शनिवार, 20 जून 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 18 - उपन्यास ‘कचाकि‘ से जुड़ी बातें


     गढ़वाल में बहुत पहले से तंत्र -मंत्र के प्रयोग के किस्से  सुनने को मिलते रहे हैं । हम बचपन में सुनते थे कि अमुक स्त्री का पति उसके वश में नहीं था । उसने कुछ कराया-खिलाया तो वह उसके वश में हो गया या फलां आदमी पर तंत्र-मंत्र का प्रयोग किया गया तो वह पागलों जैसा व्यवहार करने लगा है।  यह बातें तो सुनी सुनाई थी  परंतु वर्ष 2001 से 2003 के आस-पास मुझे तंत्र-मंत्र संबंधी विचित्र घटनाओं का सामना करना पड़ा । एक व्यक्ति मेरे साथ रहता था । उससे मेरा आत्मीय रिश्ता था । वह  बीच-बीच में अपने घर चला जाता था । उसके जाने के बाद मेरे कुछ कपड़े जैसे कमीज या कुर्ता मुझे ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलता था । जब वह  अपने घर से लौटकर मेरे पास आ जाता तो वह कपड़े उसके थैले में मिलते। उन कपड़ों पर पिठांई के निशान मिलते ।  कभी-कभी वह अपने घर से टूटे फूटे बरतन भी वहांॅ ले आता ।
   एक रात की बात है। मैं सो रखा था । आधी रात का समय था । उस व्यक्ति ने अपने थैले से एक काली डोरी निकाली । आधी रात को वह उस काली डोरी से मेरी लंबाई मापने लगा । मेरी नींद खुल गई । मैंने उससे कहा,‘‘यह क्या कर रहे हो ? ‘‘ वह बोला, ‘‘ मैं यह देखना चाहता था कि आप कितने लंबे हैं ?‘‘
 इस  घटना के कुछ दिनो के बाद उस व्यक्ति ने मुझसे कहा, ‘‘ चलो, आप और मैं कुछ दिनो के लिए मेरे घर चलते हैं ‘‘  मैं राजी हो गया । मैं उसके साथ उसके घर चला गया । मेरी आदत है कि मैं रात को कम से कम एक बार तो बाहर आता ही हूं । उस रात को भी मैं बाहर आया । मुझे अजीब सी आवाजें सुनाई दी । मैं आवाज की दिशा में आगे बढ़ा । मुझे यह आवाज एक कमरे से आती हुई लगी। मैं उस कमरे की खिड़की के पास खड़ा हो गया । खिड़की से अन्दर का दृश्य देखकर मैं अचंभित हो गया । वहां हवन चल रहा था । हवन कुण्ड के पास आटे से बनाई एक लंबी आकृति रखी हुई थी । हवन करवाने वाला व्यक्ति बोला,  ‘‘क्या यह पुतला उस आदमी की लंबाई के बराबर बनाया गया है ?‘‘
‘‘हां , मैंने डोरी से उसकी लंबाई अच्छी तरह नाप ली थी ।‘‘- मेरे साथ रहने वाला वह आदमी बोला ।
‘‘अब इस पुतले की प्राण प्रतिष्ठा करनी होगी । जिस पर टोणा मोणा कर रहे हो अब उसका, उसके माता-पिता और गोत्र का नाम बताओ।‘‘ - हवन करवाने वाला आदमी बोला ।
