सोमवार, 31 अगस्त 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 31, शोध से जुड़ी यादें

 

     वर्ष 1998 की बात है। अनुमोदन होने के बाद मैंने अपना शोध कार्य शुरू कर दिया था । मेरे पर्यवेक्षक सर ने मुझे निर्देशित किया कि मैं ‘संबंधित साहित्य के अध्ययन‘ के अंतर्गत कम से कम एक सौ शोध प्रतिवेदनो का अध्ययन करूं। इसमें कुछ पुराने भी हों और कुछ नवीनतम हों। इसके लिए मैंने मेरठ विश्वविद्यालय और एन.सी.ई.आर.टी. नई दिल्ली के पुस्तकालय जाने का निर्णय लिया । मैंने मेरठ में तीन -चार दिन रहकर लगभग चालीस शोध प्रतिवेदनो का अध्ययन कर इनसे संबंधित सूचनाएं डायरी में नोट कर दीं।  इसके बाद मुझे एन.सी.ई.आर.टी. नई दिल्ली जाना था । मैंने योजना बनाई कि मैं एन.सी.ई.आर.टी. के अतिथि गृह में तीन -चार दिन रुकूंगा । एन.सी.ई.आर.टी. के पुस्तकालय में काम पूरा करने के बाद घर वापस लौटूंगा । मैं सुबह साढ़े सात बजे के लगभग एन.सी.ई.आर.टी पहुंच गया । मैं बहुत थका हुआ था। अभी पुस्तकालय खुलने में भी समय था । मैं एन.सी.ई.आर.टी कैंपस के अंदर खाली मैदान की दूब में लेट गया । मैदान में लेटते हुए आसमान में चलते हुए हवाई जहाज मुझे दिखाई देने लगे। मेरी आंॅखें लग गई। कुछ देर बाद नींद खुली । मैंने सोचा कि अब मुझे अपने लिए आवास की व्यवस्था कर लेनी चाहिए । मैंने एन.सी.ई.आर.टी. के अतिथि गृह में पता किया तो जानकारी मिली कि वहांॅ एक सप्ताह तक कोई कमरा उपलब्ध नहीं है। अब मैंने सोचा कि मुझे एन.सी.ई.आर.टी. के निकट स्थित किसी होटल में रहने की व्यवस्था कर लेनी चाहिए । मैं एन.सी.ई.आर.टी. कैंपस से बाहर की ओर आ गया। काफी दूर चलने के बाद मुझे एक होटल दिखाई दिया । मैं उस होटल में गया । मैंने वहां रिसेप्सन में बताया कि मुझे तीन -चार दिन के लिए एक कमरा चाहिए। वहां एक सजी धजी महिला और कोट पैंन्ट पहने एक सज्जन बैठे हुए थे। मेरी बात को सुनकर वह बोले,‘‘ आप लक्की हैं। बस एक ही कमरा खाली है।‘‘ मैंने पूछा,‘‘कमरे का रेन्ट क्या होगा ?‘‘ वह बोले,‘‘ मात्र दो हजार तीन सौ पिचासी रुपए, एक दिन का।‘‘ कमरे का यह रेन्ट मेरे बजट से बाहर था । मैंने उन्हें  अपने मन की बात बताई। वह बोले, ‘‘ यहाॅ आपको सब सुविधाएं मिलेंगी।‘‘ मैं उस होटल से बाहर आ गया।  मुझे जोर की भूख लगी हुई थी । आगे चलने पर मुझे एक भोजनालय दिखाई दिया । मैं अन्दर बैठ गया । भोजनालय का एक कर्मचारी मेरे पास आकर बोला,‘‘आपको क्या खाना है ? मैंने पूछा, ‘‘ क्या -क्या है ?‘‘ उसने जो नाम बताए उसमें से मुझे ब्रेड पकोड़ा सही लगा । मैंने उसे बता दिया । वह बोला,‘‘ पहले काउंटर से टोकन ले लो ।‘‘ मैं काउंटर पर गया । वहां बैठे कर्मचारी ने मुझे टोकन दिया और कहा कि भोजन करने के बाद यहीं काउंटर पर जमा कर दें। उसने ब्रेड पकोड़े के एक सौ रुपए काट दिए। वह बोला, ‘‘ अब आपको ब्रेड पकोड़े का अलग से भुगतान नहीं करना पड़ेगा । टोकन के साथ ही ब्रेड पकोड़े का भुगतान भी काट लिया गया  है। उस ब्रेड पकोड़े ने मेरी भूख शांत करने के बजाए और बड़ा दी। मैं उस भोजनालय से बाहर आ गया । मैं सोचने लगा,‘‘ अब क्या किया जाए ? सारे रास्ते बंद होते जा रहे हैं। मैंने एक रिक्शा वाले से पूछा,‘‘ यहां कहीं पास में सही दाम में कोई कमरा मिलेगा ?‘‘ वह बोला, ‘‘ यहां सब महंगे कमरे हैं। गंगाराम हास्पिटल में मेरा कोई पहचान वाला है। मैं वहांॅ बात करके रात को बेंच में आपके लेटने की व्यवस्था करा सकता हूंॅ।‘‘ 

