गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

पुस्तक समीक्षा दस्तक


दस्तक (गजल संग्रह )
शायर –अवनीश उनियाल ‘शाकिर’
पुस्तक समीक्षक /परिचयदाता-डॉ उमेश चमोला 
१-खुद से मिलना है तो मिल गजलों से मेरी,
लफ्जों के आगोश में एक आइना होगा.

२-हरेक रोम से रिसने लगी सम्वेदना मेरी,
जब भी उजाले के मरने की खबर आई है.
३-लगते हैं जख्म जो दिल पर तूफानी हालातों में,
हम कविता के धागों से उनको यों ही सिये जाते हैं.
          गजल को यथार्थ का आइना और उजाले के मरने की खबर से निसृत सम्वेदना का ज्वार मानने वाले शायर अवनीश उनियाल की यह पहली किताब है. प्रसिद्ध शायर कँवल जियाई ने इसे जिन्दगी के दरवाजे पर दस्तक की संज्ञा देते हुए शाकिर के आने वाले रचनात्मक दौर और वर्तमान शायरी के संबंधों को बयां किया है.इस संकलन में गजल के विभिन्न रंग-रूप देखने को मिलते हैं.मानव जीवन में आपाधापी,भौतिकता की अंधी दौड़,विश्वासघात,धार्मिक अन्धविश्वास,मानव का दोहरा चरित्र आदि विषयो पर गजल के माध्यम से शायर ने कलम चलाई है.
इन पंक्तियों में मानव की कथनी और करनी में अंतर स्पष्ट होता है-
‘देखो आ गया है बुझाने फिर वो,
आग जिसने मेरे घर में लगाई है.’
इसी प्रकार –
‘महफूज बैठे हैं वो अपने घर में,
आग लगाकर तमाम शहर में,’
मानव मानव के बीच अविश्वास को यह पंक्तियाँ इस प्रकार व्यक्त करती हैं-
‘हमने उन्हें बहार का पता बता दिया,
और वे हमें खिजां के करीब ले आये.’
शायर का यह मानना है कि इस प्रदूषित समाज में हमें आत्ममंथन ही बचा सकता है-
‘अपने भीतर का अमृत ही बचाएगा हमें,
जिधर देखिये उधर है जहर भरी नजर.
    शायर व्यवस्था के प्रति असंतुष्ट तो है लेकिन इसे बदलने के लिए जूनून को आवश्यक मानता है-
बदल जायेगी व्यवस्था की तस्वीर दो ही पल में,
हरेक इंसा हदे जूनून तक बेकरार चाहिए.
    धार्मिक अंधविश्वासों पर शाकिर व्यंग्य करता हुआ कहता है –
‘यहाँ से हम –तुम नहीं जा सकते एक साथ,
मजहब की ये बड़ी तंग गली है,’
   संग्रहीत कुछ शेर श्रृंगार रस से ओतप्रोत हैं.उदाहरण-
१-‘ख्याल दिल में आ गया जब आपका,
प्यास का अहसास बादल बन गया.’
2-‘तेरे रूप की लहरें जब हो सामने,
रहना चाहेगा कौन फिर किनारों पर.’
३-तुमको एक सौगात मन के मीत दे दूँ,
गुनगुनाने को तुम्हें एक गीत दे दूँ.
    इस प्रकार शाकिर की गजलों में प्रेम की भावना का सुमधुर अहसास भी है,भोगे जा रहे यथार्थ का कटु चित्रण भी है,व्यवस्था पर हल्की फुल्की चोट भी है.
   पुस्तक पठनीय है.पुस्तक के माध्यम से शब्दों की सतह को पार कर पाठक भीतर बह रही अहसास और भावनाओ की निर्मल धारा में भीगेंगे और महसूस भी करेंगे,जैसी शायर ने उम्मीद जाहिर की है,
अंत में संग्रह से ही कुछ पंक्तियाँ –
१-जिन पर बैठा करते थे शब्दों के पंछी ,
किसने तसव्वुर की वो कोमल शाख तोड़ दी.
२-जब जंगल में लगी आग तब हमने देखा,
इतिहास जल रहा था एक हरे दरख्त पर.
पुस्तक के प्रयणन हेतु शायर को बधाई,
पुस्तक का मूल्य -50 रु
प्रकाशक –उत्तरांचल प्रकाशन,३२ चकराता रोड देहरादून,उत्तराखण्ड
मो -9411383983
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सोमवार, 17 अप्रैल 2017