उसकी बात को सुनकर हवन कुण्ड के पास बैठा मेरे साथ रहने वाला वह आदमी मेरा, मेरे माता- पिता , गांॅव ,गोत्र आदि का नाम बोलने लगा । इसके बाद हवन कराने वाला जोर-जोर से कहने लगा, ‘‘ तुझे सब देवताओं का शाप लगेगा जो तूने (मेरा नाम लेकर) इसका और इसके घरवालों का विनाश नहीं किया । तू इनकी छासी नासी, पताळ बासी करा देना । तू नरक में रहेगा जो तूने कहीं अपना और हमारा नाम बताया ।‘‘
 एक बार फिर वह आदमी बोला, ‘‘ मैं गाय की पूंछ के बाल, खलड़ा, नाखून का चूरा और मुर्दा घाट की राख को मिक्स करके भी साथ लाया हूं । यह तुम्हें उसके खाने में मिलाकर 21 दिनो तक उसे खिलाना है। हां! श्मशान घाट की राख का टीका भी उस आदमी के कपाल पर 21 दिनो तक लगाना होगा। तुम्हारा काम हो जाएगा । अब देर मत करो । इस पुतले को चैराहे में दबाना है अभी ।‘‘
 जैसे ही वे आटे से बनाए मेरे पुतले को बाहर लाने लगे, मैं खिड़की की तरफ से दौड़कर अपने सोने के कमरे में चला गया । उन्हें पता नहीं चला कि मैंने उनका तंत्र प्रयोग देख लिया है। दूसरे दिन हम दोनो उनके घर से वापस आ गए । अपने घर में जब मैं सुबह नहाया । वह आदमी श्मशान घाट की उस राख को मेरे कपाल पर लगाते हुए बोला,‘‘ कल कोई केदारनाथ से आया था । वह इस बभूत को लाया था । तुम्हें 21 दिनो तक इसका टीका रोज लगाना होगा । ‘‘
  इस घटना ने मुझे तंत्र-मंत्र के बारे में सोचने पर विवश कर लिया था।  भले आधुनिक वैज्ञानिक युग मंे तंत्र-मंत्र महज एक अंधविश्वास है किन्तु  एक बात स्पष्ट है तंत्र-मंत्र करने वाला दूसरे के अनिष्ट की इच्छा रखता है। उसकी मंशा दूसरे को नुकसान पहुंॅचाने की रहती है।  वह व्यक्ति विश्वास करने योग्य नहीं होता है। तंत्र मंत्र में सफल न होने पर वह किसी और माध्यम से भी आपको नुकसान पहुंॅचा सकता है। तंत्र करने वाला व्यक्ति दूसरे का न खाने योग्य पदार्थ खिलाता है जो उसके शरीर में निश्चय ही विकार पैदा करेंगे।
  अपने साथ घटी इन घटनाओं को आधार बनाकर मैंने कचाकिउपन्यास लिखा । यह सन 2014 में प्रकाशित हुआ । इस उपन्यास में खलनायिका के रूप में मासंतीपात्र द्वारा अपनी सौतेली बेटी के पति पर तंत्र-मंत्र का प्रयोग किया जाता है।  इस उपन्यास की समीक्षा डाॅ. नंद किशोर ढौंडियाल अरुण‘, डाॅ. नागेन्द्र जगूड़ी नीलांबरमऔर श्री भीष्म कुकरेती द्वारा की गई । इस उपन्यास में मैंने अपने द्वारा खिड़की से देखी गई तांत्रिक प्रक्रियाओं का वर्णन उपन्यास के नायक प्रभातके माध्यम से किया था । डाॅ. नागेन्द्र जगूड़ी नीलांबरम ने उत्तराखण्ड स्वरपत्रिका में इस उपन्यास की समीक्षा करते हुए लिखा था कि पहले उन्हें लगा कि उपन्यासकार द्वारा तंत्र प्रयोग के इस दृश्य को उपन्यास में नहीं दिखाना चाहिए था किन्तु पूरा उपन्यास पढ़ने के बाद उन्हें लगा कि यह दिखाना जरूरी था ।    