      मेरे दिमाग में एक विचार आया । आज जितना अधिक हो सकता है उतना काम एन.सी.ई.आऱ.टी. के पुस्तकालय में बैठकर किया जाए। इसके बाद रात की गाड़ी से चंडीगढ़ दीदी के यहां विश्राम करने जाऊंॅ। एक दिन वहांॅ विश्राम कर रात्रि वहां से दिल्ली के लिए चलूं। दिन भर एन.सी.ई.आर.टी. दिल्ली में काम करने के बाद रात की गाड़ी से उत्तराखण्ड वापस लौट चलूं। एन.सी.ई.आर.टी. पुस्तकालय आकर मैंने देर शाम तक कार्य किया । इसके बाद मैं बस से आइ.एस.बी.टी. आ गया । वहां से पी.सी.ओ में दीदी को चण्डीगढ़ आने की सूचना दे दी। इसके बाद बस में बैठकर सुबह चंडीगढ़ पहुंच गया। चंडीगढ़ पहुंच कर ऐसा लगा जैसा नया जीवन मिल गया है। नहाने धोने के बाद मैं आराम करने लगा । तीन -चार घंटे आराम करने के बाद मैंने जमकर भोजन किया । फिर मैं सो गया। शाम तक मेरी यात्रा की थकान मिट गई थी। मैंने रात की गाड़ी से फिर दिल्ली जाने का निर्णय लिया। मैं दिल्ली के लिए बस में बैठ गया। सुबह मैं दिल्ली पहुंच गया। मैंने दिन भर एन.सी.ई.आर.टी. पुस्तकालय में बैठकर अपना शेष कार्य निपटा लिया। रात को मैं आइ.एस.बी.टी. से उत्तराखंड की गाड़ी में बैठ गया। 

  जब भी मैं एन.सी.ई.आर.टी. की कार्यशाला, प्रशिक्षण या सेमिनार में भाग लेने जाता हूं तो  वह गुजरा हुआ समय मेरी आंॅखों में उतर आता है। 

 मैं इस निष्कर्ष पर पहुंॅचा कि जिस विषय पर शोध किया जाता है उसमें गहराई से उतरने का अवसर शोध के दौरान प्राप्त होता है। इसके अलावा जिन्दगी के व्यावहारिक पक्षों का विश्लेषण करने का भी मौका मिलता है। 


शनिवार, 15 अगस्त 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 30,

 

कुछ बातें, कुछ यादें 30,

    ट्रेन का छूट जाना

   ये वर्ष 2019 की बात है। मुझे किसी कार्य के सिलसिले में नैनीताल जाना था । उन दिनो डेंगू बुखार का प्रकोप चरम पर था । मुझे भी कुछ दिनो से तेज बुखार चल रहा था । मेरी इच्छा नैनीताल जाने की नहीं थी किन्तु वहांॅ जाना जरूरी था । आॅफिस से आने के बाद मैंने अपनी डेंगू और प्लेटलेट की जांच करवाई । जांच केन्द्र काफी भीड़ थी । एक घंटे में जांच का नंबर आ गया । मैं बहुत थक गया था । दो-तीन दिनो के बाद रिपोर्ट ने आना था । जांच कराने के बाद मैं रात को नैनीताल के लिए रवाना हो गया । मेरा हरिद्वार से काठगोदाम लिंक के लिए आरक्षण था ।  मैं लगभग 11 बजे हरिद्वार पहुंॅच गया । हरिद्वार रेलवे स्टेशन के डिस्प्ले बोर्ड पर काठगोदाम लिंक के हरिद्वार पहुंॅचने का समय 2 बजे लिखा हुआ था । मैंने सोचा अभी बहुत समय है। मैं थका हुआ तो था ही। मैंने रेलवे प्रतीक्षालय के अंदर अपने साथ लाई चादर बिछाई और मैं लेट गया । मुझे गहरी नींद आ गई । लगभग सवा बजे मेरी नींद खुली । मैंने सोचा, ‘‘ वैसे तो ट्रेन के आने का समय दो बजे है किन्तु एक बार बाहर चलकर देख लेता हूंॅ।‘‘ मैं उठकर अपना बैग पकड़ कर प्रतीक्षालय से बाहर की ओर आया। मेरे सामने ही काठगोदाम लिंक चली गई । मेरे मन में रेल के दो बजे पहुंॅचने का समय इतनी गहराई से अंकित था कि ट्रेन के जाते समय मैं सोच रहा था शायद डिब्बे इधर से उधर किए जा रहे होंगे। जब ट्रेन मेरी नजरों से ओझल हो गई तो तब मुझे सच्चाई का पता चल पाया । मैंने बस या कार का पता किया जो मुझे ट्रेन के पहुंॅचने से पहले लक्सर या नजीबाबाद तक पहुंॅचा दे  किन्तु कोई व्यवस्था नहीं हो पाई। अंततः रोडवेज बस से जाने का निर्णय लिया । पता किया तो किसी ने बताया कि सुबह 6 बजे रोडवेज बस मिलेगी। थोड़ी देर में एक हल्द्वानी तक की बस आती हुई दिखाई दी। मैंने पता किया कि क्या वह बस काठगोदाम लिंक से पहले मुझे नजीबाबाद पहुंॅचा सकती है ? उसने मना किया । अब मेरे पास उस बस से जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। मैंने उस बस से हल्द्वानी के लिए टिकट ले लिया। 

