल कब आणु छै घर | बसग्याल, ह्यून्द, गगडाँदो सर्ग, औंदों मोल्यार, हैंसदि प्योली, बुरांस,  चैते संगरांद त्वे दयखनो बेताब होयां छन बस एक ही रौड(जिद) लगीं छ कि बोल कब तक एल्यु तु घर |
  कुल मिलैकि डॉ चमोलान यी कविता मा यिना भाव निवेशित करनि कि हर अंतरा पढ्दरा प्रवासि तैं अपनि जन्मभूमि का दर्शन का वास्ता प्रेरित कर्द |
(रंत रैबार २०  मार्च  २०१२  बटिन)








शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

drishti: गीत समीक्षा (गढ़वाली) 2        हम पथ्यला बौण का   म...

drishti: गीत समीक्षा (गढ़वाली) 2        हम पथ्यला बौण का   म...: गीत समीक्षा (गढ़वाली) 2         हम पथ्यला बौण का   मेरि किताबी ‘पथ्यला’ मा अयां ये गीत की  समीक्षा वरिष्ठ साहित्यकार (समीक्षक) श्री ईश...
गीत समीक्षा (गढ़वाली) 2
        हम पथ्यला बौण का
  मेरि किताबी ‘पथ्यला’ मा अयां ये गीत की  समीक्षा वरिष्ठ साहित्यकार (समीक्षक) श्री ईश्वर प्रसाद उनियाल जी द्वारा ‘रंत रैबार’ मा करे गै छै | समीक्षा का वास्ता तौंकू भौत-भौत आभार | पैलि पोस्ट मा ‘ऐ जा मेरा गौं मा’ कि समीक्षा का बाद  गीत दगिडी ईं पोस्ट मा श्री उनियाल जी द्वारा करीं दूसरा गीत ‘हम पथ्यला बौण का’ कि समीक्षा पेश छ –
                      (2)
            पथ्यला बौण का
हम पथ्यला बौण का,
कैतें हमुन दयोण क्या |

डालों का जब पतगा छा,
भला लगदा कतगा छा,
डालों का हम  गैल छा,
सबु तैं देंदा छैल छा |
बथोंन मार्या रोण क्या, 
हम पथ्यला बौण का |

ठौर नीं,ठिंगणु नीं,
बथों चो जख लिजौ,
कैका खुटिन कुरची जौ,
बटवे रोडू ,गालि खौ,

अपड़ी छ्वीं लगौण क्या,
हम पथ्यला बौण का |

क्वी लटयाली स्व्लटि भोरी,
अपडी साली लिजौ,
आटी मोळ बनैक;
अपड़ा पुंगड्यों चुलौ,

अपड़ी छुईं  बिंगौण क्या,
हम पथ्यला बौण का |

लगदी छै स्वाणी भली,
छा डाल्यों पर जब पतगा,
हमरा बिन डाला आज,
जन हों रूखा सूखा सेड्गा,

दयोंण कै समोण क्या,
हम पथ्यला बौण का |

हैका मोल्यार फेर औला,
रीति डाल्यों तैं सजौला,
आज छन हम उदास,
भोळ खुश्या गीत गौला,
जिन्दगी कि औणी जाणी,