शनिवार, 13 जून 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 17 - ‘पथ्यला‘ (गीत -कविता संग्रह) में प्रकाशित गीत ‘उत्तराखण्ड बणी गाई‘ से जुड़ी यादें


वर्ष 1998 की बात है । मुझे अपने शोध के सिलसिले में मेरठ विश्वविद्यालय जाना था । मैं शाम को मेरठ पहुंचा । एक होटल में विश्राम करने के बाद मैं सुबह मेरठ विश्वविद्यालय की तरफ चला गया । मुझे जोर की भूख लगी हुई थी । विश्वविद्यालय से बाहर कुछ दूरी पर एक छोटा होटल था । मैंने सोचा,‘‘पहले जमकर नाश्ता कर लूं। इसके बाद विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में जाकर अपने शोध से संबंधित कार्य करूंगा । मैंने होटल में भोजन के बारे मे पता किया । होटल के मालिक ने मुझसे बातचीत की । उसने मुझे मेरठ आने का उद्देश्य पूछा । उसने मुझे यह भी सुझाव दिया कि यदि मैं चाहूं तो विश्वविद्यालय में काम होने तक अपना बैग होटल में रख सकता हूं । बातों -बातों में जब उसे पता चला कि मैं उत्तराखण्ड का रहने वाला हूं । उसने मुझे बताया कि उसके होटल में एक कर्मचारी उत्तराखण्ड का है। उसने उसको आवाज दी । वह दौड़ा -दौड़ा आया । उसने मुझसे पूछा, ‘‘ तुम कखा छन?‘‘ मैंने कहा, ‘‘ रुद्रप्रयाग जिला कु रौण वाळु छौं ‘‘  वह बड़ी आत्मीयता से मुझसे उत्तराखण्ड के मौसम, खेती आदि के बारे में बात करने लगा । वह मुझे पीने के लिए ठण्डा पानी लाया । होटल में अन्य लोग भी खाने के लिए आए थे किन्तु उसका ध्यान  मेरी ही ओर था । नाश्ता करने के बाद मैं विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में चला गया । वहां मैंने लगभग दो बजे तक अपना काम किया । इसके बाद मैं दिन के भोजन के लिए उसी होटल में चला गया । दिन के भोजन के बाद मैंने बचा हुआ काम शाम तक पूरा कर लिया । इसके बाद रात को मैं उत्तराखण्ड वाली बस में बैठ गया ।
    मेरे मन में होटल का वह दोस्त घूमने लगा । मैं सोचने लगा कि यदि उत्तराखण्ड अलग राज्य के रूप में बन गया तो क्या इस दोस्त जैसे होटल में काम करने वाले लोग रोजगार के लिए उत्तराखण्ड वापस लौट आएंगे ? मेरे दिमाग में एक गीत की थीम आ गई । कोई व्यक्ति होटल में उत्तराखण्ड से बाहर नौकरी कर रहा है। इसी बीच उत्तराखण्ड राज्य के गठन की घोषणा हो जाती है।  यह सुनकर होटल में काम करने वाला वह युवक प्रसन्न हो जाता है। वह खुशी में अपनी मांॅ को एक चिट्ठी लिखता है। इस चिट्ठी में वह प्रवासी जीवन की कठिनाइयों और अपने रोजगार की परेशानियों का जिक्र करता है। वह आशा व्यक्त करता है कि अब उत्तराखण्ड अलग राज्य के रूप में बनने वाला है। इसलिए उसके खौरी (विपत्ति) के दिन समाप्त होने वाले हैं। वह अपनी रोजी रोटी के लिए अपने गांॅव वापस आने का विचार  करता है। मैंने इस थीम पर छह- सात गीतांश तैयार कर लिए । यह गीत पथ्यलागीत-कविता संग्रह में प्रकाशित हुआ था। गीतों की समीक्षा की श्रृंखला के अंतर्गत रंत रैबारमें श्री ईश्वरी प्रसाद उनियाल जी द्वारा लिखी इस गीत की समीक्षा प्रकाशित  हुई ।  उन्होंने इस समीक्षा में उत्तराखण्ड निर्माण के इतने दिनो के बाद भी यहां
रोजगार के अवसर पैदा होने के बजाए निरंतर होेते पलायन पर चिन्ता प्रकट की । इस पोस्ट के साथ श्री ईश्वरी प्रसाद उनियाल जी द्वारा लिखी गई समीक्षा भी दी गई है।


शुक्रवार, 12 जून 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 16 - ‘पथ्यला‘ (गीत -कविता संग्रह) के शीर्षक गीत/कविता से जुड़ी यादें





