शनिवार, 13 जून 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 17 - ‘पथ्यला‘ (गीत -कविता संग्रह) में प्रकाशित गीत ‘उत्तराखण्ड बणी गाई‘ से जुड़ी यादें


वर्ष 1998 की बात है । मुझे अपने शोध के सिलसिले में मेरठ विश्वविद्यालय जाना था । मैं शाम को मेरठ पहुंचा । एक होटल में विश्राम करने के बाद मैं सुबह मेरठ विश्वविद्यालय की तरफ चला गया । मुझे जोर की भूख लगी हुई थी । विश्वविद्यालय से बाहर कुछ दूरी पर एक छोटा होटल था । मैंने सोचा,‘‘पहले जमकर नाश्ता कर लूं। इसके बाद विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में जाकर अपने शोध से संबंधित कार्य करूंगा । मैंने होटल में भोजन के बारे मे पता किया । होटल के मालिक ने मुझसे बातचीत की । उसने मुझे मेरठ आने का उद्देश्य पूछा । उसने मुझे यह भी सुझाव दिया कि यदि मैं चाहूं तो विश्वविद्यालय में काम होने तक अपना बैग होटल में रख सकता हूं । बातों -बातों में जब उसे पता चला कि मैं उत्तराखण्ड का रहने वाला हूं । उसने मुझे बताया कि उसके होटल में एक कर्मचारी उत्तराखण्ड का है। उसने उसको आवाज दी । वह दौड़ा -दौड़ा आया । उसने मुझसे पूछा, ‘‘ तुम कखा छन?‘‘ मैंने कहा, ‘‘ रुद्रप्रयाग जिला कु रौण वाळु छौं ‘‘  वह बड़ी आत्मीयता से मुझसे उत्तराखण्ड के मौसम, खेती आदि के बारे में बात करने लगा । वह मुझे पीने के लिए ठण्डा पानी लाया । होटल में अन्य लोग भी खाने के लिए आए थे किन्तु उसका ध्यान  मेरी ही ओर था । नाश्ता करने के बाद मैं विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में चला गया । वहां मैंने लगभग दो बजे तक अपना काम किया । इसके बाद मैं दिन के भोजन के लिए उसी होटल में चला गया । दिन के भोजन के बाद मैंने बचा हुआ काम शाम तक पूरा कर लिया । इसके बाद रात को मैं उत्तराखण्ड वाली बस में बैठ गया ।
    मेरे मन में होटल का वह दोस्त घूमने लगा । मैं सोचने लगा कि यदि उत्तराखण्ड अलग राज्य के रूप में बन गया तो क्या इस दोस्त जैसे होटल में काम करने वाले लोग रोजगार के लिए उत्तराखण्ड वापस लौट आएंगे ? मेरे दिमाग में एक गीत की थीम आ गई । कोई व्यक्ति होटल में उत्तराखण्ड से बाहर नौकरी कर रहा है। इसी बीच उत्तराखण्ड राज्य के गठन की घोषणा हो जाती है।  यह सुनकर होटल में काम करने वाला वह युवक प्रसन्न हो जाता है। वह खुशी में अपनी मांॅ को एक चिट्ठी लिखता है। इस चिट्ठी में वह प्रवासी जीवन की कठिनाइयों और अपने रोजगार की परेशानियों का जिक्र करता है। वह आशा व्यक्त करता है कि अब उत्तराखण्ड अलग राज्य के रूप में बनने वाला है। इसलिए उसके खौरी (विपत्ति) के दिन समाप्त होने वाले हैं। वह अपनी रोजी रोटी के लिए अपने गांॅव वापस आने का विचार  करता है। मैंने इस थीम पर छह- सात गीतांश तैयार कर लिए । यह गीत पथ्यलागीत-कविता संग्रह में प्रकाशित हुआ था। गीतों की समीक्षा की श्रृंखला के अंतर्गत रंत रैबारमें श्री ईश्वरी प्रसाद उनियाल जी द्वारा लिखी इस गीत की समीक्षा प्रकाशित  हुई ।  उन्होंने इस समीक्षा में उत्तराखण्ड निर्माण के इतने दिनो के बाद भी यहां
रोजगार के अवसर पैदा होने के बजाए निरंतर होेते पलायन पर चिन्ता प्रकट की । इस पोस्ट के साथ श्री ईश्वरी प्रसाद उनियाल जी द्वारा लिखी गई समीक्षा भी दी गई है।


शुक्रवार, 12 जून 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 16 - ‘पथ्यला‘ (गीत -कविता संग्रह) के शीर्षक गीत/कविता से जुड़ी यादें