गढ़वाली कवितायेँ ---डॉ उमेश चमोला



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           उत्तराखण्ड की लोककथा
       Folklore   of   Uttarakhand  India  by  
                  Dr. Umesh     Chamola
            वीरा बहिन और सात भाई
             ----------डॉ उमेश चमोला
Veera   sister  and  seven  brothers
      किसी गाँव में सात भाई रहते थे|उन्हें बहिन का न होना खटकता| वे सोचते,’’काश! उनकी भी कोई बहिन होती| वह रक्षा बंधन के दिन उनकी कलाई में राखी  बांधती| उन्हें भी बहिन का प्यार मिलता| उन सात भाइयों की माँ दीपा गर्भवती थी| “’’हमारा मन इस घर में नहीं लगता| हम इस घर में अब तभी कदम रखेंगे जब हमें बहिन के जन्म का समाचार प्राप्त होगा|’’
 यह कहकर वे सातों भाई जंगल जाने के लिए तैयार हो गए.
‘’ “ठीक है|अगर तुम्हारा भाई होगा तो मैं जंगल के टीले पर  पाटी (तख्ती ) और बोल्ख्या (लकड़ी से बनी वस्तु जिसके एक सिरे पर कटोरी का आकर और दूसरे सिरे पर  पकड़ने के लिए हैन्डल जैसा बना होता है|इसमें सफ़ेद मिट्टी (कमेडा) को पानी में घोला जाता है|इसमें कलम को डुबोकर तख्ती पर लिखा जाता था) रखूँगी| अगर तुम्हारी बहिन हुई तो टीले पर गंजाला (मूसल ) और छटणा (कूटे अनाज को छानने के लिए प्रयुक्त वस्तु) रखूँगी|’’
 यह कहकर उन सात भाइयों की माँ दीपा ने उन्हें जंगल के लिए विदा
  किया|
    जंगल पहुँच कर सातों भाइयों ने वहाँ लकड़ी और घास-फूस से छानी बनाई|वे जंगल से लकड़ी काटकर बेचते थे| इसी से अपना गुजारा करने लगे| जंगल में रहते-रहते काफी समय गुजर गया| एक दिन सबसे बड़ा भाई बोला ,’’ बहुत दिन हो गऐ,हमने घर की सुध नहीं ली|पता नहीं हमारा भाई हुआ होगा या बहिन? चलो जंगल के टीले में देखने जाएँ ,माँ ने वहाँ क्या रखा है?’’
 वे सातों भाई जंगल के उस टीले को देखने गए|वहाँ उन्हें पाटी और बोल्ख्या दिखाई दिए|उन्हें अपनी माँ का कहा याद आया,’’ अगर तुम्हारा भाई होगा तो मैं जंगल के टीले पर  पाटी  और बोल्ख्या रखूँगी|
 घर में भाई का जन्म हुआ है|यह जानकर सातों भाई उदास हो गए|वे जंगल अपनी छानी में वापस लौट आए| इधर उन सात भाइयों की माँ ने एक सुन्दर कन्या को जन्म दिया| उसका नाम वीरा रखा गया| वीरा बड़ी होती गयी| एक दिन वीरा सहेलियों के साथ घास लेने जंगल गई| उसकी सहेलियां अपने साथ खाने के लिए माल्टे(संतरे) भी ले गई| उनका एक माल्टा रास्ते में कहीं गिर गया| उन्होंने वीरा पर शक जताते हुए कहा,’’वीरा! कहीं रास्ते में चलते-चलते तूने हमारा माल्टा तो नहीं खाया?’’