   जिन्दगी में उस ट्रेन की तरह हमें भी कई बार अवसर प्राप्त होते  हैं किन्तु किसी की गलत सलाह,  या  अन्य चूक के कारण हम उस अवसर को गंवा देते हैं।  गंवाया गया  वही अवसर फिर से प्राप्त नहीं हो पाता है ।

रविवार, 2 अगस्त 2020

पाठ्य और पाठ्येतर क्रियाकलापोंको तनु (dilute) करती हैं एस.सी.ई.आर.टी. उत्तराखण्ड द्वारा विकसित लोक संगीतमय डिजिटल अधिगम सामग्री -

 

समीक्षा - डाॅ. उमेश चमोला
विद्यालयों में आयोजित होने वाले समस्त क्रियाकलापों को समझने की दृष्टि से प्रमुखतः दो रूपों में बांटा जाता रहा है- पाठ्य क्रियाकलाप और पाठ्येतर क्रियाकलाप । पाठ्य क्रियाकलाप के अंतर्गत पठन -पाठन से संबंधित गतिविधियों को सम्मिलित किया जाता रहा है। यह पाठ्यक्रम को ध्यान में रखते हुए आयोजित की जाती हैं। अन्य क्रियाकलाप जैसे- सांस्कृतिक और साहित्यिक  क्रियाकलापों को पाठ्येतर अर्थात् पाठ्य क्रियाकलापों से इतर गतिविधियों के रूप में रखा जाता रहा है।  इसके अलावा पाठ्येतर क्रियाकलापों को पाठ्य सहगामी अर्थात् पठन- पाठन के साथ साथ चलाई जाने वाली गतिविधियों के रूप में परिभाषित किया जाता रहा है।  इन सभी क्रियाकलापों का उद्देश्य विद्यार्थी का सर्वांगीण विकास करना है। जिन क्रियाकलापों को पाठ्येतर या पाठ्य सहगामी के रूप में प्रयोग किया जाता रहा है वे भी पाठ्य क्रियाकलापों के रूप में नवाचारी शिक्षकों द्वारा वर्तमान समय में प्रयोग की जा रही हैं। इन गतिविधियों को पाठ्यक्रम में निर्धारित विषयवस्तु के शिक्षण का हिस्सा  बनाने से शिक्षण रोचक और उपलब्धिपूर्ण हो जाता है।  नौनिहालों के शैक्षिक विकास में व्यावहारिक रूप से सिद्ध इन्हीं शैक्षिक सिद्धांतों का क्रियान्वित रूप लगती हैं  राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् उत्तराखण्ड द्वारा समग्र शिक्षा के अंतर्गत गढ़वाली भाषा में विकसित लोक संगीतमय डिजिटल अधिगम सामग्री ।
   इसमें  उत्तराखण्ड के सामान्य ज्ञान से संबंधित विषयवस्तु पर आधारित 14 गीत तैयार किए गए हैं। ये चौदह गीत उत्तराखण्ड के प्रमुख नगर, जनजातियां, प्रमुख उत्सव एवं मेले, प्रमुख पर्यटन स्थल, धार्मिक स्थल,दर्रे,ग्लेशियर,पर्वत चोटियां, ताल एवं झील, नदियांॅ, वनस्पति एवं जन्तु, स्वतंत्रता संग्राम सैनानी एवं वीर सपूत, उत्तराखण्ड का इतिहास और उत्तराखण्ड की सूचनाएं जैसे विषयों पर लिखी गई हैं।
 इन गीतों को बच्चे आसानी से समझ पाएंगे क्योंकि गीतों में ठेठ गढ़वाली भाषा के शब्दों के स्थान पर हिन्दी के निकट की शब्दावली का प्रयोग किया गया है।  इसके साथ ही मूल गीत भी हिन्दी अनुवाद के साथ अलग से दिया गया है। गीत के चलते समय स्क्रीन पर गीत का हिन्दी अनुवाद भी साथ- साथ देखा जा सकता है।  प्रत्येक गीत में आए गढ़वाली भाषा के शब्दों का अलग से भी अर्थ स्पष्ट किया गया है।  हर गीत के लर्निंग आउटकम (अधिगम परिणाम ) भी दिए गए हैं । इन्हें प्राप्त करने के संदर्भ में गतिविधिपरक अभ्यास भी दिए गए हैं। इससे अधिगम संप्राप्ति के मूल्यांकन में सहायता प्राप्त होगी ।  इस आधार पर कहा जा सकता है कि पाठ्य और पाठ्येतर क्रियाकलापों के बीच की दीवार को तनु (dilute ) करने की दिशा में यह सार्थक प्रयास लगता है।
‘‘ हम रोजमर्रा के अनुभव से जानते हैं कि ज्यादातर बच्चे स्कूल की शिक्षा की शुरुआत से पहले ही भाषा की जटिलताओं और नियमों को आत्मसात कर पूर्ण भाषिक क्षमता रखते हैं।‘‘