मित्र कई बार पूछते हैं, ‘‘ आप क्यों लिखते हो ? लिखा है तो इसी विषय पर क्यों लिखा है ? ‘‘ जब लेखक के आस-पास कोई ऐसी घटना घटित होती है जो उसे अन्दर से झकझोर देती है तो कविता के रूप में एक भावधारा कागज पर उतर आती है। जब वह बहुत अधिक आनंदित होता है तब भी ऐसी स्थिति आ सकती है। कवि की दृष्टि मामूली सी समझी जाने वाली घटना में भी ऐसी स्थिति देखकर महसूस कर सकती है।
कई बार ऐसी स्थिति भी आती है जब किसी पत्र-पत्रिका के संपादक या किसी कार्यक्रम के आयोजक का संदेश प्राप्त होता है कि अमुक विषय पर इस तारीख तक कोई कविता भेज दीजिए । ऐसे में यदि रचनाकार के पास पहले से बनी कोई कविता न हो तो उसे बैठकर और सोच समझ कर दिए गए विषय पर कविता रचनी पड़ती है। इस प्रकार लिखी गई कविता से वह आत्म संतुष्टि और आनन्द प्राप्त नहीं होता जो किसी घटना को देखते हुए स्वतः जन्म लेती है।
  यहांॅ पर संदर्भ है मेरे गढ़वाली गीत कविता संग्रह पथ्यलाके शीर्षक गीत /कविता हम पथ्यला बौण का। बात वर्ष  2000 की है। मैं राजकीय इण्टर काॅलेज लमगौण्डी जिला रुद्रप्रयाग में कार्यरत था । बोर्ड परीक्षा के समय मूल्यांकन पुस्तिकाओं का बण्डल संकलन केन्द्र राजकीय इण्टर काॅलेज अगस्त्यमुनि में जमा करना पड़ता था । लमगौण्डी से अगस्त्यमुनि जाने के दो रास्ते थे। एक था लमगौण्डी से जीप में बैठकर गुप्तकाशी जाने का । वहां से जीप या बस से अगस्त्यमुनि पहुंचने का  । दूसरा  लमगौण्डी से कुण्ड जंगल से होकर पैदल   रास्ता था । लमगौण्डी से गुप्तकाशी वाले रास्ते दिन के समय जीपें कम मिलती थी । इसलिए मुझे यह  पैदल वाला रास्ता अधिक सुविधाजनक लगता था । मैं प्रायः इसी रास्ते से कुण्ड आकर अगस्त्यमुुनि वाली बस मैं बैठकर अगस्त्यमुनि पहुंॅच जाता था । लमगौण्डी से कुण्ड पैदल रास्ता घने जंगल से होकर गुजरता है। यह रास्ता बहुत सुनसान था । भरी दोपहर में जंगल में पक्षियों और झींगुर की आवाज जंगल में गूंजती रहती थी । हवा की सनसनाहट जंगल के सन्नाटे को और भी बड़ा देती  थी । इस सुनसान जंगल का रास्ता सूखे पत्तों से भरा रहता था । मैं इस रास्ते मूल्यांकन की पुस्तिकाओं के बण्डल लेकर जा रहा था । मैं इन पत्तों के बीच मैं अचानक फिसल गया । इस समय मेरे मन में यह पंक्तियां आईं-
  ‘‘ ठौर नी ठिंगणू नी,
    बथों चै जख लिजौ,
    कैका खुट्योन कुर्चि जौं,
    बट्वे रौड़ु गाळि खौं,
    अपणि छ्वीं लगौण क्या,
    हम पथ्यला बौण का ।‘‘

 यह पंक्तियां मैंने झटपट अपनी जेब में रखे कागज पर नोट कर दी । संकलन केन्द्र में बण्डल जमा करने के बाद अगस्त्यमुनि से गुप्तकाशी पहुंचते -पहुंचते बस में इस कविता के 6-7 पद्यांश तैयार हो गए । घर आकर शाम को मैंने इन्हें डायरी में व्यवस्थित रूप से नोट कर दिया ।  बाद में सन् 2011 में प्रकाशित गढ़वाली गीत कविता संग्रह पथ्यलामें यह रचना शीर्षक गीत /कविता के रूप में सम्मिलित की गई। रंत रैबारमें श्री ईश्वरी प्रसाद उनियाल जी ने इस पुस्तक में दिए गए  हर गीत की अलग-अलग समीक्षा लिखी । उन्होंने हम पथ्यला बौण का गीत को विकास रूपी आंधी से हुए पलायन की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति लिखा ।