 ‘’नहीं,मैंने नहीं खाया.’’-वीरा ने कहा|
‘’अपने भाइयों की सौगंध खाकर बोल कि तूने माल्टा नहीं खाया ?’’
‘’मैं भाइयों के सौगंध कैसे खाऊँ?मेरा तो कोई भाई है ही नहीं|’’-सहेलियों की बात को सुनकर वीरा बोली|
 उसकी सहेलियों ने उसे बता दिया कि उसके सात भाई हैं|वीरा अपने सात भाइयों के बारे में जानकर बहुत खुश हुई| वह जंगल से घास लेकर घर पहुँच गई | उसने माँ से अपने सात भाइयों के बारे में पूछा| उसकी माँ ने कहा,’’तेरे सात भाई हैं किन्तु वे कहाँ हैं यह मुझे भी पता नहीं है|’’
  वीरा के मन में अपने भाइयों से मिलने की उत्सुकता थी|वह एक कोने में उदास बैठी थी| थोड़ी देर में वहाँ पर एक गरुड़ आया| गरुड़ ने वीरा से पूछा;तुम उदास क्यों हो?’’
 ‘’गरुड़ मामा!मैंने आज तक अपने सात भाइयों  को नहीं देखा|वे इस दुनिया में होंगे या नहीं?’’-वीरा ने अपना दुःख व्यक्त किया|
 ‘’चिंता करने की कोई बात नहीं है| तुम्हारे सातों भाई इसी दुनियाँ में हैं| वे चाहते थे कि उनकी कोई बहिन हो| मैं तुम्हें अपने पंखों पर बिठाकर तुम्हारे भाइयों के पास ले चलूँगा|’’-गरुड़ ने उससे कहा.
 गरुड़ ने वीरा को यह बात भी बता दी कि उसकी माँ ने उसके भाइयों से कहा था कि अगर उनके घर में बेटी का जन्म होगा तो वे जंगल के टीले में गंजाला और छटणा रखेगी| उसकी माँ ने वीरा के जन्म होने पर टीले में गंजाला और छटणा ही रखा था किन्तु उनके किसी दुश्मन ने गंजाला और छटणा को हटाकर वहाँ पाटी और बोल्ख्या रखा जिससे उसके भाइयों को सच बात पता न चल सके|
  गरुड़ ने वीरा को अपने पंखों में बैठा लिया| वह उडकर वीरा के सात भाइयों की छान में पहुँच गया|वहाँ पहुँच कर वीरा ने छान का दरवाजा खोला| वह छान के अन्दर चली गई| वीरा के सात भाई उस समय लकड़ी लेने  जंगल जा रखे थे| वीरा ने वहाँ खाने –पीने का सामान देखा| उसने उस सामान से खाने-पीने की चीजें बना दी| जैसे ही उसे सात भाइयों के आने की आहट सुनाई दी, वह वहाँ रखे कोंडा (रिंगाल से बनी अनाज रखने की वस्तु जिसे गोबर से लीप कर रखा जाता है) के अन्दर छिप गई| उसके भाइयों ने लकड़ी के गट्ठर एक जगह पर रखे और छान के अन्दर आ गए| वहाँ पकवानों की महक आ रही थी| उन्हें घर में पकवानों को देखकर आश्चर्य हुआ| उन्हें जोर की भूख लगी थी| उन्होंने वीरा के बनाए