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 में वर्णित यह कथन शिक्षण-अधिगम की प्रक्रिया में मातृभाषा के महत्व की ओर संकेत करता है। एस.सी.ई.आर.टी. उत्तराखण्ड द्वारा विकसित लोक संगीत आधारित डिजिटल सामग्री  बच्चों की मातृभाषा गढ़वाली में लिखी गई है।  उस भाषा में जिस भाषा से बच्चे का जुड़ाव जन्म से है। जो उसकी दुदबोली भी है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 मातृभाषाओं को प्रभावी समझ के लिए जरूरी मानती है। इसके अनुसार भाषाएं एक प्रकार के स्मृतिकोश का भी काम करती है। ये वे माध्यम भी हैं जिनसे अधिकतर ज्ञान का निर्माण होता है।  बच्चे की मातृभाषाओं को नकारना  या उनको मिटाने के प्रयास उसके व्यक्तित्व से हस्तक्षेप की तरह लगते हैं। प्रभावी समझ और भाषाओं के प्रयोग के माध्यम से बच्चे विचारों, व्यक्तियों और वस्तुओं तथा आस-पास के संसार से अपने आपको  जोड़ पाते हैं। (पाठ्यचर्या के क्षेत्र, स्कूल की अवस्थाएं और आकलन, एन.सी.एफ 2005 का दस्तावेज पृष्ठ 41 )
अतः शिक्षण - अधिगम प्रक्रिया को रुचिकर और उपलब्धिपूर्ण बनाने में इन गीतों की भूमिका स्पष्ट है। यह लोकसंगीत आधारित डिजिटल सामग्री एस.सी.ई.आर.टी. उत्तराखण्ड के यू ट्यूब चैनल में अपलोड की गई है। इसका उपयोग विद्यार्थी और शिक्षक विद्यालय के अलावा घर और अन्य स्थानो पर भी कर सकते हैं।  वर्तमान कोरोना काल में  इस सामग्री का मोबाइल के जरिए प्रयोग बच्चों द्वारा घर में भी किया जा सकता है। प्रतियोगितात्मक परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अध्येताओं के लिए भी यह गीत उपयोगी हैं।
 उत्तराखण्ड के सामान्य ज्ञान पर आधारित इन गीतों का संगीत कर्णप्रिय और गायक-गायिकाओं द्वारा इन्हें मधुर स्वरों में गाया गया है। इनमें हारमोनियम, तबला,ढोलक,ढोल, दमाऊ,मसकबाजा, खांकर, चिमटा,मरकस, घुंघरू,मोरछंग, हुड़का,भंकोर,एकतारा, डौंर और थाली का प्रयोग किया गया है। गीतों में छपेली, जागर, राधाखंडी और रैप शैली उपयोग में लाई गई है।  धुंयाल, मंडाण, वार्ता, कहरवा और खेमटा ताल में गीतों को निबद्ध किया गया है। विविध लोकवाद्यों के वादन, शैली और तालों के अद्भुत समन्वय ने इन गीतों को कर्णप्रिय और मनोहारी बना लिया है।
 इन गीतों की रचना और गायन उत्तराखण्ड विद्यालयी शिक्षा के शिक्षकों द्वारा किया गया है। गीतों को ओम बधाणी, डाॅ.शिवानी राणा चंदेल,डाॅ. बिन्दु नौटियाल और सुधा ममगांईं ने स्वर दिया है। कोरस गायन डाॅ. शिवानी राणा चंदेल, डाॅ. बिन्दु नौटियाल , सुधा ममगांईं ,मोहित कुमार उपाध्याय और ओम प्रकाश नौगरियाल ने किया है। गीतकारों के रूप में डाॅ. नंद किशोर हटवाल, डाॅ. प्रीतम अपछ्याण, गिरीश सुन्दरियालमनोरमा बत्र्वाल, डाॅ. उमेश चमोला, अवनीश उनियाल, ओम बधाणी, सुधीर बत्र्वाल, डाॅ. बिन्दु नौटियाल, धीशराज शाह,नवीन डिमरी ‘‘ बादल‘‘ धर्मेन्द्र नेगी और देवेश जोशी ने अपना योगदान दिया है।  गीतों का संगीत संयोजन रणजीत सिंह ने और अकादमिक निर्देशन, संपादन और संकलन डाॅ. नन्द किशोर हटवाल ने किया है। ये गीत  डाॅ. आर मीनाक्षी सुन्दरम, सचिव विद्यालयी शिक्षा के संरक्षण में सीमा जौनसारी निदेशक अकादमिक शोध एवं प्रशिक्षण उत्तराखंड के निर्देशन में तैयार किए गए है। समन्वयन अजय कुमार नौडियाल, अपरनिदेशक एस.सी.ई. आर.टी. उत्तराखण्ड तथा मार्गदर्शक मण्डल के सदस्य के रूप में प्रदीप कुमार रावत विभागाध्यक्ष पाठ्यक्रम एवं शोध विभाग तथा राय सिंह रावत उपनिदेशक, एस.सी.ई.आर.टी. उत्तराखण्ड ने अपना योगदान दिया है।

