रविवार, 20 अगस्त 2017

गीत समीक्षा (गढ़वाली) 5
            उत्तराखण्ड बणी ग्याई
  मेरि किताबी ‘पथ्यला’ मा अयां ये गीत की  समीक्षा वरिष्ठ साहित्यकार (समीक्षक) श्री ईश्वर प्रसाद उनियाल जी द्वारा ‘रंत रैबार’ मा करे गै छै | समीक्षा का वास्ता तौंकू भौत-भौत आभार | ईं पोस्ट से पैलि  ‘ऐ जा मेरा गौं मा’  ‘पथ्यला बौण का’  ‘त्वैतें बुलोणा’ अर ‘रैबार’ कि समीक्षा का बाद  गीत दगिडी ईं पोस्ट मा श्री उनियाल जी द्वारा करीं पांचू   गीत ‘ उत्तराखण्ड बणी ग्याई’    कि समीक्षा पेश छ | या समीक्षा द्वी रूपों मा (अलग –अलग) रंत रैबार मा छपी छै |
                    (5)
         उत्तराखण्ड बणी ग्याई  
उत्तराखण्ड बणी ग्याई,
गौंकु  विकास होलु ब्वे,
घौर कि रोटि खौलु
परदेसू नि रौलु ब्वे |

भाण्डा मजाणु होटलों मा,
दिन कटूणू रोई रवे,
राज्य बणनै कि खुशि मा
चिट्ठी लेख्णु त्वेतैं ब्वे |

छोटा मा गाजि चरोंण कु,
याद भौत आणु च,
बौण मा रडाघुसि खेनु,
मी सणी रुलाणु च,
रूठि गैन डांडी कांठी
मी तैं वख लिजै दे क्वी,
राज्य बणनै कि खुशि मा
चिट्ठी लेख्णु त्वेतैं ब्वे |

परदेस मी आयूँ यख
ढुंगा सीं जिकुड़ी कैरीकि,
कनकै लगौण ब्वे,
छ्वीं यखै कि खैरि की,

रोणु छौं मी दिन रात,
तू जिकुड़ी ना दुखै,
राज्य बणनै कि खुशि मा
चिट्ठी लेख्णु त्वेतैं ब्वे |

न मन्योडर भेजणु,
न क्वे त्वे समोण ब्वे,
गरीबी मा पल्या बडयाँ,
भाग मा लेख्युं रोण ब्वे,

सदनी नि रैला यन,
खैरयों का दिन ब्वे,
राज्य बणनै कि खुशि मा
चिट्ठी लेख्णु त्वेतैं ब्वे |