मित्र कई बार पूछते हैं, ‘‘ आप क्यों लिखते हो ? लिखा है तो इसी विषय पर क्यों लिखा है ? ‘‘ जब लेखक के आस-पास कोई ऐसी घटना घटित होती है जो उसे अन्दर से झकझोर देती है तो कविता के रूप में एक भावधारा कागज पर उतर आती है। जब वह बहुत अधिक आनंदित होता है तब भी ऐसी स्थिति आ सकती है। कवि की दृष्टि मामूली सी समझी जाने वाली घटना में भी ऐसी स्थिति देखकर महसूस कर सकती है।
कई बार ऐसी स्थिति भी आती है जब किसी पत्र-पत्रिका के संपादक या किसी कार्यक्रम के आयोजक का संदेश प्राप्त होता है कि अमुक विषय पर इस तारीख तक कोई कविता भेज दीजिए । ऐसे में यदि रचनाकार के पास पहले से बनी कोई कविता न हो तो उसे बैठकर और सोच समझ कर दिए गए विषय पर कविता रचनी पड़ती है। इस प्रकार लिखी गई कविता से वह आत्म संतुष्टि और आनन्द प्राप्त नहीं होता जो किसी घटना को देखते हुए स्वतः जन्म लेती है।
  यहांॅ पर संदर्भ है मेरे गढ़वाली गीत कविता संग्रह पथ्यलाके शीर्षक गीत /कविता हम पथ्यला बौण का। बात वर्ष  2000 की है। मैं राजकीय इण्टर काॅलेज लमगौण्डी जिला रुद्रप्रयाग में कार्यरत था । बोर्ड परीक्षा के समय मूल्यांकन पुस्तिकाओं का बण्डल संकलन केन्द्र राजकीय इण्टर काॅलेज अगस्त्यमुनि में जमा करना पड़ता था । लमगौण्डी से अगस्त्यमुनि जाने के दो रास्ते थे। एक था लमगौण्डी से जीप में बैठकर गुप्तकाशी जाने का । वहां से जीप या बस से अगस्त्यमुनि पहुंचने का  । दूसरा  लमगौण्डी से कुण्ड जंगल से होकर पैदल   रास्ता था । लमगौण्डी से गुप्तकाशी वाले रास्ते दिन के समय जीपें कम मिलती थी । इसलिए मुझे यह  पैदल वाला रास्ता अधिक सुविधाजनक लगता था । मैं प्रायः इसी रास्ते से कुण्ड आकर अगस्त्यमुुनि वाली बस मैं बैठकर अगस्त्यमुनि पहुंॅच जाता था । लमगौण्डी से कुण्ड पैदल रास्ता घने जंगल से होकर गुजरता है। यह रास्ता बहुत सुनसान था । भरी दोपहर में जंगल में पक्षियों और झींगुर की आवाज जंगल में गूंजती रहती थी । हवा की सनसनाहट जंगल के सन्नाटे को और भी बड़ा देती  थी । इस सुनसान जंगल का रास्ता सूखे पत्तों से भरा रहता था । मैं इस रास्ते मूल्यांकन की पुस्तिकाओं के बण्डल लेकर जा रहा था । मैं इन पत्तों के बीच मैं अचानक फिसल गया । इस समय मेरे मन में यह पंक्तियां आईं-
  ‘‘ ठौर नी ठिंगणू नी,
    बथों चै जख लिजौ,
    कैका खुट्योन कुर्चि जौं,
    बट्वे रौड़ु गाळि खौं,
    अपणि छ्वीं लगौण क्या,
    हम पथ्यला बौण का ।‘‘

 यह पंक्तियां मैंने झटपट अपनी जेब में रखे कागज पर नोट कर दी । संकलन केन्द्र में बण्डल जमा करने के बाद अगस्त्यमुनि से गुप्तकाशी पहुंचते -पहुंचते बस में इस कविता के 6-7 पद्यांश तैयार हो गए । घर आकर शाम को मैंने इन्हें डायरी में व्यवस्थित रूप से नोट कर दिया ।  बाद में सन् 2011 में प्रकाशित गढ़वाली गीत कविता संग्रह पथ्यलामें यह रचना शीर्षक गीत /कविता के रूप में सम्मिलित की गई। रंत रैबारमें श्री ईश्वरी प्रसाद उनियाल जी ने इस पुस्तक में दिए गए  हर गीत की अलग-अलग समीक्षा लिखी । उन्होंने हम पथ्यला बौण का गीत को विकास रूपी आंधी से हुए पलायन की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति लिखा ।