 नई शिक्षा नीति में भी मातृभाषाओं के महत्व पर बल दिया गया है | अत: नई शिक्षा नीति के दिशा निर्देशों को जमीनी स्तर पर उतारने की दिशा में भी यह प्रयास सार्थक सिद्ध होगा | ऐसी उम्मीद की जा सकती है | 







https://www.youtube.com/watch?v=Ov8kvpOB6E8&t=18s

शनिवार, 25 जुलाई 2020



पुस्तक समीक्षा       
              विचारों और भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति है ‘आंॅख्यों मा आंॅसू‘
दर्द ए दिल सुना जाते आंॅसूं,
आप बीती बतला जाते आंॅसू,
सुख-दुख का फर्ज निभा जाते आंॅसू,
प्रेम की परिभाषा समझा जाते आंॅसू।

 यह पंक्तियां जगदीश ‘ग्रामीण‘ की पुस्तक ‘आंख्यों मा आंॅसू‘ की कविता की पंक्तियांॅ हैं। पुस्तक का शीर्षक गढ़वाली भाषा में है। शीर्षक को देखकर  लगता है कि यह गढ़वाली भाषा में लिखे गए लेखों का संग्रह होगा या गढ़वाली गीत या कविता संकलन किन्तु  यह गढ़वाली भाषा में लिखे गए लेखों या गीत / कविताओं का संकलन नहीं है । इसमें लेखक ने लेख, कहानी,संस्मरण, विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े व्यक्तियों के जीवन परिचय,कवितायें, गढ़वाली गीत,श्लोक, गजल, दोहे और समाचार पत्र में प्रकाशित पत्रों को स्थान दिया  है।
   यह रचनाएंॅ लेखक की भक्ति भावना,राष्ट्रप्रेम, राजनीति, शिक्षा और साहित्य के प्रति अनुराग को दिखाती हैं। कहीं-कहीं पर व्यंग्य भी नजर आता है। यह पुस्तक एक रचनाकार की डायरी जैसी लगती है। मन में हिन्दी की कविता आ जाए उसमें लिख ली। गढ़वाली कविता सृजित हो गई तो उसे भी लिख लिया । हिन्दी व्यंग्य क्षणिकाओं को भी स्थान दे दिया । यह भावों और विचारों की ऐसी क्यारी के समान लगती है जिसमें अलग- अलग प्रकार के पौधों को रोपा गया हो। ऐसा लगता है जैसे लेखक ने अपनी डायरी को पुस्तक का रूप दे दिया है। 
 लेखक पुस्तक में  अलग-अलग विधाओं के रचनाकार के रूप में सामने आया है। इन सब में लेखक का साहित्यकार के बजाए पत्रकार का रूप अधिक प्रभावी लगता है जो जन मुद्दों को बड़ी सहजता से आगे रखता है। लेखक कुछ राजनेताओं पर भी व्यक्तिगत काव्यात्मक टिप्पणी से भी परहेज नहीं करता है। पुस्तक में संग्रहीत लेखक की गढ़वाली भाषा में लिखी गई रचनाएंॅ  संकेत देती हैं कि लेखक भविष्य में गढ़वाली भाषा में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सफल हो सकते हैं।
  लेखक की रचनाओं को पढ़कर लगता है कि सामाजिक मुद्दों के प्रति वह संवेदनशील है। इसलिए कलम उठाने को मजबूर है।  कवि के रूप में रचनाकार को  भाव और विचार पक्ष के साथ कला पक्ष की बारीकियों पर भी ध्यान एकाग्र करना होगा। यदि लेखक कविताओं  में अपनी बात सीधे सपाट न कहकर प्रतीकात्मक रूप में लिखे तो कवितायें अपना प्रभाव छोड़ने में अधिक सफल होंगी । लेखक को पुस्तक प्रकाशन के लिए हार्दिक बधाई । आशा है कि लेखक की भविष्य में विधावार अलग-अलग पुस्तकें सामने आएंगी ।
समीक्षक -  डाॅ. उमेश चमोला
 


बुधवार, 15 जुलाई 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 27, हीरो, एक्टर और सेलेब्रेटीज