 -----रचना – डॉ० उमेश चमोला

समीक्षा -१
               दिन बौडने  आस मा 
------ आई ० पी ० उनियाल
    गरीबी अर बेचारगी उत्तराखण्ड का पहाडी अंचलों कि पुराणी नियति
रे | उखड़ी खेति से टंगी जिन्दगी कब बेमान ह्वे जाव पता नि चल्दु छौ कबि | आज भले हि वखा हाल कुछ सुधरयां छन पर वामा मौलिक विकास नीं छ | हाल सुधरणा पिछ्नै आयातित अर्थ व्यवस्था का सिवा कुछ नीं छ | फिर बि द्वी टेमों खानों जुगाड़ कर हि देन्दन वखा लोग | य स्थिति आजै छ पर अस्सी –नब्बे का दसक मा स्थिति अलग छै | हालाँकि तब बि वख भूकन क्वी म्वरदु छौ पर बच्यां रेण तको गफ्फा पैदा ह्वेहि जान्दो छौ | बस यु समझा कि जिन्दगी तैं धक्का देनै स्थिति छै |
   तब खेति-पाती अर पशु पालन का अलावा क्वी हैको व्यवसाय नि छौ |
छ्व्टा नौन्याल अव्वल त प्राइमरी से अग्ने पढै नि कर्दा छा | ये वास्ता गोर बखरा चरोणा अलावा घर को काम बि वूंतैं कन पड़दा छा | छ्व्टा भै बैनो कि देखभाल कना अलावा धारा बटी पाणयों बंठा भरी ल्याणु ,गोरु भैंसों तैं पाणी पिलोणु जना काम बि वूँ छ्वटा- छ्व्टा बच्चों का जिम्मा रैंदु छौ | यांको कारण छौ कि ब्वे बाब खेति पर हाड़ गौण त्वडोन्द छा | पथरीला पुंगडों मा धाण –धंधा कना सिवा हल्यों का दगिडी एक का बाद हैको काम पड़ जांदो छौ | यी वजै छै कि खास तौर पर घर कि जनान्यों तैं बाल- बच्चों कि देखभाल कनो मौका नि मिल्दु छौ | यांको जिम्मा इस्कुल्या बच्चों मदे सबसे ठुला भै- बैणयों का कन्धा मा जांद | यां से वु छ्व्टा बच्चों तैं पढ्नो मौका नि मिल्दु छौ | यां से अपणा पहाड़ मा शिक्षा अर स्वास्थ्य का गैराल छा | काम चलाऊ आखर  ज्ञान तक यि बच्चा रै जांदा छा | यी वजै रै कि यि बच्चा घर बटी कैका बि दगडी देश ऐ जांदा छा | अब वुँका समिणी होटल ढाबों मा भांडा मठोंण का सिवा कुछ विकल्प नि रैंदु छौ अर ताजिंदगी वु भांडे मठोंद रैंदों छौ | जादा सि जादा क्वी बड़ा होट्लू मा बेयर कि नौकरि तक मिलि जांदि छै |हाँ एक और बात छै  कि कैकि सिफारिस पर कै अधिकारि को घरय नौकर बण जांदा छा यि बच्चा | कुछ कारखानों मा नौकरि करी अपणि ज्वन्नि तक पार कर देंदा छा |
    पर आज य बात नीं छ | अलग राज्य उत्तराखण्ड बण जाण से स्थिति मा थोड़ा भौत बदलौ ऐ ग्ये | वुन पहाड़ का लोग अब कामगत्ती ह्वे जावन वु बड़ी आसनि से ख़ुशी से जिंदगी बितै सकदन | सरकारी योजना यितगा बण ग्येनि कि वूँ पर आश्रित काम शुरू करी तैं आर्थिक स्थिति सुधरे जै सकद पर यिनु कम से कम करीतें जादा से जादा प्राप्त कनै मानसिकता घर कर ग्ये वखै ज्वान पीढी मा | राज्य बणने खुशि मा एक प्रवासि गढ़वाली लोगु मा भौत सारि अपेक्षा छै कि अपण राज्य मा यु कल्ला,यिन्के अपणि जिंदगी तैं सौंगी बनै दयोला |
    डॉ० उमेश चमोला कि प्रस्तुत कविता कु सार भाव यी छ | कविन अपणि रचना तैं ढाळ दयेकि वीं तैं गीत कि अन्वार देयीं छ | ‘उत्तराखण्ड बण ग्याई’ नौंकि ईं कविता /गीत मा घर कि खस्ता आर्थिक स्थिति से उकतै कि देश अयां एक जवान नौना कु ज्यू कु उमाळ छ | वु देश बटी अपणि ब्वेका वास्ता चिट्ठी ल्यखणु छ कि अब चिंता कने जर्वत नीं छ किलैकि उत्तराखण्ड राज्य बणग्ये अब | अब वक्त ऐग्ये कि अपण गौं घर मा रैक त्यरा हाथे रवटि खौलो | होटुलु मा भांडा मठोणा दिन अब ख़त्म ह्वे जाला | दिन कटणा भारि होयां छन | अब नयु राज्य बणनू छ यीं खुशी मा त्यरा वास्ता चिट्ठी भ्यजुणू छौं |
   वु दिन बि क्या छा कि गौं मा गोर चरोणा अर बोण मा रडाघुसी ख्यलुणु यि सबि याद आणी छन | अब किलैकि नयु राज्य बणणू छ | ये वास्ता बुरा दिन ख़त्म ह्वे जाला | यिन लगुणू छ जन कि हमर वास्ता वखै डांडी कांठी रुसै ग्येनि | पर परदेश आणु मेरा वास्ता शौक या ख़ुशी कि बात नि छै | जिकुड़ा मा ढूगो धरी तैं मैन घर छोडि छौ | अब यख मीरा ज्यू पर क्य बितणी छ त्वेतैं कनुक्वे बतौण?
   एक प्रवासि नौने दिल कि क्य हालत होंद कविन यीं कविता मा साफ़ करीतें उल्लेख कर्युं छ | प्रवासी बतौणु छ कि अब तक हमरा भाग्य मा रोणु लख्युं छ | गरीबी मा पल्यां छां यां से लगद कि पैलि जु दुःख पै छा अब वु ख़त्म ह्वे जाला  किलैकि नयु राज्य उत्तराखण्ड बणनू छ | ये वास्ता त्वैतैं चिट्ठी ल्यखणु छौं |
      (रंत रैबार २  अप्रैल  २०१२  बटिन)