शनिवार, 16 मई 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 15
 भांति - भांति के बिछुड़े दोस्त
  आज  जबकि लाॅक डाउन में दूरदर्शन  द्वारा बीते जमाने के सीरियल दिखाए जा रहे हैं। लोग अपने बीस साल पुरानी फोटो फेसबुक पर दिखा रहे हैं,  ऐसे समय में मुझे भी अपने विद्यार्थी जीवन के दोस्तों की बहुत याद आ रही है । इन दोस्तों के गुणों के आधार पर मैं इन्हें इस प्रकार वर्गीकृत करने का प्रयास कर रहा हूंॅ-
1- रुपए उधार ले जाने वाले दोस्त -
  मुझे  कुछ उन दोस्तों की बहुत याद आ रही है जिनका काम रुपया उधार लेना था । जैसे उनसे मुलाकात होती , वे कहते, ‘‘ यार! तुम्हारे जेब में कुछ रुपए पड़े हैं ? अर्जेन्ट काम के लिए चाहिए थे।  बस मैं तुझे कल लौटा दूंगा ।‘‘ रुपया ले जाने के बाद इनका कल कभी नहीं आता था । इस श्रेणी के कुछ दोस्तों की रुपया उधार मांगने की शैली अलग थी । वे कहते,‘‘ यार! मैं 20 तारीख से पहले तेरे सारे पैंसे लौटा दूंगा । 20 तारीख से एक या दो दिन पहले से वे अपना चेहरा दिखाना बन्द कर देते थे। एक महीने के बाद वे अचानक प्रकट हो जाते। वे इस ढंग से बात करते जैसे वे उधार ले ही नहीं गए हों। बातों -बातों में वे टटोलते कि इसे अपने दिए रुपयों की याद है या नहीं । अगर उन्हें पक्का यकीन हो जाता कि यह पुराना उधार भूल गया है तो वह 10-15 दिन के बाद फिर  से उधार मांगते। उन्हें याद दिला दी जाती कि उन्होंने तो अभी पुराना उधार भी चुकता नहीं किया है तो वे कहते,‘‘ अरे! तेरे रुपए कहीं नहीं जाते दो तीन दिन में दे दूंगा । उनके दो तीन दिन कितने लंबे होते । इसका अनुमान लगाना बड़ा कठिन था ।
2- पार्टी करवाने  वाले दोस्त -
 कुछ दोस्त ऐसे भी याद आ रहे हैं जो हमेशा ताक पर रहते थे कब पार्टी करवाकर किसी दोस्त की जेब ढीली करवाई जाए । एक दिन मेरे एक दोस्त ने मुझसे कहा, ‘‘यार! मुझे पार्टी दे दे । मैंने कहा, ‘‘ इस समय मेरे पास रुपए नहीं हैं।‘‘  वह बोला, ‘‘ यार ! तेरा ये दोस्त कब काम आएगा ? मैं तुझे उधार देता हूंॅ। उधार के इन रुपयों से तू मेरी पार्टी करवा दे। मेरा उधार दो -तीन दिन में चुकता कर देना ।‘‘
   एक बार मुझे वाद विवाद प्रतियोगिता में 1000 रु की धनराशि प्राप्त हुई । जैसे ही मेरे मित्रों को इस बात की भनक लगी, उन्होंने इन रुपयों को खर्च करने की योजना बना ली । एक दोस्त बोला,‘‘ यार! चल घूमने चलते हैं। मैं उसकी बातों में आ गया । उसके साथ मेरे तीन चार दोस्त भी शामिल हो गए । वे जानबूझ कर होटल की ओर घूमने जाने लगे । जैसे ही हम होटल के सामने पहुंॅचे  एक दोस्त बोला, ‘‘ आज की पार्टी तो चमोला की तरफ से होगी । 1000 रु इनाम में जो मिले हैं। मैंने कहा, ‘‘ मैं चाहता था कि डिबेट के समय तुम लोग भी वहांॅ रहकर मेरा उत्साह बढ़ाते किन्तु तुम में से कोई भी दोस्त  वहांॅ नहीं था । वहांॅ आने के बजाए तुम लोगों ने क्रिकेट मैच देखना अधिक जरूरी समझा । मैं ऐसे दोस्तों को पार्टी कराना उचित नहीं समझता । ऐसे ही दोस्तों से तंग आकर एक मित्र ने नया तरीका खोज लिया ।
जब कोई दोस्त उससे पार्टी करवाने को कहते तो वह मना नहीं करता । वह उनके साथ  होटल चला जाता । जब होटल में चाय समोसा आदि का आर्डर दिया जाता तो वह चुपचाप खिसक जाता । पार्टी का बिल उन्हीं में से किसी एक को चुकता करना पड़ता ।
3- किताब मांगकर न लौटाने   वाले दोस्त -
कुछ दोस्त वह भी याद आ रहे हैं जो एक भी पुस्तक नहीं खरीदते थे लेकिन उनका घर किताबों से भरा रहता । वे अलग-अलग दोस्तों से अलग -अलग किताब मांग कर ले जाते थे। जिससे वे किताब मांगते उससे कहते,‘‘मैं एक -दो दिन में तुम्हारी किताब लौटा लूंगा । किताब मांग कर ले जाने वाले ये दोस्त किताबें कभी नहीं लौटाते । इनको पुस्तक देने वाले को नई पुस्तक खरीदनी ही पड़ती ।
4- पै्रक्टिकल की कापी  मांगकर ले जाने     वाले दोस्त -
 कुछ दोस्त ऐसे भी थे जिनका कक्षाओं में आना जाना कम रहता था । वे परीक्षा से कुछ दिन पहले  प्रैक्टीकल की काॅपी मांग कर ले जाते । इनसे मांगी गई काॅपी को प्राप्त करना टेड़ी खीर था । जब इनसे काॅपी मांगते तो ये कहते शाम को मेरे कमरे में आ जाना । मैं तुझे काॅपी लौटा दूंगा । शाम को बताए गए समय पर इनके कमरे में जाओ तो वहांॅ ताला लटका मिलता ।