पकवान खा लिए| थोड़ी देर में वे गहरी नींद में सो गए| अब हमेशा ऐसा ही होने लगा| उसके भाई जैसे ही शाम को घर पहुँचते उन्हें खाना-पीना बना हुआ मिलता| भाइयों के आने से पहले वह कोंडा में छिप जाती| जब उसके भाई रात को गहरी नींद में सोए रहते वह कोंडा से बाहर आकर शौच आदि से निवृत्त हो जाती| फिर कोंडा में छिप जाती| ऐसा कई बार होता| उनकी अनुपस्थिति में खाना कौन बनाता है? इस रहस्य को जानने के लिए उन सात भाइयों को एक विचार सूझा,’’वे सात भाई बारी-बारी से रात को उठे रहेंगे जिससे खाना बनाने वाले का पता चल सके|
    सात भाई रात को बारी-बारी से उठे रहने लगे किन्तु आधी रात के बाद उन्हें नींद आ जाती| सबसे छोटे भाई की बारी आने पर उसने अपने हाथ की उंगली को चाक़ू से काट दिया| कटी उंगली पर उसने मिर्च डाल दी| ऐसा करने से उसे रात भर नींद नहीं आई| आधी रात के बाद जैसे ही वीरा कोंडा से बाहर निकली,सबसे छोटे भाई ने अन्य भाइयों  को उठा दिया| उन्हें पता चल गया कि यही लडकी उनके लिए खाना बनाती थी| उन्होंने वीरा से पूछा,’’तुम कौन हो? वीरा ने उन्हें पूरी बात बता दी| सातों भाई वीरा को पाकर बहुत खुश हुए| उन्होंने वीरा के लिए बहुत सारे आभूषण बनाए|
   अब वे सातों भाई निश्चिन्त होकर जंगल लकड़ी काटने जाते| वीरा उनके आने से पहले खाना बनाकर रखती| उन्हें समय पर खाना बना मिल जाता| वीरा फटिंग के गारों को आपस में रगड़ कर आग पैदा करती थी| एक दिन वीरा को फटिंग के गारे घर में नहीं मिले| वह फटिंग के गारों को ढूढते हुए घर से बाहर निकल गई| वहाँ भी उसे फटिंग के गारे नहीं मिले| ‘’आज मैं खाना कैसे बनाऊगी?’’-वीरा सोच ही रही थी| तभी उसे एक बुढ़िया दिखाई दी| वह बोली,’’बेटी! चिंता मत करो,मेरे साथ चलो|’’ वह बुढ़िया वीरा को अपने घर  ले  गई| उसने वीरा को अपने घर से आग(अंगारे और राख) एक छलनी में दी| वीरा उस आग को लेकर अपने भाइयों की छान में पहुँच गई| कुछ देकर बाद बुढ़िया के घर में लम्बे-लम्बे बाल और नाख़ून वाला एक  आदमी आया| वह जोर से चिल्ला रहा था,’’मनख्या बॉस(यहाँ मनुष्य की गंध आ रही है)| बोलो! कहाँ है यहाँ आया मनुष्य?’’
 वह बुढ़िया का बेटा था| वह एक राक्षस था| बुढ़िया उससे बोली;यहाँ एक लडकी आग मांगने आई थी| मैंने उसे छलनी में आग दी है| जिस रास्ते वह गई होगी वहाँ छलनी से राख गिरी होगी|इसी राख को देखकर तुम उस लड़की के घर चले जाओ|’’