    बचपन से ही मुझे फिल्में देखने का शौक था। उन दिनो कुछ लोग गांॅवों में वीडियो दिखाने लाते थे। वे चार -पांॅच फिल्मों के वीडियो लाकर सामूहिक रूप से दिखाते थे।  जब कक्षा 9 में राजकीय इंटर काॅलेज श्रीनगर  में प्रवेश लिया तो वहांॅ  बड़े पर्दे पर फिल्में देखने का अवसर प्राप्त हुआ । जब कोई फिल्म देखकर आते तो साथी लोग पूछते,‘‘ फिल्म कैसी थी ? इस फिल्म में हीरो कौन था ? हीरोइन कौन थी ?  गुण्डा कौन था ? उस समय हमें हीरो और एक्टर (अभिनेता)  तथा हीरोइन और एक्ट्रेस (अभिनेत्री) में क्या अंतर होता है ? यह पता नहीं था । जिसको भी इनके बीच के अंतर के बारे में पूछते वह यही कहता कि इनके बीच कोई अंतर नहीं है।
     बाद में कुछ समझ बनी तो ज्ञात हुआ कि हीरो फिल्म की कहानी का मुख्य पात्र होता है। उसके समानान्तर हीरोइन कहानी की मुख्य स्त्री पात्र होती है। जो कहानी के मुख्य पात्र का अभिनय करता है वह अभिनेता है। बाद में शिक्षक के रूप में जब बच्चों से यही प्रश्न पूछा तो बच्चों ने भी हीरो और अभिनेता को एक ही माना ।
    फिल्में हमारे दिलो दिमाग पर बहुत प्रभाव डालती हैं।  चाहे सामाजिक मुद्दों पर आधारित विचारोत्तेजक फिल्म हो, किसी महापुरुष के जीवन पर बनी हो , प्रेम कहानी या बदले की भावना पर आधारित हो । फिल्में हमें सोचने को भी मजबूर करती हैं और मुख्य रूप में हमारा मनोरंजन करती हैं। इसलिए फिल्मों के निर्माता-निर्देशक, संगीतकार, गायक-गायिकाओं के साथ अभिनेता और अभिनेत्री और पर्दे की पीछे भूमिका निभाने वाले  हमारा मनोरंजन करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते हैं। इसलिए अच्छी फिल्में बनाने वाले निर्माता  - निर्देशकों, अच्छा संगीत देने वाले संगीतकारों , अच्छे गाने लिखने वाले गीतकारों , अच्छा गायन करने वाले गायक-गायिकाओं के साथ ही अच्छा अभिनय करने वाले अभिनेता- अभिनेत्रियों की अभिनय कला की हमें सराहना अवश्य करनी चाहिए ।
   मुझे याद है एक बार एक बच्चा एक पुस्तक लेकर मेरे पास आया । वह बोला, ‘‘सर! इसमें लिखा हुआ है कि डंींजउं  ळंदकीप  पे  ीमतव  व ि छंजपवद ण् तो क्या महात्मा गांधी फिल्मों में काम करते थे ? तब मैंने उस बच्चे को हीरो - एक्टर और हीरोइन- एक्ट्रेस में अंतर समझाया । (अब तो स्त्री और पुरुष  पात्रों की भूमिका निभाने वालों के लिए कई जगह एक्टर शब्द ही प्रयोग में लाया जाता है )। उसे इतिहास के नायक -नायिकाओं के बारे में भी समझाया।
   हम प्रायः दैनिक जीवन में इतिहास और समाज के वास्तविक नायक-नायिकाओं को फिल्मों की कहानी के नायक- नायिकाओं की भूमिका निभाने वाले अभिनेताओं की तुलना में अधिक  महत्व नहीं देते हैं। हमारे समाज के लिए प्रतिबद्ध वैज्ञानिक, चिकित्सक, सैनिक, पुलिस, पत्रकार, साहित्यकार , सूचना अधिकार कार्यकर्ता आदि के बजाए फिल्म के अभिनेता- अभिनेत्रियों  को अपना आदर्श मान बैठते हैं। कई बार उनकी तरह चाल ढाल , हेयर स्टाइल और फैशन को अपनाते हैं और उन्हें ही सेलेब्रेटी के रूप में मान्यता देते हैं। उन्हें भगवान तक का दर्जा दे जाते हैं।

गुरुवार, 9 जुलाई 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 26, पर्यावरणीय शिक्षा पाठ्य सहगामी क्रियाकलाप तथा बणद्यो कि चिट्ठि पुस्तक सृजन से जुड़ी बातें