5-  नोट्स मांगकर ले जाने     वाले दोस्त -

कुछ दोस्त ऐसे थे  साल भर सड़कों पर घूमते हुए दिखाई देते थे। परीक्षा से कुछ समय पहले ये नोट्स मांगने के लिए बार -बार कमरे का चक्कर काटते। एक बार इनको नोट्स दे दो तो नोट्स के वापस न आने की गारंटी होती ।
 
6-  अपने कमरे  में  खाना  न  खाने  वाले दोस्त -
 कुछ दोस्त इतने सर्वप्रिय होते थे कि वे बारी-बारी से अलग- अलग दोस्तों के यहांॅ खाना खाते थे। इनका  फ्रैण्ड सर्किल इतना बड़ा होता  था कि महीनो तक उनका ऐसे ही काम चल जाता था ।
7-  गप मारकर जाने   वाले दोस्त -
 कुछ मित्र अन्य मित्रों के यहांॅ तब पहुंॅचते जब वे पढ़ाई कर रहे होते। उस समय वे गप्पें लड़ाते थे। ऐसे दोस्तों के कई बार परीक्षा में अच्छे अंक आते। जब लोगों का सोने का समय होता तो वे  तब पढ़ाई करते । ऐसे दोस्त छात्रावास में अधिक संख्या में पाए जाते थे।
8-  जुगाड़  से फिल्म देखने    वाले दोस्त -
  कुछ दोस्त  दृढ़ संकल्प के धनी होते कि चाहे कुछ हो जाए वे पिक्चर हाॅल में फिल्म अपने पैसों से नहीं देखेंगे। इनका फिल्म देखने के लिए जुगाड़ भिड़ाने का अनूठा तरीका था । या तो वे किसी सीदे सादे दोस्त से कहते,‘‘ यार! मुझे फिल्म दिखा दे। ‘‘ यदि वह तैयार नहीं हुआ तो वे सीधे पिक्चर हाॅल पहुंॅच जाते, वहांॅ टिकट की लाइन में देखते कि कोई दोस्त टिकट खरीदने के लिए खड़ा तो नहीं है। यदि कोई दोस्त दिखाई देता तो वे उससे कहते,‘‘यार! एक टिकट मेरे लिए भी खरीद लेना । तेरे पैसें बाद में दे दूंगा । ‘‘ वे टिकट के पैसें कभी नहीं देते ।

9-  शराब पीने की आदत डलवाने     वाले दोस्त-
कई दोस्त ऐसे होते जो किसी विशेष मौके, पार्टी आदि के समय उन दोस्तों को भी बुलाते जो शराब नहीं पीते । वे शराब पीने वाले किसी दोस्त से कहते,‘‘ देख लेना आज फलां ( शराब न पीने वाले) को जबरदस्ती शराब पिला कर रहूंगा ।‘‘ ऐसे दोस्त जब उसे शराब पिलाने में सफल होते तो अपने कार्य की स्वयं प्रशंसा करते हुए कहते, ‘‘ वो तो शराब पर हाथ थी नहीं लगाता था मैंने उसे शराब पिलाना सिखाया । जब वह शराब पीने के लिए मना करता तो वे दोस्ती की कसम खिला देते ।

10- किसी दोस्त के पास कोई अच्छी देखकर उससे मांगने    वाले दोस्त-
  कुछ दोस्त  ऐसे  भी थे जो किसी दोस्त के पास कोई चीज देखते तो तुरंत कहते, ‘‘यह चीज कहांॅ से लाए ? इसे मुझे दे दो।
ये दोस्त विशेष प्रकार के दोस्त हैं ।  इनके अलावा अन्य  दोस्तों का जिक्र यहांॅ आने से रह गया हो तो वे क्षमा करेंगे । वे दोस्त दिल के अंदर आज भी हैं।
 इन  सभी दोस्तों को कोटि -कोटि नमन।


शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 14 आंशिक आवासीय छात्रावास और मैस मोनिटरी



  एक दौर वह था जब कक्षा 8 के बाद एकीकृत परीक्षा उत्तीर्ण करना एक बड़ी उपलब्धि माना जाता था । एकीकृत परीक्षा में पूछे जाने वाले उच्च स्तरीय होते थे
  एकीकृत परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद श्रीनगर स्थित आवासीय छात्रावास में प्रवेश मिलता था । कक्षा 9 में जब हमने यहाँ  प्रवेश लिया तो तीन -चार महीने तक  घर की बहुत याद आती
थी । जब कोई अभिभावक कभी मिलने को आते तो यह यादें दुगुनी हो जाती थी । इसका कारण एक तो घर के सदस्यों से दूर रहना और दूसरा सीनियर छात्रों की अपेक्षा रहती थी कि जूनियर होने नाते हम विनम्र और अनुशासित रहें । हम बीच – बीच में घर चिट्ठी भी भेजते
थे | यहाँ  सीनियर छात्रों को भाई साहब कहा जाता था । छात्रावास अधीक्षक की ही तरह  भाई साहब लोगों के सामने जाने में भी झेंप  और सम्मान का भाव होता था। अनुशासन बनाए रखने की यह अद्भुत परंपरा थी । कुछ महीनो के बाद हमें  घर जैसा वातावरण ही लगने लगा । बाद में तो छुट्टियों में भी यहाँ  रहने का मन करता था ।
   शिक्षा के उद्देश्यों में से एक प्रमुख उद्देश्य बच्चों में नेतृत्व क्षमता और समस्या समाधान के कौशल का विकास करना भी है । बच्चों में नेतृत्व गुणो के विकास के लिए इस छात्रावास में मैस मोनिटरिंग की व्यवस्था लागू थी । इसके अंतर्गत हर माह दो छात्रावासियों को एक महीने के लिए मैस मोनिटर का दायित्व निभाना होता था । एक मोनिटर को मैस से संबंधित खर्चे, बिल आदि का रजिस्टर में विवरण तैयार करना होता था । दूसरे का काम दुकानदार से समन्वयन कर सामान को छात्रावास तक पहुंचाना होता था । छात्रावास के भोजन सामग्री के स्टोर की चाबियां मैस मोनिटर के पास ही रहती थी । उन्हीं की उपस्थिति में खाना तैयार करने वालों को भोजन बनाने के लिए राशन दिया जाता था । मैस मोनिटर की जिम्मेदारी कक्षा 11 के छात्रों को ही दी जाती थी । कक्षा 10 और 12 के छात्रों को इससे मुक्त रखा जाता था । विशेष परिस्थितियों में 12 और 10 के छात्रों को सत्र के शुरुआती महीनो में ही यह जिम्मेदारी दी जाती थी । जब हम कक्षा 9 में पढ़ते थे तो हम कल्पना करते थे कि मैस मोनिटरिंग का कार्य कितना कठिन होता होगा ? जब कक्षा 11 में हमें यह जिम्मेदारी मिली तो हमें इसमें आनन्द आने
लगा । इससे जिम्मेदारी लेने, प्रबंधन और नेतृत्व गुणो के विकास के साथ ही आत्मविश्वास भी जाग्रत हुआ ।
   मुझे याद है एक बार जब मैं मैस मोनिटर था । सुबह जैसे ही मैंने स्टोर का ताला खुला  और खाना बनाने वालों को चायपत्ती, चीनी और मिल्क पाउडर दिया । उसी समय स्टोर के अंदर एक जूनियर भाई आकर बोला,  ‘‘भाई साहब! पाउडर और चीनी ।‘‘ ‘‘मतलब‘‘ ? -मैंने कहा। वह नजर झुकाए सकुचाते हुए बोला, ‘‘ खाने के लिए चाहिए ।‘‘
मैंने उसे एक मुट्ठी के बराबर चीनी और कुछ पाउडर देते हुए कहा, ‘‘ ठीक है । ले लो। रोज-रोज मत आना ।‘‘
 उसने पाउडर और चीनी को हाथ में रखकर मिला दिया और मुँह  में रख दिया । इसके बाद एक गिलास पानी पी दिया ।
 मैस मोनिटर का यह काम भी होता था कि वह देखे कि कोई नाश्ता दुबारा तो नहीं ले  रहा
है ?  एक दिन मेरे और एक सहपाठी के बीच शर्त लगी । मैंने कहा, ‘‘मैं आज दुबारा नाश्ता करके रहूंगा ।‘‘  मैं एक बार नाश्ता लेने के बाद फिर से नाश्ता लेने लगा । मैस मोनिटर भाई साहब ने मुझसे कहा, ‘‘ तू तो पहले भी नाश्ता कर चुका है । मैंने कहा,‘‘ भाई साहब! मेरा नाश्ता गिर गया है।‘‘  उस दिन नाश्ते में पाकीजा लाया गया था । उन्होंने मुझे एक पाकीजा और दिला दिया   । शर्त लगाने वाले मेरे सहपाठी को जब यह पता लगा कि यह दुबारा नाश्ता प्राप्त करने में सफल रहा तो उसने मैस मोनिटर भाई साहब से मेरी शिकायत कर दी । उन्होंने मुझे और मेरे उस दोस्त को अपने पास बुलाया । मेरे दोस्त ने शिकायत करते हुए भाई साहब से कहा, ‘‘ इसका नाश्ता गिरा नहीं था । इसने झूठ बोला था ।‘‘
 उन्होंने मुझसे कहा, ‘‘ तुमने झूठ क्यों बोला ?‘‘ मैंने कहा, ‘‘ भाई साहब मेरा नाश्ता सचमुच गिर गया था । यह जमीन में नहीं गिरा था । यह मेरे दूध के गिलास में गिर गया था।‘‘  मेरी बात को सुनकर भाई साहब ने  मुझे डांटने के बजाय जोर से ठहाका लगाया। 


शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

इतिहास लिख रहा है कोरोना - रचना डॉ. उमेश चमोला


इतिहास लिख रहा है कोरोना ,
इसमें कुछ उजले पन्ने भी होंगे
जिनमे मानवता की रक्षा में तत्पर
लोगों का जिक्र किया जाएगा ,
इतिहास उन्हें विस्मृत होने नहीं देगा ,
आने वाली पीढी उन पन्नो को
सम्मान भरी नजरों से देखेंगी ,
कुछ ऐसे पन्ने भी होंगे
जब भी वे टटोले जाएंगे
पढ़ने वालों की  आँखों में इतिहास के 
इस    कालखंड का स्याह पक्ष उतर जाएगा ,
उन्हें लगेगा इतिहास भी स्वयं
थू थू कर रहा है मानवता के  हत्यारों पर |



बुधवार, 18 मार्च 2020

राउमावि पाला कुराली जखोली रूद्रप्रयागा नौनो कि कविता - प्रस्तुति अश्विनी गौड अध्यापक विज्ञान राउमावि पाला कुराली जखोली रूद्रप्रयाग ।

शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

कुछ बातें, कुछ यादें 14 श्री गुरुराम राय पब्लिक स्कूल और ऑडियो कैसेट ‘गौं मा‘


  वर्ष 1998 की बात है। डॉ. दिनेश चन्द्र भट्ट, दीपक गौड़, गोकरण बमराड़ा, गणेश डिमरी और महेन्द्र सिंह अधिकारी हम लोग श्री गुरुराम राय पब्लिक स्कूल श्रीनगर गढ़वाल में पढ़ाते थे। शाम को  दिनेश चन्द्र भट्ट और मैं अलकनंदा किनारे घूमने जाते थे। श्री भट्ट जी का उस समय भी साहित्यिक रुझान था । वे भी अपनी कुछ रचनाएं मुझे सुनाते थे। वे मुझसे पूछते थे,‘‘चमोला जी! आजकल क्या लिख रहे हो ? उन दिनो मैं हिन्दी में हास्य व्यंग्य की कविताएंॅ लिखता था। साथ ही मैंने गढ़वाली में भी कुछ गीत और कविताएंॅ लिखी थी। मैंने इन्हें श्री भट्ट जी को सुनाना शुरू किया। वे मेरा उत्साह बढ़ाते रहते थे। कुछ दिनो के बाद शाम को घूमने वाली टीम में  गणेश डिमरी, दीपक गौड़ और गोकरण बमराड़ा भी शामिल हो गए। गीतों को गुनगुनाने और सुनने-सुनाने का सिलसिला चलता रहा। एक दिन गोकरण बमराड़ा और दीपक गौड़ ने मुझे एक थीम दी। उन्होंने कहा कि एक ऐसा गीत लिखो जिसमें गांव के सौन्दर्य का जिक्र हो और गांव आने का आह्वान किया गया हो। श्री बमराड़ा ने एक गीतांश  सुना दिया,
                  ‘‘ टक लगैक सूण, ढोलकी चैत की,
                    छांछरी लगांदी बेटुली मैत की,
                    कबि खुदेड़ गीत, कबि सदैं लगांदी,
                    थड़्या चौफळों का हुलेर चौक मा,‘‘
मुझे अब इन्हीं पंक्तियों के ट्रैक पर एक गढ़वाली गीत रचना था। दो -तीन दिन में मैंने तीन-चार गीतांश बना दिए। इनमें से एक था-
                     ‘‘गौत,तोर, दाळ, चुला मा धैरीक
                      कुटेरि खुल्दि छुंयों कि दगड़ा बैठीक,
                      लंबी रात ह्यून्द की कटिदी छुयांे मा,
                      तू भी ऐ जा कछिड़ी मा ह्यूंद मैनो मा‘‘
जब मैंने ये गीतांश शाम को घूमते समय दीपक गौड़,गोकरण बमराड़ा और गणेश डिमरी को सुनाए तो उन्हें यह गीत अच्छा लगा । मैंने उन्हें अपना गीत ‘गाड गदेरा, गीत सुणौणा‘, किलै नी औणू त्वैतें बुलौणा पहले ही सुना रखा था। उन्हें यह गीत बहुत अच्छा लगा था। सबका यह मानना था कि यह गीत अत्यंत मार्मिक है।