समीक्षा -२
               नि बदले बुलागिरी कि तस्वीर
   ------ आई ० पी ० उनियाल
    कवि कि कल्पना जथगा उच्ची उड़ान भर द्या कम हि कम छ | वेकि उड़ान कि क्वी थौ नीं छ | वु एक तिरिण तैं विराट बनैक वेकि पूरि दुन्य सज्यें देंद | कखि कुछ न कथ पर कवि कि थौलि मा सब कुछ मौजूद होंदु | वु एक कुरमण पर हथ खुटा सज्येकि वेतैं बेगवान जीव बनैकि वेका अस्तित्व तैं विस्तृत कर देंद | ठीक यिनि ह्वे होलो उत्तराखण्ड राज्य निर्माण कि घोषणा होणे संभावनों से पैलि |
   उत्तराखण्ड राज्य बणलो लोगुन कल्पना करि होलि विकास कि ,नौकरयों कि, उत्तराखण्ड तैं देश का हौर राज्यों कि श्रेणी मा खड़ो कनो | वुंकि लालसा का क्य नतीजा ह्वेनि य बात त जुदा छ पर एक कविन अलग ही कल्पना करी तैं उत्तराखण्ड बणणा बादे तस्वीर खैंची रखीं रखीं छ | डॉ० उमेश चमोला जु कि गढ़वाली मा गीत व काव्य सृजन का वास्ता काफि जणयां मन्यां छन,वूंन उत्तराखण्ड बणनै ख़ुशी को इजहार एक होटल मा भांडा मठोंण वला भुला का मुख बटी कर्युं छ | हाँ, भांडा मठोंण वलो भुला जै नौकरि कि तलाश मा मैदान कि तर्फ उन्मुख होयुं छ डॉ० चमोलान  वेकि पिडा को वर्णन कर्युं छ | काव्य संकलन ‘पथ्यला’ मा संकलित गीत ‘उत्तराखण्ड बणी ग्याई’ शीर्षक वला गीत मा वे भंडमजा’ भुलाकि कल्पना पर चमोला जी वेकि यी न्रिकृष्ट पछ्याण से मुक्ति को मार्ग समझदन | भुला नौ का कलंक से ओतप्रोत पाड़ी छोरों कि पिडा  या छ कि होलो क्वी यनु जु मैं तैं ये कलंक से मुक्ति दिलैदयो | वेकि आस बंधीं छ कि अब उत्तराखण्ड बणन वालु छ ये वास्ता वु अब बुलागिरी कन्य नी छ |
     यु भुला अपणि माँ तैं चिट्ठी भ्यजुणू छ कि ब्वे अब बुरा दिन गया समझा | किलैकि उत्तराखण्ड बणी ग्याई | अब मैतै परदेश नि जाण पडलो | अब वेतैं अपुणु घर नि छ्व्डन पडलो | ब्वे मैं अब त्यरा हाथै रवटि खौलो |
   वु ल्यखणू छ कि भांडा मठोंद मठोंद वैका हाथ गळ ग्येनि | हाथ कबि सुख्दै नि छन | यी वजै छ कि द्विय हाथु मा कादैई लगीं छ | यूँ हालू मा रवे रवे कि दिन कटणु छौं पर अब खैरी दिन चलि ग्येनि | यु समझले | किलैकि उत्तराखण्ड बण ग्याई |
   किशोर अवस्था मा हि गरीबी से तंग एकि यु किशोर घर छोड़ी भैर ऐग्ये | वेकि उमर अबि यिथगा कठिन दिनचर्या बितोने नि छै पर क्य कन गौंकि कंगाली का यि दिन छन | भुला का अबि खेलकूद का दिन छन | बण का गोरु चरोणु, रडाघुसि ख्य्लण, जंगल मा सौ बनि बनि का फल -फूल  खानो अर नि जाणि क्य कल्पना ये भुला का मन मा पैदा होन्दी होलि | जनकि ब्व्लेंद वेका वास्ता वखै डांडी कांठी रुसै ग्येनि | क्वी हवा जु वेतैं वख ल्हेकि चल जाव | हे माँ ! राज्य बणने ख़ुशी मा त्यारा वास्ता चिट्ठी ल्यखणू छौं |
    परदेश आणु वैकि ख़ुशी नी छै | वु वखि पहाडै उन्मुक्त हवा जिन्दगी जीने इच्छा पाली रखण वलो एक साधारण छोरा छ | जैकि यख होटल मा भारि दुर्गति होणी छ | वु ल्यखणु छ कि परदेश मा वेतैं ज्व खैरि खाण पड़नी छ वु कन्क्वे लेख सकद | मीतें ढूंगो जिकुड़ा करीतें गौ छोडण पडि | मैं यख दिन रात रोणु रैंदु | सुबेर बटी अधा रात तक भांडा मठोनों काम करदो | यीं पिडा तैं त्वेमा कनक्वे लगै सकदों | पर अब उत्तराखण्ड बण ग्याई समझा कि दुःख तकलीफ जल्दी हि चल जैलि |
  क्य कन माँ यु सब भाग मा ल्यख्युं  होंद जुकि कबि टळदो नीं छ | कंगाली मा पळयां – बढ़यां छां |  जब भाग मा भांडा मठोंणु ल्यख्युं हो त क्वी करे बि क्य पर माँ अब बुरा दिन जाण वला छन किलैकि उत्तराखण्ड बण ग्याई | यि सबि दुःख ख़त्म ह्वे जाला |
  डॉ ० चमोलान कल्पना त खूब करि छै पर क्य यों नोन्यालु को सुपन्य पूरा ह्वे छन | क्य वे भुला कि चिट्ठी मा ल्यखीं खैरी छ्वीं अर सुख कि कल्पना पूरि व्हे छ ? शैद ना |हाँ, अब भंडमजा कम अर वेटर ,सैफ य फिर स्टुवर्ट जरूर बणग्येनि | यानि बुलागिरी कि जगा वेटरगिरी |
         (रंत रैबार ८  अक्टूबर  २०१२  बटिन)