हमुन कै बतोंण क्या|
हम पथ्यला बौण का |
    ----रचना –डॉ उमेश चमोला
समीक्षा
ठौर नीं ठिकाणु नी
------ आई ० पी ० उनियाल
  उत्तराखण्ड बणयां ग्यारा वर्ष ह्वे ग्येनि पर अबि तक यखा शासकुन क्वी यिनी नीति नि बनै कि जांसे लोगु तैं गौ मा हि रोजगार मिल जाव | पहाड़ी बहुल उत्तराखण्ड को ग्रामीण परिवेश मठु-मठु कै अपनि पछ्याण हर्चाँद जाणू छ | अब गौ मा जावा त सब कुछ बनावटी सीं लगद | पैलि  वलि लसाग नीं छ गौ वालों का बर्ताव मा | क्वी अगर प्रेम से बी बच्याणु हो त लगद कि स्यु बी बनावटी हि व्यवहार कनू छ | गौंका बुडय –बुजुर्ग कि आंख्युं मा ममता,वात्सल्य अर छ्व्टो का वास्ता स्नेह कि शकल नि दिखेंदी |
   ये सब कि वजै कुछ बि हो पर लगद कि वूंका बर्ताव मा वूंका भितर दब्यू पुरवाग्रह बोन बच्यांद भैर औनू छ | कबि जब परदेश बटी क्वी घौर जान्दो छौ त वेका घर मा गौं वलों कि लंग्यात लग जांदी छै | वूंते भले इछि चाणा लैंची दाणा मिलु पर वूंतैं ज्व खुशी मिल्दी छै वांको वर्णन नि करये जै सकदो | किले कि यु सब देखी सूनी अर भोग करी तैं मैसूस करये जै सकेंद पर अब व बात नि रैग्ये | को आणु छ अर को जाणू छ यां से कै तैं कुछ मतलब नीं छ | सब अपण- अपण स्वार्थ से बंध्याँ छन | लगद कि जन ब्व्लेंद वेतैं कैकि जर्वत ही नीं छ | वेकि युकुलि जिन्दगी आराम से कटे जालि |
   आज जबकि शहरी गौं मा बि लोग एक दुसरा से बन्ध्यां छन, भले ही यांमा वूंकु स्वार्थ हो पर वूंका बर्ताव मा मैलिकता अबि बी बाकि छ पर हमरा गौं ईं संवेदना से हरबि-हरबि दूर होंद जाणा छन | आज हमरि मानसिकता भैर भगनै होयीं छ | भितर हमारो दम घुटेंद | भितर बि हम्तैं अपणु सि नि लगदो | वखै हर चीज वस्तु से हमरो मोह ख़त्म होंद जाणू छ | य स्थिति ठीक नीं छ | य हालत बर्बादी ल्होंण वलि  छ | बर्बादी मनख्यों कि,बर्बादी प्राकृतिक संसाधानु कि अर बर्बादी संस्कृति कि | यिनी कुछ बिंदु छन जौ पर गढ़वाली का  ल्य्ख्वार अर गितार
  डॉ ० उमेश चमोला जी का प्रस्तुत गीत कि | ये गीत मा चमोलाजीन भावनों अर संवेदनों कु समावेश कर्यूं छ | गीत कु शीर्षक छ ‘पथ्यला बौण को’ | कविता ठेठ टिर्याली भाषा मा छ | त सिनगर्य बोन वलों तैं ह्वे सकद गीत समझ मा नि आव त यांकी समीक्षा से पढ्दरा कविता को भाव समझि जाला |
  पथ्यला यानी डाला बटी भुयां पड़यां सूखा पत्ता | कविन पत्तों खुण पतगा शब्द इस्तमाल कर्युं छ जु कि ठेठ टिरियाली मा पत्तों खुण  बोल्दन | वून डाला पर लग्याँ हैरा पत्तों अर सूखिकि भुयां पड़यां पत्तों मा मार्मिक अंतर बतायुं छ | बोल्दन हम बौण का सुक्यां पत्ता छां | हम कैतें न कुछ दे सकदा अर न कुछ अफुमा समै सकदा | जब तक डालों पर लग्याँ छा त सबि मिली तैं छाया देंदा छा | पर जब बथोंन डाला से टूटी भुयां पड्ग्यां त हमरि जिन्दगी वखि बटी भटकाव कि स्थिति मा ऐग्ये | क्य ही मार्मिक भाव छ कि हमरि क्वी दिशा नी | बथों जख बि लिजालु चल जौला | तब चै कैमा खुटों तौल कुर्चे जावन य फिर हमुमा रौडी क्वी चोट खैकि हमतें गाली दयाव | चै क्वी जनानी घर लिजैक छान्युं मा डाली वेको मोळ बनैक पुगडों मा फैले द्या | हमुन अपनि कथा क्य लगौण | जब डालों पर छा त स्वाना लगदा छा | आज हमरा बिना वु खरडा हुयां छन | कवि पहाड़ से पलायन करीं तैं बिना दिशा तै कर्यां मैदान उन्द बगदी ज्वन्नि पर अपनि ब्यथा व्यक्त कनू छ | अब जीवन कि क्वी लीक हि नीं छ त जान्वी छ वून देणा बै | यामा चै क्वी ठोकर मारी बै पिच्कै दयोंन चै क्वी कुरची अगनै निकलन हम्तैं सीढ़ी का रूप मा इस्तमाल करो |
 फिर बि कवि निराश नीं छ | वेतैं आस छ कि अबि कुछ नि बिगडे, उत्थान –पतन कुदरत को खेल छ | आज अगर पतझड़ छ त भोल मोल्यार बि त ऐलि | फिर डाली हैरी होली |फिर नयाँ पत्ता डाल्युं तैं सजोला | आज पतझड़ को दर्द सैण वला भोल हैरयाली को सुख भोग करला | आज जु दुःख अर उदासी को वातावरण छ भोल खुशी गीत गा णों  मौका बि आलो | या जिन्दगी आणी-जाणी छ | ये वास्ता निराश नि ह्वा अर भोले खुशी कि जग्वाल करा |
(रंत रैबार १४ मई २०१२  )