एक दिन दीपक गौड़ ने मुझे पूछा, ‘‘आपके कितने गढ़वाली गीत तैयार हैं ?‘‘ ‘बारह- चौदह‘- मैंने कहा। दीपक गौड़ ने सुझाव दिया,‘‘क्यांे न इन गानो की एक कैसेट निकाली जाए।‘‘ अब प्रश्न था, इन गीतों को गाएगा कौन‘‘ ? गोकरण बमराड़ा ने गीत की कुछ पंक्तियांे को गुनगुनाना शुरू किया। दीपक गौड़ और मैंने कहा, ‘‘ अगर इन गानो को हमारे गोकरण बमराड़ा ही गाएं तो कैसा रहेगा ? ‘‘ सबने एकमत से स्वीकृति दे दी।
  मैं गुरुराम राय स्कूल में जीवविज्ञान प्रवक्ता के रूप में कार्यरत था। इस नाते जीवविज्ञान प्रयोगशाला का प्रभारी भी था। यह निर्णय लिया गया था कि छुट्टी के बाद जीवविज्ञान की लैब खोली जाएगी और रोज गीतों की रिहर्सल की जाएगी। इसके लिए हमने प्रधानाचार्य श्री बर्त्वाल जी से अनुमति ले ली। कैसेट के लिए आठ गीतों का चयन किया गया । पहला गीत गोकरण बमराड़ा और दीपक गौड़ की दी गई थीम पर आधारित था। गीत ‘गाड गदेरा गीत सुणौणा‘ और ‘ ये रौंतेळा मुलुक दोनो पलायन पर केन्द्रित गीत थे। ‘दारु तेरु ही छ सारु‘ गीत समाज में शराब के बड़ते प्रचलन पर एक व्यंग्य रचना थी।  ‘भोळ पूसै कि मासंत‘ गीत लोकगीत  शैली पर रचा गया गीत था। यह नायक और नायिका की मीठी नोंकझोंक पर आधारित था। एक श्रृंगार रस प्रधान गीत भी था- ‘ जब देखा, तब देखा सुपीन्यों मा ऐ जांदी, जिकुड़ी का बौण मा कुयेडि़ सीं छै जांदी, बथों सीं तू ऐ जांदी, बथों सीं तू चलि जांदी,
 इस प्रकार अलग-अलग मिजाज वाले आठ गीतों का कैसेट के लिए चयन किया गया। छुट्टी के बाद इन गीतों की आठ- दस दिन तक रिहर्सल की गई। अब बारी थी इन गीतों के रिकार्डिंग की। उन दिनो नीलम कैसेट कंपनी का नाम काफी चल रहा था। हमने नीलम कंपनी को एक पत्र लिखा। यह पत्र हमने अपर बाजार श्रीनगर के एक टाइपिंग केन्द्र से इलेक्ट्रोनिक रूप से टंकित कर नीलम कैसेट कंपनी के पते पर भेज दिया। 10-15 दिन तक हम इंतजार करते रहे। वहांॅ से कोई उत्तर नहीं मिला। हमने नीलम कैसेट कंपनी के स्टूडियो जाने का निर्णय लिया । हम लोग दिल्ली के लिए रवाना हो गए। हमने जानकारी प्राप्त कर ली थी कि नीलम स्टूडियो पांडव नगर में है। दिल्ली में आइ.एस.बी.टी. के बाहर हमने पांडव नगर और नीलम स्टूडियो जाने के बारे में पता किया। एक बस परिचालक ने कहा,‘‘नीलम स्टूडियो का तो पता नहीं है किन्तु मैं तुम्हें पाण्डव नगर तक छोड़ सकता हूंॅ। मेरी गाड़ी में बैठ जाओ। हम उसकी गाड़ी में बैठ गए। एक जगह पर गाड़ी रुकी। उसने हमें उतरने का संकेत दिया। हमने वहांॅ पूछा, ‘‘नीलम स्टूडियो किस तरफ है ?‘‘ एक आदमी ने कहा,‘‘ नीलम स्टूडियो तो पाण्डव नगर में पड़ता है जो यहांॅ से बहुत दूर है। ‘‘तो यह पांडव नगर नहीं है ?‘‘- हमने कहा। वह बोला, ‘‘यह पाण्डु मोहल्ला है।