 






बुधवार, 16 अगस्त 2017

गीत समीक्षा (गढ़वाली) 4
                  रैबार
  मेरि किताबी ‘पथ्यला’ मा अयां ये गीत की  समीक्षा वरिष्ठ साहित्यकार (समीक्षक) श्री ईश्वर प्रसाद उनियाल जी द्वारा ‘रंत रैबार’ मा करे गै छै | समीक्षा का वास्ता तौंकू भौत-भौत आभार | ईं पोस्ट से पैलि  ‘ऐ जा मेरा गौं मा’  ‘पथ्यला बौण का’ अर ‘त्वैतें बुलोणा’ कि समीक्षा का बाद  गीत दगिडी ईं पोस्ट मा श्री उनियाल जी द्वारा करीं चौथा   गीत ‘ रैबार’    कि समीक्षा पेश छ –
                     (4)
                 रैबार
त्वेतैं च आयूँ पहाड़ो रैबार,
त्वेतैं बुलोणा बार-त्यवार |

कांठा मा ज्वोन,अब भी औंद,
सुबेर ह्वेगी गैनू  बतोंद,
मोल्यार मा यख डालों फुलार,
सूणी म्वारों कु गितालु रैबार,
त्वैतें ------------------------|

झिलमिल  औंदी यख बग्वाल,
ब्वे बाबों की च घौर जग्वाल,
त्वे बिन होली कन यख होली,
कन होलू यख रखुडी त्यवार,
त्वैतें ------------------------|

सैंती पाली तू बडू बणाई,
तेरा बाना क्या क्या खैरी नि खाई,
दाना सयानो को बिसरी दुलार,
ब्वे बाबु तेरा घौर बीमार ,
त्वैतें ------------------------|

ज्यूं पुंगडों मा नाज छौ पाणी,
बांजी पुंगडी सि त्वेतैं बुलाणी,
दूध कि नीं छ यख छ्लार,
रीता पड़यां छन यख कुठार,
त्वैतें ------------------------|
उत्तराखण्ड यो  राज्य  बणीगे;
आँखों मा सबुका स्वीणा सजीगे,
उड़ीक ऐ जा पोथलों की चार,
समाल अपडू तू घौर बार,
त्वैतें ------------------------|
        -----रचना – डॉ० उमेश चमोला