  राक्षस रास्ते में गिरी हुई राख को देखकर वीरा के भाइयों की छान में पहुँच गया| वीरा ने दरवाजा अन्दर से बंद कर रखा था| राक्षस दरवाजे के बाहर उसके भाइयों की आवाज में बोला,’’ वीरा बहिन! हम तुम्हारे सात भाई घर आ गए हैं| हमारे साथ हमारे सात कुत्ते  और सात बिल्लियां  भी हैं| दरवाजा खोलो|’’
  छान के दरवाजे के बगल पर एक चन्दन की डाली थी| राक्षस को देखकर वह बोली,’’ सावधान,वीरा बहिन! तुम्हारे सात  भाई सात कुत्ते और सात बिल्लियों सहित नहीं आये हैं| तुम्हारे दरवाजे के बाहर एक राक्षस खड़ा है| वह तुम्हारे भाइयों की आवाज में तुमसे झूठ बोल रहा है|’’
  चन्दन की डाली की बात को  सुनकर राक्षस को क्रोध आया|राक्षस ने चन्दन की डाली को तोडकर खा लिया| इसके बाद छानी का दरवाजा तोड़कर वह अन्दर आ गया| उसने वीरा को निगल लिया| चन्दन की डाली को खाने और वीरा को निगलने के बाद राक्षस को अणसनी(अधिक खाने के बाद पेट में भारीपन का अहसास ) लग गई| वह छानी के अंदर सो गया|
  शाम को वीरा के सात भाई अपने सात कुत्ते और सात बिल्लियों के साथ छान में पहुंचे तो राक्षस को वहाँ चित्त पड़ा हुआ देखकर वे सब समझ गए| सात कुत्तों और सात बिल्लियों ने राक्षस के पेट को फाड़ डाला| राक्षस के पेट से वीरा बाहर आ गई| वीरा के सात भाइयों ने राक्षस को अपनी छानी से कुछ नीचे गाड़ दिया| उन्होंने वीरा को समझाया,’’राक्षस के शरीर के जहरीले कांटे अभी भी वहाँ पड़े हैं| वहाँ कभी मत जाना| वे कांटे तुम्हारे हाथ-पैरों में चुभ सकते हैं|’’
  एक दिन वीरा के सातों भाई जंगल जा रखे थे| वह घर में अकेली ही थी| वह बालों में कंघी कर रही थी| अचानक उसके हाथ से कंघी छूटकर  गिर गई | वह कंघी लुढकते हुए वहाँ पहुँच गई जहाँ राक्षस को गाड़ रखा था| वहाँ से कंघी उठाने पर राक्षस के शरीर के जहरीले कांटे वीरा के पैरों में चुभ गए| वह दर्द से कराहने लगी| वह जैसे तैसे छानी के अंदर पहुँच गई और बेहोश हो गई|
  शाम को वीरा के सात भाई अपने सात कुत्तों और सात बिल्लियों के साथ छानी में पहुंचे| सात कुत्तों और सात  बिल्लियों ने वीरा के  पैरों को चाटा| इससे वीरा के पैरों में चुभे  कांटे निकल गए| वीरा अब ठीक हो गई|
  दूसरे दिन वीरा ने गरुड़ को याद किया| देखते-देखते गरुड़ वहाँ पहुँच गया| वीरा के सातों भाई और वीरा एक –एक कर गरुड़ के पंखों में बैठकर अपने गाँव चले गए| सातों भाई तथा वीरा को देखकर उसकी माँ दीपा बहुत खुश हुई |