रविवार, 6 अगस्त 2017

         गीत समीक्षा (गढ़वाली)
  ये शीर्षक का भितर गढ़वाली गीत अर कवितों कि मेरि किताबी ‘पथ्यला’ मा अयां गीत अर कवितों की समीक्षा कु वर्णन कर्या जालु | ई समीक्षा वरिष्ठ साहित्यकार अर समीक्षक श्री ईश्वर प्रसाद उनियाल जी द्वारा ‘रंत रैबार’ मा करे गै छै | समीक्षा का वास्ता तौंकू भौत-भौत आभार |
                    (1)
                    ऐ जा ! मेरा गौ मा
टक लगैक सूण,ढोलकी चैत की,
छांछरी लगान्दी बेटूली मैत की;
कबि खुदेड़ गीत, कबि सदें लगान्दी,
थडया ,चौफलों का हुलेर चौक मा,
मेरा गौ मा ,
ऐ जा ! मेरा गौ मा |

हिलांस,कफू की खुदेंदी भौंण मा,
बुरांस का स्वाणा,फुल्यारा बौंण मा,
काफलपाकू बसद हरा –भरा ये बौंण,
लुणक-झुणक आम रैंदिन  डाल्यों मा,
मेरा गौ मा ,
ऐ जा ! मेरा गौ मा |

हरीं डांडी कांठी जब कुयेडी छान्दी,
खुदेंदी घसेरी कबि गीत लगान्दी,
लुकदु कन सूरज बादलों का बीच,
देखण चांदि ऐ जा चौमास मैनों मा,
मेरा गौ मा ,
ऐ जा ! मेरा गौ मा |

गौत,तोर दाल,चुला मा धैरीक,
कुटेरि खुल्दि छुयुं की दगड़ा बैठीक,
लम्बी राति ह्युंद की कटदी छुयुं मा,
तू भी ऐ जा कछिडी मा,ह्युंद मैनों मा,