समीक्षा
औ अब घर ऐ जा
------ आई ० पी ० उनियाल
      राज्य मिल्यां बारा वर्ष ह्वे ग्येनि पर आज बि राज्य का लोगु तैं मैसूस नि ह्वे कि क्य सचे हमतें अलग राज्य मिलगे | कारण कि नया राज्य जनु विकास उत्तराखण्ड मा द्य्खनो नि मिल्नू छ |
  सन १९९४ बटी द्वी हजार तक पूरा छै साल तक नयाँ राज्य प्राप्ति खुण आन्दोलन लडे गे | लोगुन झणि  क्य क्य सुपन्य गंठययां छा | सुख-समृद्धि का सुपन्य, होणी हुणत्यार का सुपन्य, पहाड़ का विकास का सुपन्य, पलायन पर रोक लगौणा सुपन्य अर झणि हौर क्य क्य गाणि करि छै उत्तराखण्ड का लोगुन पर आज लोगु का यि सुपन्य हि बणी रैग्येनि |
  गाणयों का बीच एक सुपन्य छौ पलायन पर रोक लगै जाणो | नतीजो उलटो ह्वे | राज्य बणना बाद प्रदेश मा पलायन तैं जादा हवा मिले | जु लोग पैलि कखि काम मिल्न पर हि पलायन कर्दा छा अब वु जरा बि सारो मिल्न पर घर छोड़ देणा छन | ख़ास तौर पर पहाड़ बटि लोगुको मैदान उन्द लमडने मानसिकता का पिछने फटाफट रूप्या  कमैक अग्नै कि पंगत मा खड़ो होणे इच्छा छ | पैलि जब उत्तर प्रदेश से जुडयां छा तब विचार हि पैदा नि होंदो छो भैर निकल्नो पर अब त प्रदेश कि राजधानि एक लतडाग पर छ | पहाड़ का छोरा छपरा जनि १५ -२० पर पौंछणा छन वूंकि मैदानुन्द दौड़ने लंग्यात लग जान्द |
  पिछला बारा वर्षो मा अगर द्यखे  जाव त पता चललो कि पैल्ये अपेक्षा यितगै अंतराल मा दुगुणा चौगुणा पलायन ह्वेग्ये | आज मैदानुंद आकि जब काम धंधा नि मिलणु छ त छोरों कु रुझान होटलु मा भांडा मठोंण / उठोणा तर्फ ह्वे जाणू छ | सब्यों तैं त नौकरि मिल्दी नीं छ | ये वास्ता जौंकु यिथगा पैनो भाग नि होंदो वु यख कठिन जिन्दगी जीणों मजबूर ह्वे जान्दन |
   अब जब पहाड़ छोड़ी ऐ हि जांदन त कखि कपडे दुकान हो या फिर परचून कि दुकान या फिर छ्वटि मोटी फैकटरयों मा नौकरि करी यूँ छोरों तैं टैम बितोंण पड़द | वूंतैं समझ नि औंदों कि वु द्वी चार हजार तनखा मा क्य क्य कर सकदन | एक तरफ मकान को किराया त हैका तर्फ द्वी टैमें रवटि कु जुगाड़ | यो हि ना मोबाइल फोन बि चैंद त बाकि यार दोस्तों का समणि अपणु स्टेंडर्ड बि त दिखोणु हि पड़द | ये वास्ता वु अपणि चादर से भैर तक खुटा पसार दिन्दन | नतीजा यो होंद कि वूंकि जिन्दगी नर्क बणी रै जांद | बात सिर्फ आजे नीं छ | सवाल सर्य जिन्दगी को छ | आज म्यरा पहाड़ का जवान छोरा गौं छोड़ी भैर आकि अपणि किस्मत अजमानो ऐ जाणा छन पर कथगों कि किस्मत वूंको दगडो कर्द | जादातर अधबिचे मा लटक्याँ रै जांदन | नतीजा यो होंद कि यि बच्चा न घर का रैंदा अर न घाट का |
   बात जब सर्य जीवन कि होन्दी त जीवन का खेल मा वी लोग कामयाब ह्वे सकदन जौंन भोला बारा मा आज हि योजना बनै दये हो | आज कि जर्वतों पर थोड़ी रोक लगै दिए जाव त वु भोल का वास्ता सौभाग्य को कारण बण जांद |
  बात चल्नी छै नया राज्य प्राप्ति खुण गाणि अर सुपन्यों कि | यीं विधा पर गढ़वाली का गितार अर लिख्वार डॉ० उमेश चमोलान एक गीत ल्यख्युं छ |’पथ्यला’ नों का गीत संकलन मा रैबार शीर्षक से ये गीत मा डॉ० चमोलान बड़ा साधारण शब्दों मा बतै दये नयु राज्य बणग्ये अब परदेस जयां लोगु तैं घर ऐ जाण चयेणु छ |
 बड़ा मार्मिक शब्दों मा चमोलाजीन रैबार दिन्युं छ | अब परदेस रेनै जर्वत नीं छ |
     (रंत रैबार १२  नवम्बर  २०१२  बटिन)







सोमवार, 14 अगस्त 2017

drishti:      गीत समीक्षा (गढ़वाली) 3         त्वैतेंबुलौणा ...

drishti:      गीत समीक्षा (गढ़वाली) 3         त्वैतेंबुलौणा ...:       गीत समीक्षा (गढ़वाली) 3           त्वैतें बुलौणा       मेरि किताबी ‘पथ्यला’ मा अयां ये गीत की  समीक्षा वरिष्ठ साहित्यकार (समीक...
     गीत समीक्षा (गढ़वाली) 3
         त्वैतें बुलौणा    

  मेरि किताबी ‘पथ्यला’ मा अयां ये गीत की  समीक्षा वरिष्ठ साहित्यकार (समीक्षक) श्री ईश्वर प्रसाद उनियाल जी द्वारा ‘रंत रैबार’ मा करे गै छै | समीक्षा का वास्ता तौंकू भौत-भौत आभार | ईं पोस्ट से पैलि  ‘ऐ जा मेरा गौं मा’ अर ‘पथ्यला बौण का’ कि समीक्षा का बाद  गीत दगिडी ईं पोस्ट मा श्री उनियाल जी द्वारा करीं तिसरा  गीत ‘त्वैतें बुलोणा’  कि समीक्षा पेश छ –
                    (3)
             त्वैतें बुलौणा
गाड़ गदेरा गीत गीत सुनोणा,
किले नि औणु त्वैतें  बुलोणा,