     पुस्तक ‘उत्तराखंड की लोककथाएँ (काथ-कानी ,रात ब्याणी)

        खंड -2 लेखक –डॉ उमेश चमोला से 

युगवाणी में प्रकाशित व्यंग्य

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                     ----डॉ उमेश चमोला 

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रविवार, 16 अप्रैल 2017

नवल जनवरी -मार्च २०१७ समीक्षात्मक परिचय



नवल जनवरी –मार्च २०१७
समीक्षात्मक परिचय
संपादक –हरि मोहन ‘मोहन’
समीक्षक –डॉ उमेश चमोला
नवल का यह अंक लोककथा, कविता,लघुकथा और पुस्तक समीक्षा के साथ लोकसाहित्य  विषयवस्तु पर आधारित है.पत्रिका के मुखपृष्ठ पर  गढ़वाल चित्रकला शैली के जनक मंगतराम का चित्र दिया गया है.ज्ञात हो कि मंगत राम विश्व प्रसिद्ध चित्रकार,कवि और विचारक मौलाराम के पिता थे.अंक में प्रख्यात चित्रकार बी मोहन नेगी ने मंगतराम के जीवनवृत्त पर अपने आलेख में प्रकाश डाला है.पत्रिका का आंतरिक कवर पृष्ठ होली गीत ‘जो नर जीवें खेलें फाग,हो उर हो होलक रे’ को समर्पित है.अंतिम कवर पृष्ठ पर विरह गीत (डॉ अनुज प्रताप सिंह ),बोलना चाहती है औरत (लोकेश नवानी ),सुरा(प्रकाश चन्द्र फुलोरिया )तथा इन सुना दी (नरेन्द्र कठैत)कवितायेँ बी० मोहन० नेगी के चित्रों के साथ प्रस्तुत की गयी हैं.यह कवितायेँ स्त्री के मनोभावों,शराब के प्रयोग तथा वृक्षों के संरक्षण की भावभूमि पर आधारित हैं.सम्पादकीय में संपादक ने उत्तराखण्ड में संपन्न हुए चुनाव में उत्तराखण्ड की अस्मिता से जुड़े मूल मुद्दों जैसे गैरसेन राजधानी,बेरोजगारी,पलायन  आदि को चुनावी मुद्दे के रूप में न उठाये जाने के प्रति चिंता व्यक्त की है.सम्पादक के द्वारा जागर गायिका बसन्ती बिष्ट के बारे में दी गयी जानकारी भी ज्ञानवर्धक है.
 इस अंक में उत्तराखण्ड के लोकसाहित्य पर आधारित शोध आलेखों को विशिष्ठ स्थान दिया गया है.डॉ अमिता प्रकाश के शोध आलेख ‘गाथात्मक लोकसाहित्य में महाकाव्यीय पात्रों के चित्रण में उदाहरण देकर बताया गया है कि उत्तराखण्ड के लोकसाहित्य में यहाँ के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश का प्रभाव रामायण और महाभारत के पात्रों पर पड़ा है.इसलिए इनके कथात्मक स्वरूप और चरित्रों का मूल स्वरूप यहाँ  बदले रूप में देखने को  मिलता है.पवनेश ठकुराठी का शोध आलेख कुमाउनी कहानी :एक अध्ययन तथा डॉ विनोद कुमार सिंह बिष्ट का आलेख ‘गोपाल दत्त भट्ट  के कुमाउनी कविता संग्रहों की काव्य भाषा भी लोकसाहित्य के अध्येताओं के लिए उपयोगी लगा.डॉ हेम चन्द्र दुबे का आलेख ‘कुमाउनी कहावतो में लोक की सत्यानुभूति भी विचारपरक लगा.लोकभाषा,साहित्य एवं संस्कृति के संरक्षण के सन्दर्भ में डॉ प्रभा पन्त का आलेख समसामयिक लगा.
 इसके अतिरिक्ति धन सिंह मेहता’अनजान’ की कहानी ‘मोहरा’पहाड़ में चुनावी परिदृश्य की झलक दिखाने में सफल रहा.डॉ गोपाल नारायण आवटे की कहानी जीवन के व्यावहारिक पक्ष को दिखाती  है कि किस प्रकार रीतिरिवाज और हमारे व्यवहार व्यवसाय से संचालित हो रहे हैं.इसके अतिरिक्ति लघुकथाए भी अपना प्रभाव छोड़ने में सफल रही हैं.डॉ राम निवास ‘मानव’ की लघुकथा ‘एक और अभिमन्यु’ दिखाती है कि किस प्रकार निर्दोष व्यक्ति को झूठे अभियोग में फसाया जाता है.अन्य लघुकथाएं,कुमाउनी कविता और पुस्तक समीक्षा भी अंक की पठनीयता को बढाने में सहायक हैं.
पता –उत्तराखण्ड प्रेस रानीखेत रोड रामनगर नैनीताल २४४७१५
मूल्य -१५ रु प्रति,वार्षिक -६० रु द्विवार्षिक -१०० रु
संपर्क –९४१०३७३१५८,ई मेल navalpatrika@gmail.com

               

गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

शैक्षिक दखल में प्रकाशित शैक्षिक आलेख



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                      --------डॉ उमेश चमोला
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