मेरा गौ मा ,
ऐ जा ! मेरा गौ मा |
     ---------रचना डॉ उमेश चमोला
               समीक्षा
          धै लगौनी कुदरत
        ----- आई ० पी ० उनियाल
    पहाडी जीवन एक सुपन्य जनु छ | वेका हर घूम पर नयु क्षितिज, हर डांडा पर नयि कुदरत | हर गाड़/गदनों का ओर –पोर नयि डाली बूटी | हर मनखी मा प्रकृति कु आकलन को अलग अंदाज | पर एक बात ज्व एक जनि छ, वो छ मनख्यों कि एक जनि मानसिकता | सीदा,सच्चा अर दुन्य का हेरफेर से भौत दूर | हालाँकि बोन वल़ा त बोदन कि पहाड़ त वखा जन्यां तनि छन पर वखा मनखी पहाड़ी नि रयां | वु अब समझदार अर स्वार्थी ह्वे ग्येनि | वूँकि आजे मानसिकता से अगर पैल्ये सोच दगिडी तुलना करे जाव त पता चललो कि यूंमा सर्ग पताल को भेद छ | य बात अब –अब ऐग्ये हमारा पहाडयों मा | पैलित वूँकि इमानदारी कि सौं खाए जांदा छा  |
   बात कुछ-कुछ मामलों मा सै छ | किले जौ लोगुन यि तर्क देनि वूँको  यो बरर्त्याँ  मामलों मा सै ह्वे सकद पर यि बथा अपवाद छन | वास्तव मा त वखा लोग्वी सीधी सोच आज बि बहुल रूप मा दयखे जै सकद | य बात हौर छ कि कुछ आधुनिक सोच अर जर्वतों का चलद वखा लोग स्वार्थी ह्वे ग्येनि पर कुलमिलैक स्थिति अबि इथगा बुरि नि
 ह्वे |
   एक बात हौर छ जैन अबि अपणु प्रकृति धर्म नि छोडि वे छ पहाड़ कि ऋतु, डाली-बूटी, बथों अर कुदरती उमैला दृश्यावलि | आज जबकि पहाड़ को पूरो जनमानस भैरमुख्या ह्वे ग्ये | वे तैं पहाड़ कि जिन्दगी भार मैसूस होण बैठ्ग्ये | चौतरफी पहाड़ छ्व्डनै होड़ मा भजा –भज लगीं छ | हर क्वी यो बोनमा बड़ादमें मैसूस कनू छ वु फलाण शहर मा नौकरी कर्द | जनकि यो बोन मा गर्व मेसूस कर्दन वो तीन साल का बाद पहाड़ अयां छन | यानि जू जथगा देर मा पहाड़ औंद वु अफुतैं उथगा गौरवशाली माणद | पर ईं बात तैं क्वी झुठलै नि सकदो कि वखै आबोहवा मा वी साक्यू पुरनि पुलक छ |बथों साक्यू जनु खुशबूदार | वखै डांडी कांठी अबि वख बटि पलायन कनै नि स्वचनी छ | वखै डाली बूटयोन अबि पहाड़ छवडनौ  मन नि बने | वखै उकाल –उन्दारि जख्या तखि छन | अबि बी उकळी चढ्द साँस सक्स्येंद अर उन्दार्यों मा खुटा खपचै जान्दन | वखै लम्बी –लम्बी   सड़क्यों मा पैदल चल्द जब कुरै