कफ्फू बासणा,घुघुती घुराणी,
बणों- बणों मा ,हिलांस रोणी,
लैंया का पुंगड़ा,छन भौत स्वाणा,
किले नि औणु त्वैतें  बुलोणा |

जू डाला बोट्ला, रोप्यां छा त्वेन,
यति साल बीत्याँ सी फूली गैन,
सुंघाण भौत फूलों से औणी,
किले नि औणु त्वैतें  बुलोणी|

जूं डालों तौला,छैल छौ  रौंदू,
जूं बौणों मा छौ तू गाजी चरोंदू,
बौण मुछाला बणीक रोणा,
किले नि औणु त्वैतें  बुलोणा |

बसगाल,ह्यूंद,रूड भी गैन,
तेरा बाटा तैं हेरदा  रैन,
गगडांदू सर्ग धै छ लगाणु,
किले नि औणु त्वैतें  बुलोणु |

औंदू मोल्य़ार जब गौं गल्यु मा ,
हैंसदा छन फूल,डाल्युं डाल्यों मा,
संगरांद चैते  त्वेतें  धधोणी,
किले नि औणु त्वैतें  बुलोणी|

चैते समोण फूल प्युली का,
खुदेड़ गीत दीदी भूली का ,
कै कोणा तेरा जिकुड़ा  मा होला,
कबि न कबि त्वेतैं बुलोला |
गाड़ गदेरा गीत गीत सुनोणा,
किले नि औणु त्वैतें  बुलोणा |
     -----रचना – डॉ० उमेश चमोला