   जंगल से जुड़ी बचपन की कई यादें आज भी तरोताजा हैं। जंगल में जहां पर बहुत सारे सूखे पत्ते बिखरे पड़े होते, वहां से कोई गुजरता तो वह उन पत्तों को एक जगह पर जमा कर उनकी ढेरी बनाता । वह इस ढेरी के ऊपर एक पत्थर रखता । इसे  खड़पत्या देवता कहा जाता । यदि उस व्यक्ति के बाद कोई और उस रास्ते जाता तो वह खड़पत्या को श्रद्धा की दृष्टि से देखता । बात में पता चला कि यह जंगल में आग को लगने से बचाने का एक तरीका है। अगर किसी ने जलती हुई माचिस की तीली को जंगल में छोड़ दिया तो बिखरे हुए सूखे पत्तों से आगे जंगल के बहुत बड़े भाग में फैल सकती है। उस समय बच्चों के लिए आज की तरह मनोरंजन के साधन नहीं थे। इसलिए जब मवेशियों को चुगाने के लिए जंगल ले जाते तो बच्चे वहीं अपने मनोरंजन के साधनो की ढूंढ़ खोज करते ।  जंगल में कहीं पत्थर की चट्टान होती, उसमें ऊपर से बैठकर फिसलते हुए बच्चे नीचे की ओर आ जाते । यह रड़ाघूसी का खेल कहलाता । आजकल शहरों में पार्कों में रड़ाघूसी का आधुनिक वर्जन देखने को मिल जाता है। इसमें बच्चे ऊपर से फिसलकर नीचे की ओर आ जाते हैं  । लगातार रड़ाघूसी खेलने से पैंट, हाफ पैंट या पाजामा का पीछे का हिस्सा फट जाता । जंगल में मनोरंजन के लिए एक और साधन था । वह था चीड़ की लंबी टहनी लेकर कोई उसके पीछे के हिस्से में बैठ जाए और दूसरा व्यक्ति उसे चीड़ की पत्तियों के ऊपर से खींचकर  नीचे लाए । जंगल में अन्य पक्षियों के साथ कफ्फू और घुघुती पक्षी की आवाजें गूंजती थी । हम अपने दो हाथों को आपस में मिलाकर एक गुफा जैसा बनाते थे । फिर दोनो हाथों के अंगूठों के बीच की खाली जगह पर मुंह  से हवा फूंकते तो घुघुती और कफ्फू की आवाजें निकालते थे।  जब कफ्फू पक्षी कफ्फू- कफ्फू  की आवाज निकालता तो उसके साथ -साथ हम भी उसकी आवाज की नकल उतारते थे । तब वह और भी तेजी से कफ्फू- कफ्फू  की आवाज निकालता था । उस समय नई ब्याही गाय के दूध और आटे से जब हलवा बनाया जाता तो खाने से पहले स्थानीय देवता और वन देवता को भोग लगाया जाता था। पूजा पाठ के अवसर पर भी वन देवता का नाम अवश्य पुकारा जाता । कभी- कभी रात के अंधेरे में घर से बहुत दूर डांडे के जंगल में आग लगने से तरह-तरह की आकृतियां जैसे किसी देश का नक्शा आदि देखने को मिलती थी । गांव के जंगल में वनाग्नि से जले हुए पेड़-पौधे दिखाई देते तो बहुत बुरा लगता था । जंगल से जुड़ी ये यादें मस्तिष्क में तैरती रही । राजकीय इंटर कालेज लमगौण्डी में जब मुझे ईको क्लब प्रभारी के रूप में कार्य करने का अवसर मिला तो मैंने जंगल से संबंधित विषयवस्तु पर बच्चों के लिए कुछ नाटिकाएं, पर्यावरण संबंधी नारे, कविताएं और कुछ लोकगीत शैली पर आधारित गीत लिखे। वर्ष 2006 में एक दिन मैंने उत्तराखण्ड सेवा निधि पर्यावरण शिक्षा संस्थान अल्मोड़ा के निदेशक पद्म श्री प्राप्त डाॅ. ललित पाण्डे जी से पर्यावरण आधारित अपनी रचनाओं का जिक्र किया । मैंने यह भी कहा कि मैं इन्हें पुस्तक का रूप देना चाहता हूं । वे उत्तराखण्ड सेवा निधि से इस पुस्तक को प्रकाशित करने के लिए तैयार हो गए । यह पुस्तक पर्यावरण शिक्षा पाठ्य सहगामी क्रियाकलापनाम से प्रकाशित हुई थी ।

   वर्ष 2011 में पूना में आयोजित एक कार्यशाला में भ्रमण के लिए हमें गरुड़ामाची नामक स्थान के निकट के जंगल में ले जाया गया । जानकारी प्राप्त हुई कि यह जंगल देव वन‘   काली माता को अर्पित वन है।  जब लोगों को वन के संसाधनो की जरूरत होती है तो काली माता की पूजा के बाद इसे उपयोग के लिए खोला जाता है।  जब लगता है कि अब वन के पेड़-पौधों के संरक्षण की आवश्यकता है तो इसे फिर से बंद कर दिया जाता है। काली माता के भय से कोई जंगल के साधनो का प्रयोग नहीं करता है। ऐसे ही देववन की परंपरा उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़ जिले में भी है। तब मैंने तय किया कि देव वनकी थीम पर एक बाल नाटिका लिखी जानी चाहिए जिससे नई पीढ़ी को भी इन परंपराओं के बारे में जानकारी मिल सके । देववन, खड़पत्या, बणद्यो (वन देवता), जंगल की आग आदि विषयों पर मैंने गढ़वाली में बाल नाटिकाएं लिखी।  साथ ही झुमेलो गीत शैली पर आधारित एक पर्यावरण गीत लिखा । फिर उस पर एक गीत नाटिका तैयार की । इन सबका संकलन वर्ष 2018 में  बणद्यो कि चिट्ठिनाम से समय साक्ष्य देहरादून से प्रकाशित हुआ।