चल्दी छै व अबि भी मैसूस करे जै सकद | वखा  बजार, वखा गौला-गुज्यरा, ढुंगा –माटो, घास, वनस्पति अबि भी सक्यों पुराणी अन्वार ल्हेकि मनखि तैं चिडोंद नजर औंद कि देख ल्या, भले ही खैरी डॉरो तुमुन पहाड़ छोड्नो सौंगु बाटू अपनै यालि पर हमुन अबि अपणु गुण /धर्म नि छोड़े | तुम त क्य तुमरि दर्जनों पीड़ी भी जब यख ऐलि वु बी हमतैं जन्यां तनि दयाखलि | बस यिनि भावनों ल्हेकि पहाड़ी प्रकृति से जुड़यां कवि –साहित्यकारून सृजनात्मकता का आश्रय ल्हे अर लिख देनि एक से एक खुदेडा अर पहाड़ी प्रकृति से जुड़यां गीत | यों मद्दे त कथगै रचना यिनि छन जुकि कालजयी ह्वे ग्येनि | बस वूतैं जरा जिकुड़ा भितर बटी मैसूस कनै जर्वत छ |
   यिना साहित्यकारोंमा डाक्टर उमेश चमोला शामिल छन | वूँकि रचनों मा पहाड़ी जन जीवन कि मौलिकता कि झलक दयखनो मिल्द | वूंकि रचनों से मैसूस होंद कि भले हि मन्खिन अपनि जन्मभूमि छ्व्डनमा गर्व कु अनुभव करदू हो पर एक बात छ कि वखै कुदरत अबि भी धै लगै लगैक बुलोंदि नजर औंद कि चुचों बौडी ऐ जावा | आज न त भोल तुमतैं मेरि शरण मा औण ही पडूलु | तुम नि एल्या त तुमरि अगलि पीड़ी पहाड़ का तर्फ मुख करलि पर तुम एक दिन जरूर म्यरि खुचल्या मा ऐल्या | किलेकि जैलु व आयूँ-सायूं पर ऐलुत गोळका मा
हि |
  प्रस्तुत गीत मा डॉ० चमोलान आज से करीब तीनेक दशक पैल्ये तस्वीर खैंची छ | जब वखा पुन्गडा-डोखरों मा वखै जनान्यू  का गीत सुनेन्दा छा | डांडा –पाखों मा घसेन्यू का खुदेडा सुनेदा छा | हिलांस –कफू को खुदेड़ भाव मैसूस करये जान्दो छौ | बेलतीड़ो, काफलपाको  अर तितर-चकोरू कि भौंण मा वखै धरती कि खुशबू औन्दी छै | वूंकि भौण ज्व प्रवास का दौरान वखा मनख्यों तैं आज बि मैसूस होंद | वखौ मुट्ठी भर सर्ग, ऊँची नीचि कुदरती क्षितिज कि लंग्यात | चौमास मा डान्डयों मा लौन्कदि कुयेडी, स्वां-स्वां कर्दा गाड़ गदेरा;रुड्यों मा आमुकि डाल्यों का छैल अर सड़क्यों नया-नया क्षितिजू(घूम) से प्रगट होन्दी मोटर-गाडयों कि अन्वार, वखै खेती पाती मा उगदा नाज अर ह्यूंद कि रात्यूं मा घरय लोगुकि कछडी मा लगदी छुयूं को दौर डॉ० चमोला का ये गीत मा दयखनो मिल्द|
  (रंत रैबार १६ जुलाई २०१२ ) बटिन