समीक्षा
बौण मुछाला बणीक रोणा
------ आई ० पी ० उनियाल
  जन्मभूमि कु दर्द कनु होंद,य बात कै प्रवासी तैं पूछी पता चल सकद | जन्मभूमि का कण- कण मा बचपन कि याद समयीं रैंद | यी वजै छ कि सब कुछ संपन्न होणा बावजूद प्रवास कि पिडा सैनै मजबूरी वैका गला पडी रैंद | भौत कम लोग होंदन जु माटी कु दर्द मैसूस नि कर्दा पर अमूमन मनखि होणा नाता लोगु को जन्मभूमि को प्यार हर टैम टीस बणी सतोणी रैंद |
  प्रवासी पिडा क्वांसो पराण वला कवि अपण गीतों मा त क्वी कथा-कवितों मा अंकित कनौ कोशिश कर्दन तब कखि जैकि वुँका मन कि तसल्ली ह्वे सकद | जन्मभूमि का ढूगा-डाला, गौला-गुज्यारा, पुंगडा-डोखरा, सैरा,उखाड़ी, थौल-बजार, गोर-बखरा, भैस्यूंको खरक, आम्वी डाल्यों को छैल, उची-निसी डांडी, गैरी गदनी जनि कतगै यनि विद्या छन जौ से पल्ला छडोणु प्रवासी का वास्ता भौत कठिन होंद | शहरकि हल्ला-गुल्ला भरी जिन्दगी, बनावटी सुभौ वला लोग, मुख अगनै कुछ हौर अर पीठ पिछनै कुछ हौर चरित्र रखण वलों का बीच कम से कम पहाडी परिप्रेक्ष्य भौत श्रेष्ठ होंद | वेसे कैबि क्षेत्र माहौल कि तुलना नि करे जै सकदी |
  आज कुछ लोग जु कि भौतिकवाद का बथों मा अपणु बचपन तक बिसरि ग्येनि वूंसे त क्वी शिकैत कनि ढुंगा तैं पाणी चरणु जनु छ | जै मनखि का वास्ता सब कुछ रूप्या छन त वैसे अगर पुछै  जाव कि वैतें कबि जलमभूमि कि खुद बि लगद त वेको साफ़ जवाब होंद कि क्या फर्क पड़द याद कन नि कन से | एक मित्र छ मेरो बचपन कु | काफी बड़ी पोस्ट पर कार्यरत छ | बाल बच्चों का नों पर द्वी नौनी अर एक नौनु छ | नौन्यों को ब्यौ-मंतर ह्वे ग्येनि | नौना को बि ब्यौ ह्वेग्ये | यानि सर्वसम्पन्न,एक दां मैं वूंका घर कै काम से पौंछ्यों | सोचि छौ दगड्या दगड़ी भेंट बि ह्वे जालि अर अपण दिल कि बात बि वैमा सुनै दयोलो | घर पौंछ्यों त घर मा वेकि ब्वारी छै | हौर क्वी ना | जांदे स्यवा सौंली ह्वे | औपचारिकता का रूप मा पूरी मेजबानी करेग्ये पर बर्ताव मा रस्याण को कखि नौं दयखनो नि मिलि | पूछे कि भुला कब रिटायर होणु छ | पता चलि कि वेकि नौकरी का दुएक साल बच्यां छन | जब पूछे कि रिटायर होणा बाद वेको क्य कनौ सोच्युं छ | जवाब मिलि कि सुदि घर मा बैठी बि वूंन क्य कन | ये वास्ता कखि नौकरी कि तलाश करला | वुन वूंते अबि बटी ऑफर औणी छन | तुम जणदे छा कि वुंकि गणित कथगा तेज छ | ये वास्ता कखि मा बि बैठ जाला | त बुढ़ापा तक काम कर सकदन | सोचि छौ वुंसे गौं का विकास कि बात करए जैलि अर वेका आधार पर कुछ कार्यक्रम तैं जमीन मा उतारे जाव | बस सोच दिल का दिल मा रैग्ये | यु वाकया बीच मा लायेग्ये कि हम सोच सकां कि आखिर जन्मभूमि को हम पर जु कर्ज छ वेसे हम कनक्वे उरिण ह्वे सकला | निराश ह्वेकि घर ऐ गयों | पर चला क्वी त स्व्चणू छैछ अपनि जन्मभूमि का कर्ज से मुक्त होणे जुगत |
  बस यिनी विधा पर एक गीत –कविता ल्यखीं छ डॉ उमेश चमोला जी कि | वूंकि कविता-गीत से लग जान्द कि भले ही अगर हम वापस अपनि जन्मभूमि मा नि जै सकों पर यिथगा त छैंछ कि हम अपनि भावना तैं कलम मा उतारी अपणा भाव प्रगट कर सकणा छं | डॉ० चमोला कि ईं कविता को भौ सीधु जिकुड़ा पर चोट कर्द | भाव यो छ कि प्रवासि तैं वेका गौंका गाड़,गदेरा गीत लगोंद पूछणा छन कि कब घौर औनू छै | कविता से लगद जन कि कवि घुघुती, कफ्फू, हिलांस कि भाषा समझी वूंका मन कि पिडा मैसूस कनू हो |
   लगद जनकि गौं का गौला गुज्यारा, खेती पाती, डाला-बोट्ला अपणा प्रवस्युं तैं पूछणा होवन कि बता त जरा घर कब औनू छै | जौ डालो का छैल बैठी वूंन कबि थौ बिसै होलि वु अबि तक अपणा दगडया मनख्यों कि खुशबू मैसूस कना छन| कवि मैसूस कनू छ कि जनकि वखा बौण मुछ्याला बणी धै लगोणा होवन कि बोल कब आणु छै घर | बसग्याल, ह्यून्द, गगडाँदो सर्ग, औंदों मोल्यार, हैंसदि प्योली, बुरांस,  चैते संगरांद त्वे दयखनो बेताब होयां छन बस एक ही रौड(जिद) लगीं छ कि बोल कब तक एल्यु तु घर |
  कुल मिलैकि डॉ चमोलान यी कविता मा यिना भाव निवेशित करनि कि हर अंतरा पढ्दरा प्रवासि तैं अपनि जन्मभूमि का दर्शन का वास्ता प्रेरित कर्द |
(रंत रैबार २०  मार्च  २०१२  बटिन)








शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

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