शनिवार, 16 मई 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 15
 भांति - भांति के बिछुड़े दोस्त
  आज  जबकि लाॅक डाउन में दूरदर्शन  द्वारा बीते जमाने के सीरियल दिखाए जा रहे हैं। लोग अपने बीस साल पुरानी फोटो फेसबुक पर दिखा रहे हैं,  ऐसे समय में मुझे भी अपने विद्यार्थी जीवन के दोस्तों की बहुत याद आ रही है । इन दोस्तों के गुणों के आधार पर मैं इन्हें इस प्रकार वर्गीकृत करने का प्रयास कर रहा हूंॅ-
1- रुपए उधार ले जाने वाले दोस्त -
  मुझे  कुछ उन दोस्तों की बहुत याद आ रही है जिनका काम रुपया उधार लेना था । जैसे उनसे मुलाकात होती , वे कहते, ‘‘ यार! तुम्हारे जेब में कुछ रुपए पड़े हैं ? अर्जेन्ट काम के लिए चाहिए थे।  बस मैं तुझे कल लौटा दूंगा ।‘‘ रुपया ले जाने के बाद इनका कल कभी नहीं आता था । इस श्रेणी के कुछ दोस्तों की रुपया उधार मांगने की शैली अलग थी । वे कहते,‘‘ यार! मैं 20 तारीख से पहले तेरे सारे पैंसे लौटा दूंगा । 20 तारीख से एक या दो दिन पहले से वे अपना चेहरा दिखाना बन्द कर देते थे। एक महीने के बाद वे अचानक प्रकट हो जाते। वे इस ढंग से बात करते जैसे वे उधार ले ही नहीं गए हों। बातों -बातों में वे टटोलते कि इसे अपने दिए रुपयों की याद है या नहीं । अगर उन्हें पक्का यकीन हो जाता कि यह पुराना उधार भूल गया है तो वह 10-15 दिन के बाद फिर  से उधार मांगते। उन्हें याद दिला दी जाती कि उन्होंने तो अभी पुराना उधार भी चुकता नहीं किया है तो वे कहते,‘‘ अरे! तेरे रुपए कहीं नहीं जाते दो तीन दिन में दे दूंगा । उनके दो तीन दिन कितने लंबे होते । इसका अनुमान लगाना बड़ा कठिन था ।
2- पार्टी करवाने  वाले दोस्त -
 कुछ दोस्त ऐसे भी याद आ रहे हैं जो हमेशा ताक पर रहते थे कब पार्टी करवाकर किसी दोस्त की जेब ढीली करवाई जाए । एक दिन मेरे एक दोस्त ने मुझसे कहा, ‘‘यार! मुझे पार्टी दे दे । मैंने कहा, ‘‘ इस समय मेरे पास रुपए नहीं हैं।‘‘  वह बोला, ‘‘ यार ! तेरा ये दोस्त कब काम आएगा ? मैं तुझे उधार देता हूंॅ। उधार के इन रुपयों से तू मेरी पार्टी करवा दे। मेरा उधार दो -तीन दिन में चुकता कर देना ।‘‘
   एक बार मुझे वाद विवाद प्रतियोगिता में 1000 रु की धनराशि प्राप्त हुई । जैसे ही मेरे मित्रों को इस बात की भनक लगी, उन्होंने इन रुपयों को खर्च करने की योजना बना ली । एक दोस्त बोला,‘‘ यार! चल घूमने चलते हैं। मैं उसकी बातों में आ गया । उसके साथ मेरे तीन चार दोस्त भी शामिल हो गए । वे जानबूझ कर होटल की ओर घूमने जाने लगे । जैसे ही हम होटल के सामने पहुंॅचे  एक दोस्त बोला, ‘‘ आज की पार्टी तो चमोला की तरफ से होगी । 1000 रु इनाम में जो मिले हैं। मैंने कहा, ‘‘ मैं चाहता था कि डिबेट के समय तुम लोग भी वहांॅ रहकर मेरा उत्साह बढ़ाते किन्तु तुम में से कोई भी दोस्त  वहांॅ नहीं था । वहांॅ आने के बजाए तुम लोगों ने क्रिकेट मैच देखना अधिक जरूरी समझा । मैं ऐसे दोस्तों को पार्टी कराना उचित नहीं समझता । ऐसे ही दोस्तों से तंग आकर एक मित्र ने नया तरीका खोज लिया ।
जब कोई दोस्त उससे पार्टी करवाने को कहते तो वह मना नहीं करता । वह उनके साथ  होटल चला जाता । जब होटल में चाय समोसा आदि का आर्डर दिया जाता तो वह चुपचाप खिसक जाता । पार्टी का बिल उन्हीं में से किसी एक को चुकता करना पड़ता ।
3- किताब मांगकर न लौटाने   वाले दोस्त -
कुछ दोस्त वह भी याद आ रहे हैं जो एक भी पुस्तक नहीं खरीदते थे लेकिन उनका घर किताबों से भरा रहता । वे अलग-अलग दोस्तों से अलग -अलग किताब मांग कर ले जाते थे। जिससे वे किताब मांगते उससे कहते,‘‘मैं एक -दो दिन में तुम्हारी किताब लौटा लूंगा । किताब मांग कर ले जाने वाले ये दोस्त किताबें कभी नहीं लौटाते । इनको पुस्तक देने वाले को नई पुस्तक खरीदनी ही पड़ती ।
4- पै्रक्टिकल की कापी  मांगकर ले जाने     वाले दोस्त -
 कुछ दोस्त ऐसे भी थे जिनका कक्षाओं में आना जाना कम रहता था । वे परीक्षा से कुछ दिन पहले  प्रैक्टीकल की काॅपी मांग कर ले जाते । इनसे मांगी गई काॅपी को प्राप्त करना टेड़ी खीर था । जब इनसे काॅपी मांगते तो ये कहते शाम को मेरे कमरे में आ जाना । मैं तुझे काॅपी लौटा दूंगा । शाम को बताए गए समय पर इनके कमरे में जाओ तो वहांॅ ताला लटका मिलता ।