शनिवार, 5 अगस्त 2017

उत्तराखंड की लोककथा
Folk tale of Uttarakhand by Dr Umesh Chamoa

जय घोघा माता
--डॉ उमेश चमोला
 बहुत पहले की बात है | एक राजा था | उसका नाम घोघाजित था | वह पराक्रमी, न्यायप्रिय एवं धर्म परायण था | उसके घर एक कन्या का जन्म हुआ | उसका नाम घोघा रखा गया | राज ज्योतिषी ने उसकी जन्मकुंडली बनाई और देखकर बताया,’’इस कन्या की जन्मकुंडली में असाधारण योग है | यह सुन्दर और प्रकृतिप्रेमी होगी| दस वर्ष की आयु पूरी होने पर यह तुमसे हमेशा के लिए बिछुड़ जाएगी|’’
  घोघा अन्य बच्चों से अलग थी | उसे जंगल,खेत,पशु पक्षी आदि प्रकृति से जुडी वस्तुएँ अच्छी लगती थी | एक दिन उसने महल में राखी बांसुरी उठाई | जंगल में पेड़ों की घनी छाँव में बैठकर वह बांसुरी बजाने लगी | बांसुरी की मीठी धुन जंगल में गूंजने लगी| घोघा के चारों ओर जंगल के कई जानवर और पक्षियाँ जमा हो गए जैसे वे बांसुरी की धुन से खिंचे चले आए हों | ऋतु बसंत के समय जब जंगल और खेत की दीवारें प्यूली के पीले फूलों से भर जाती,जब बुरांस के पेड़ लाल –लाल फूलों से लद जाते,सरसों के पीले हरे खेत छटा बिखेरते,पैंयाँ के पौधे हरी –हरी पत्तियों से भर जाते,तब घोघा इन फूलों के पास आ जाती|ऐसा लगता घोंघा इन फूल-पत्तियों से खूब बातें कर रही हो| वह घुघुती,कफ्फू,मेलुड़ी आदि पक्षियों की मीठी आवाज को सुनकर कहीं खो जाती |
    ऋतु बसंत का मौसम था | जंगल एवं खेतों की दीवारें प्यूली से भरी थी | जंगल में लाल-लाल बुरांस खिले थे | जंगल पक्षियों के मृदु स्वरों से गूंज रहा था | घोंघा हमेशा की तरह जंगल चली गई | दिन बीता | काली रात का अँधेरा पसरा लेकिन घोघा महल में वापस नहीं लौटी | राजा को चिंता हुई | उसने दरबारियों को  घोघा को ढूंडने भेजा | घोघा का कहीं पता नहीं चला|घोघा की दस वर्ष की आयु पूरी हो गयी थी | राजा को ज्योतिषी की भविष्यवाणी याद आ गई | वह बहुत दुखी हुआ | उसे रात भर नींद नहीं आई | रात्रि के अंतिम पहर उसकी आँखें लग गई| उसने एक सपना देखा | दिव्य आभूषनों से सुसज्जित एक सुन्दर नारी सिंहांसन में बैठी थी | घोघा उस नारी की गोद में बैठी थी | उसे देखते ही राजा चिल्लाया,’’पुत्री!’’| घोघा मुस्करा रही थी | राजा की बात को सुनकर सिंहासन में बैठी वह नारी बोली,’’पुत्र घोघा जित! मैं तुम्हारी कुलमाता हूँ | मेरा एक नाम प्रकृति भी है | तुम्हारी पुत्री घोघा जिस प्रकृति की गोद में पली बढ़ी थी,देखो उसी प्रकृति (मेरी) गोद में अभी भी है | प्रकृति का संरक्षण तुम्हारे राज्य की समृद्धि एवं अस्तित्व के लिए आवश्यक है| यही सन्देश देने के लिए तुम्हारे घर घोघा ने जन्म लिया था | दूसरे वर्ष की चैत्र माह की सक्रांति के दिन से तुम अपने राज्य में घोघा की याद में फूलों का त्यौहार मनवाना | इस त्यौहार में सभी छोटे बच्चे प्यूली,बुरांस के फूलों और पैंया के सुन्दर पत्तों को रिंगाल की छोटी छोटी टोकरियों में जमाकर हर घर की देहरी में डालेंगे | घोघा की एक डोली भी बनाई जाएगी | सभी बच्चे ‘जय घोघा माता,प्यूली फूल, जय पैंया पात कहकर घोघा की जयकार करेंगे | तुम्हारी पुत्री घोघा अब घोघा माता के रूप में याद की जाएगी | घोघा माता की कृपा से तुम्हारे राज्य में प्राकृतिक  सुन्दरता और समृद्धि बनी रहेगी|
  घोघा की याद में आज भी उत्तराखण्ड में प्रत्येक वर्ष चैत्र माह के संक्रांति से आठ गते तक फूलों का त्यौहार मनाया जाता है | इसे फूल्देई का त्यौहार कहा जाता है | चैत्र माह की सक्रांति को फूल संक्रांति के नाम से जाना जाता है |