 हमें पता चल गया कि पांडव नगर के भ्रम में बस का परिचालक हमें पाण्डु मोहल्ला छोड़ गया। इसके बाद हम पूछते -पूछते पांडव नगर और अंततः नीलम स्टूडियो पहुंॅच गए। वहांॅ हमने नीलम स्टूडियो के मालिक श्री कृष्ण कुमार चौधरी से संपर्क किया। उन्होंने हमें 15 दिन के बाद रिकार्डिंग की तारीख दी।
   हम 15 दिन के बाद गीतों की रिकार्डिंग के लिए नीलम स्टूडियो चले गए। वहांॅ हमारी मुलाकात संगीतकार श्री राजेन्द्र चौहान और लोकगायिका कल्पना चौहान से हुई। गोकरण बमराड़ा ने गीत श्री राजेन्द्र चौहान और श्रीमती कल्पना चौहान को सुनाए। श्री राजेन्द्र चौहान जी ने हारमोनियम पर गीतों को बजाया और हमारी सोची गई धुन में परिमार्जन किया। हम आठ गानो की रिकार्डिंग करके श्रीनगर वापस लौट आए।
   कुछ दिनो के बाद हमें सूचना मिली कि हमारे गानो की कैसेट ‘गौं मा‘ बाजार में आ चुकी है। हमने इसके लोकार्पण के बारे में सोचा। सोच विचार के बाद बैकुण्ठ चतुर्दशी मेले में इसके लोकार्पण करने का निर्णय लिया गया। हमने तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष श्री मोहन लाल जैन जी से संपर्क किया। वे लोकार्पण के लिए तैयार हो गए। हमने कार्यक्रम संचालन के लिए डॉ. राकेश भट्ट से बात की । डॉ. राकेश भट्ट के कुशल संचालन में कैसेट का लोकार्पण संपन्न हुआ। लोकार्पण कार्यक्रम में श्री राजेन्द्र चौहान और श्रीमती कल्पना चौहान भी शामिल हुए।
  वर्ष 1998 के बाद श्री गुरुराम राय में कार्यरत हमारी टीम बिखर गई। हमारी सरकारी नौकरी लग गई। इस बीच समय ने करवट ली । ऑडियो कैसेट के बाद सीडी का जमाना आया। देखते ही देखते यू ट्यूब ने सीडी और डी.वी.डी की जगह ले ली। वर्षों के बाद गोकरण बमराड़ा और दीपक गौड़ से प्रशिक्षण शिविरों में मुलाकात होती रहती । एक मुलाकात में गोकरण बमराड़ा जी ने बताया कि उनके पास ‘गौं मा‘ कैसेट के साउंड ट्रैक की सी.डी. है। हमने उस सी.डी. को यू ट्यूब में रिकार्ड करने की योजना पर कार्य करना शुरू कर दिया। मैंने  बमराड़ा जी से कहा,‘‘ ये साउंड ट्रैक मुझे ह्वट्सअप पर शेयर कर दो। बमराड़ा जी ने प्रयास किया किन्तु ये शेयर नहीं हो पाया। सितंबर 2019 में गोकरण बमराड़ा और दीपक गौड़ एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में मसाही ध्यान केन्द्र पुराना राजपुर देहरादून आए। हमने राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक श्री रमेश प्रसाद बड़ोनी से इस बात की चर्चा की।  उन्होंने कहा कि हमें पूरे साउंड ट्रैक को अलग-अलग गीतों में तोड़ना होगा। उन्होंने लैपटाप के माध्यम से साउंड ट्रैक को अलग-अलग गीतों के रूप में तोड़ दिया। इन गीतों में से तीन गीत श्री गोकरण बमराड़ा ने मुझे ह्वट्सप पर शेयर किए। 10 सितंबर 2019 को इस कैसेट के गीतों में से एक गीत ‘गाड गदेरा गीत सुणोणा‘ को ‘अपणी पछ्याण, गढ़वाली कुमाऊं उत्तराखण्ड‘ के यू ट्यूब में अपलोड किया गया। ‘गौं मा‘ ऑडियो कैसेट के अन्य गीत भी शीघ्र ही आपके पास यू ट्यूब के माध्यम से उपलब्ध होंगे।