5-  नोट्स मांगकर ले जाने     वाले दोस्त -

कुछ दोस्त ऐसे थे  साल भर सड़कों पर घूमते हुए दिखाई देते थे। परीक्षा से कुछ समय पहले ये नोट्स मांगने के लिए बार -बार कमरे का चक्कर काटते। एक बार इनको नोट्स दे दो तो नोट्स के वापस न आने की गारंटी होती ।
 
6-  अपने कमरे  में  खाना  न  खाने  वाले दोस्त -
 कुछ दोस्त इतने सर्वप्रिय होते थे कि वे बारी-बारी से अलग- अलग दोस्तों के यहांॅ खाना खाते थे। इनका  फ्रैण्ड सर्किल इतना बड़ा होता  था कि महीनो तक उनका ऐसे ही काम चल जाता था ।
7-  गप मारकर जाने   वाले दोस्त -
 कुछ मित्र अन्य मित्रों के यहांॅ तब पहुंॅचते जब वे पढ़ाई कर रहे होते। उस समय वे गप्पें लड़ाते थे। ऐसे दोस्तों के कई बार परीक्षा में अच्छे अंक आते। जब लोगों का सोने का समय होता तो वे  तब पढ़ाई करते । ऐसे दोस्त छात्रावास में अधिक संख्या में पाए जाते थे।
8-  जुगाड़  से फिल्म देखने    वाले दोस्त -
  कुछ दोस्त  दृढ़ संकल्प के धनी होते कि चाहे कुछ हो जाए वे पिक्चर हाॅल में फिल्म अपने पैसों से नहीं देखेंगे। इनका फिल्म देखने के लिए जुगाड़ भिड़ाने का अनूठा तरीका था । या तो वे किसी सीदे सादे दोस्त से कहते,‘‘ यार! मुझे फिल्म दिखा दे। ‘‘ यदि वह तैयार नहीं हुआ तो वे सीधे पिक्चर हाॅल पहुंॅच जाते, वहांॅ टिकट की लाइन में देखते कि कोई दोस्त टिकट खरीदने के लिए खड़ा तो नहीं है। यदि कोई दोस्त दिखाई देता तो वे उससे कहते,‘‘यार! एक टिकट मेरे लिए भी खरीद लेना । तेरे पैसें बाद में दे दूंगा । ‘‘ वे टिकट के पैसें कभी नहीं देते ।