मंगलवार, 7 जुलाई 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 25, वो रात के ढाई बजे


     वर्ष 2014 की बात है  । मुझे भोजनमाताओं के प्रशिक्षण के अनुश्रवण के लिए बागेश्वर जाना था । मैं निर्धारित समय पर देहरादून से हल्द्वानी होते हुए बागेश्वर पहुंच गया । बागेश्वर विकासखडं में काम पूरा होने के बाद मैं कपकोट जाने के लिए एक ट्रैकर  में बैठ गया । ट्रैकर से उतरकर पैदल चलकर मैं बी.आर.सी कपकोट पहुंच गया । बी.आर.सी कपकोट खेतों के बीच स्थित है। मुझे वहां की स्थिति को देखकर बहुत  अच्छा लगा । हरे-भरे खेत और उनके बीच स्थित बी.आर.सी और स्कूल का भवन । वहां भोजनमाताओं से बातचीत के बाद मैं बागेश्वर की ओर चल पड़ा । मैंने बागेश्वर से हल्द्वानी पहुंचने के बारे में पता किया तो मालूम हुआ कि इस समय कोई गाड़ी नहीं मिलती  है। एक ट्रैकर के ड्राइवर ने  बताया कि वह गरुड़ जा रहे हैं। वहां से अल्मोड़ा जाने के लिए कोई न कोई बस/ट्रैकर मिल जाएगा । मैं उस जीप में गरुड़ के लिए बैठ गया । गरुड़ पहुंच कर पता चला कि एक ट्रैकर अल्मोड़ा तक जाने के लिए तैयार है बस दो-तीन सवारियों की कमी है। ड्राइवर ने प्रस्ताव रखा कि यदि सभी यात्री अधिक किराया दे तो वह अल्मोड़ा जा सकता है। सभी सवारी तैयार हो गए । अल्मोड़ा पहुंॅचने के बाद कार में बैठकर मैं हल्द्वानी पहुंच गया ।
     हल्द्वानी से हरिद्वार के लिए रोडवेज मैं बस में बैठ गया । बस मैं बैठते ही मुझे नींद आने लगी । किराया चुकता करने के बाद मैं सो गया । काफी दूर चलने के बाद गाड़ी को बहुत जोर का झटका लगा । झटके के बाद ऐसा लगा जैसे बस रेंगते हुए जा रही हो । मैंने बगल में बैठे एक व्यक्ति से पूछा, ‘‘ये बस ऐसे रेंगते हुए क्यों चल रही है ?‘‘ वह बोला,‘‘ बस बिना ड्राइवर के चल रही है। ‘‘ अचानक बस रुक गई। हमारी वाली गाड़ी के पीछे कुछ लोगों के रोने की आवाजें आ रही थी। अब पता चला कि जिस रोडवेज में हम बैठे हुए थे,  उससे सड़क के किनारे  खड़े एक ट्रक को टक्कर लग गई थी। टक्कर लगने से यह ट्रक सड़क के नीचे गड्ढे में गिर गया था । उसमें कांवड़ यात्री सवार थे। ट्रक को टक्कर मारने के बाद ड्राइवर बस से कूद कर भाग गया था । इसीलिए  बस बिना ड्राइवर के रेंगते हुए चल रही थी । आखिर हमारी बस रेंगते हुए चलने के बाद सड़क के किनारे रुक गई थी । वहांॅ सड़क के नीचे बहुत गहरी खाई थी । ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने बस को सुरक्षित स्थान पर सड़क के किनारे खड़ा कर दिया था । यदि बस में खाई में गिर जाती तो किसी के बचने का सवाल ही नहीं था।  बस के आगे का कांच टूट गया था । ड्राइवर के पीछे के सीट पर बैठे कुछ लोगों को गंभीर चोटें आई थी । सभी यात्री बस के अंदर से बाहर आने के लिए निकास द्वार की ओर आए तो पता चला कि टक्कर लगने के बाद यह दरवाजा बन्द हो गया है। इसी बीच ट्रक में सवार लोगों में से एक बस के बाहर आया । वह बस को ड्राइवर को बुरा भला कह रहा था । वह बोला,‘‘ मैं इस बस में बैठे लोगों को बाहर आने के लिए दस मिनट का समय दे रहा हूंॅ। इसके बाद मैं गाड़ी को आग लगा दूंगा ।‘‘ उसकी बात को सुनकर गाड़ी के अंदर अफरातफरी मच गई । ड्राइवर की खिड़की के रास्ते एक-एक कर सभी यात्री कूद कर बाहर आ गए । यह घटना रात को ढाई बजे के लगभग नगीना के पास हुई थी । इस घटना से मैं सोचने लगा,‘‘ जिन्दगी और मौत के बीच  एक महीन रेखा होती है। कब यह रेखा पार हो जाए ? कह नहीं सकते ।