9-  शराब पीने की आदत डलवाने     वाले दोस्त-
कई दोस्त ऐसे होते जो किसी विशेष मौके, पार्टी आदि के समय उन दोस्तों को भी बुलाते जो शराब नहीं पीते । वे शराब पीने वाले किसी दोस्त से कहते,‘‘ देख लेना आज फलां ( शराब न पीने वाले) को जबरदस्ती शराब पिला कर रहूंगा ।‘‘ ऐसे दोस्त जब उसे शराब पिलाने में सफल होते तो अपने कार्य की स्वयं प्रशंसा करते हुए कहते, ‘‘ वो तो शराब पर हाथ थी नहीं लगाता था मैंने उसे शराब पिलाना सिखाया । जब वह शराब पीने के लिए मना करता तो वे दोस्ती की कसम खिला देते ।

10- किसी दोस्त के पास कोई अच्छी देखकर उससे मांगने    वाले दोस्त-
  कुछ दोस्त  ऐसे  भी थे जो किसी दोस्त के पास कोई चीज देखते तो तुरंत कहते, ‘‘यह चीज कहांॅ से लाए ? इसे मुझे दे दो।
ये दोस्त विशेष प्रकार के दोस्त हैं ।  इनके अलावा अन्य  दोस्तों का जिक्र यहांॅ आने से रह गया हो तो वे क्षमा करेंगे । वे दोस्त दिल के अंदर आज भी हैं।
 इन  सभी दोस्तों को कोटि -कोटि नमन।


शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 14 आंशिक आवासीय छात्रावास और मैस मोनिटरी



  एक दौर वह था जब कक्षा 8 के बाद एकीकृत परीक्षा उत्तीर्ण करना एक बड़ी उपलब्धि माना जाता था । एकीकृत परीक्षा में पूछे जाने वाले उच्च स्तरीय होते थे
  एकीकृत परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद श्रीनगर स्थित आवासीय छात्रावास में प्रवेश मिलता था । कक्षा 9 में जब हमने यहाँ  प्रवेश लिया तो तीन -चार महीने तक  घर की बहुत याद आती
थी । जब कोई अभिभावक कभी मिलने को आते तो यह यादें दुगुनी हो जाती थी । इसका कारण एक तो घर के सदस्यों से दूर रहना और दूसरा सीनियर छात्रों की अपेक्षा रहती थी कि जूनियर होने नाते हम विनम्र और अनुशासित रहें । हम बीच – बीच में घर चिट्ठी भी भेजते
थे | यहाँ  सीनियर छात्रों को भाई साहब कहा जाता था । छात्रावास अधीक्षक की ही तरह  भाई साहब लोगों के सामने जाने में भी झेंप  और सम्मान का भाव होता था। अनुशासन बनाए रखने की यह अद्भुत परंपरा थी । कुछ महीनो के बाद हमें  घर जैसा वातावरण ही लगने लगा । बाद में तो छुट्टियों में भी यहाँ  रहने का मन करता था ।
   शिक्षा के उद्देश्यों में से एक प्रमुख उद्देश्य बच्चों में नेतृत्व क्षमता और समस्या समाधान के कौशल का विकास करना भी है । बच्चों में नेतृत्व गुणो के विकास के लिए इस छात्रावास में मैस मोनिटरिंग की व्यवस्था लागू थी । इसके अंतर्गत हर माह दो छात्रावासियों को एक महीने के लिए मैस मोनिटर का दायित्व निभाना होता था । एक मोनिटर को मैस से संबंधित खर्चे, बिल आदि का रजिस्टर में विवरण तैयार करना होता था । दूसरे का काम दुकानदार से समन्वयन कर सामान को छात्रावास तक पहुंचाना होता था । छात्रावास के भोजन सामग्री के स्टोर की चाबियां मैस मोनिटर के पास ही रहती थी । उन्हीं की उपस्थिति में खाना तैयार करने वालों को भोजन बनाने के लिए राशन दिया जाता था । मैस मोनिटर की जिम्मेदारी कक्षा 11 के छात्रों को ही दी जाती थी । कक्षा 10 और 12 के छात्रों को इससे मुक्त रखा जाता था । विशेष परिस्थितियों में 12 और 10 के छात्रों को सत्र के शुरुआती महीनो में ही यह जिम्मेदारी दी जाती थी । जब हम कक्षा 9 में पढ़ते थे तो हम कल्पना करते थे कि मैस मोनिटरिंग का कार्य कितना कठिन होता होगा ? जब कक्षा 11 में हमें यह जिम्मेदारी मिली तो हमें इसमें आनन्द आने
लगा । इससे जिम्मेदारी लेने, प्रबंधन और नेतृत्व गुणो के विकास के साथ ही आत्मविश्वास भी जाग्रत हुआ ।
   मुझे याद है एक बार जब मैं मैस मोनिटर था । सुबह जैसे ही मैंने स्टोर का ताला खुला  और खाना बनाने वालों को चायपत्ती, चीनी और मिल्क पाउडर दिया । उसी समय स्टोर के अंदर एक जूनियर भाई आकर बोला,  ‘‘भाई साहब! पाउडर और चीनी ।‘‘ ‘‘मतलब‘‘ ? -मैंने कहा। वह नजर झुकाए सकुचाते हुए बोला, ‘‘ खाने के लिए चाहिए ।‘‘
मैंने उसे एक मुट्ठी के बराबर चीनी और कुछ पाउडर देते हुए कहा, ‘‘ ठीक है । ले लो। रोज-रोज मत आना ।‘‘
 उसने पाउडर और चीनी को हाथ में रखकर मिला दिया और मुँह  में रख दिया । इसके बाद एक गिलास पानी पी दिया ।
 मैस मोनिटर का यह काम भी होता था कि वह देखे कि कोई नाश्ता दुबारा तो नहीं ले  रहा
है ?  एक दिन मेरे और एक सहपाठी के बीच शर्त लगी । मैंने कहा, ‘‘मैं आज दुबारा नाश्ता करके रहूंगा ।‘‘  मैं एक बार नाश्ता लेने के बाद फिर से नाश्ता लेने लगा । मैस मोनिटर भाई साहब ने मुझसे कहा, ‘‘ तू तो पहले भी नाश्ता कर चुका है । मैंने कहा,‘‘ भाई साहब! मेरा नाश्ता गिर गया है।‘‘  उस दिन नाश्ते में पाकीजा लाया गया था । उन्होंने मुझे एक पाकीजा और दिला दिया   । शर्त लगाने वाले मेरे सहपाठी को जब यह पता लगा कि यह दुबारा नाश्ता प्राप्त करने में सफल रहा तो उसने मैस मोनिटर भाई साहब से मेरी शिकायत कर दी । उन्होंने मुझे और मेरे उस दोस्त को अपने पास बुलाया । मेरे दोस्त ने शिकायत करते हुए भाई साहब से कहा, ‘‘ इसका नाश्ता गिरा नहीं था । इसने झूठ बोला था ।‘‘
 उन्होंने मुझसे कहा, ‘‘ तुमने झूठ क्यों बोला ?‘‘ मैंने कहा, ‘‘ भाई साहब मेरा नाश्ता सचमुच गिर गया था । यह जमीन में नहीं गिरा था । यह मेरे दूध के गिलास में गिर गया था।‘‘  मेरी बात को सुनकर भाई साहब ने  मुझे डांटने के बजाय जोर से ठहाका लगाया। 


शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

इतिहास लिख रहा है कोरोना - रचना डॉ. उमेश चमोला


इतिहास लिख रहा है कोरोना ,
इसमें कुछ उजले पन्ने भी होंगे
जिनमे मानवता की रक्षा में तत्पर
लोगों का जिक्र किया जाएगा ,
इतिहास उन्हें विस्मृत होने नहीं देगा ,
आने वाली पीढी उन पन्नो को
सम्मान भरी नजरों से देखेंगी ,
कुछ ऐसे पन्ने भी होंगे
जब भी वे टटोले जाएंगे
पढ़ने वालों की  आँखों में इतिहास के 
इस    कालखंड का स्याह पक्ष उतर जाएगा ,
उन्हें लगेगा इतिहास भी स्वयं
थू थू कर रहा है मानवता के  हत्यारों पर |



बुधवार, 18 मार्च 2020

राउमावि पाला कुराली जखोली रूद्रप्रयागा नौनो कि कविता - प्रस्तुति अश्विनी गौड अध्यापक विज्ञान राउमावि पाला कुराली जखोली रूद्रप्रयाग ।